दिल्ली में ट्रैफिक जाम, अवैध कब्जे और पार्किंग की समस्या कोई नई बात नहीं है. लेकिन हमारी खास पड़ताल में चौंकाने वाला खुलासा हुआ, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां कानून वाहनों की एंट्री पर रोक लगाता है तो उसी जगह पर खुलेआम पार्किंग माफिया लाखों रुपये की वसूली कर रहे हैं- वो भी पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे.
इसके अलावा नो-व्हीकल जोन से लेकर व्यस्त मार्केटों तक नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए लाखों रुपये की नकदी वसूली हो रही है.
टाउन हॉल- नो व्हीकल जोन में चल रहा अवैध पार्किंग रैकेट
दिल्ली का टाउन हॉल एक ऐतिहासिक परिसर है, जिसे आधिकारिक तौर पर नो-व्हीकल जोन घोषित किया गया है. यहां वाहनों के प्रवेश पर सख्त प्रतिबंध है और बोर्ड पर साफ लिखा है कि नियम तोड़ने पर ₹20,000 तक का जुर्माना लग सकता है, लेकिन हमारी जांच में सामने आया कि इसी नो-व्हीकल जोन के अंदर बाकायदा अवैध पार्किंग का कारोबार चल रहा है.
माफिया यहां ₹150 प्रतिदिन से लेकर ₹4,500 प्रतिमाह तक वसूली करते हैं. ये वाहन चालकों को किसी भी तरह की रसीद नहीं देते और पूरी वसूली नकद में होती है.
वहीं, जांच के दौरान हमारी टीम की मुलाकात गुलजार नाम के व्यक्ति से हुई, जिसने खुद को इस पार्किंग का नियंत्रणकर्ता बताया. उसने साफ कहा कि मंथली गाड़ी लगानी है तो ₹3,700–₹4,000 देने पड़ेंगे. यहां तक कि उसने ये भी दावा किया कि पुलिस और कार्रवाई की चिंता करने की जरूरत नहीं है, सब ‘सेट’ है.
इस रास्ते पर एक वक्त में 150–200 गाड़ियां खड़ी हो सकती हैं. यानी रोजाना लगभग ₹30,000 का काला कारोबार और ये सब पुलिस चौकी और ACP कार्यालय के बिलकुल पास हो रहा है.
गांधी नगर मार्केट- सड़क पर माफिया का कब्जा
देश के सबसे बड़े रेडीमेड गारमेंट मार्केट गांधी नगर की गलियों में भी हालात डराने वाले हैं. यहां कोई भी आधिकारिक ठेकेदार नियुक्त नहीं है, फिर भी अवैध रूप से ₹100 प्रतिदिन की वसूली की जा रही है. पार्किंग वसूलीकर्ता बिना किसी रसीद या पर्ची के पैसे लेते हैं और कहते हैं कि यहां पर्ची नहीं चलती.
एक पार्किंग वसूलीकर्ता ने हमारी टीम को साफ बताया, 'यहां पर्ची नहीं होती- सारी गाड़ियां ऐसे ही लगती हैं.'
स्थानीय लोगों और दुकानदारों के अनुसार, पूरे इलाके को हिस्सों में बांटकर अलग-अलग लोग वसूली करते हैं. इन गिरोहों ने फुटपाथ तक कब्जा कर रखा है और पैदल चलने वालों के लिए जगह नहीं है.
लक्ष्मी नगर- वैध बोर्ड लेकिन अवैध वसूली
लक्ष्मी नगर के रमेश पार्क में पड़ताल में एक बड़े खेल का पर्दाफाश हुआ है. यहां एक MCD पार्किंग बोर्ड लगा है, लेकिन नियमों के खिलाफ ₹2,500 प्रतिमाह वसूले जा रहे हैं. डे पार्किंग यानी 8 घंटे के ₹100 ले जा रहे हैं. किसी भी तरह की पार्किंग स्लिप नहीं दी जाती, जबकि बोर्ड पर लिखा है- प्रति घंटा ₹20, 24 घंटे- 120 रुपये,महीने के 2000 रुपये. यानी MCD बोर्ड सिर्फ वैधता का दिखावा बनकर खड़ा है, जबकि वसूली नियमों से कई गुना ज्यादा हैं.
मालवीय नगर- एक तरफ की अनुमति, दोनों तरफ वसूली
मालवीय नगर में MCD द्वारा केवल सड़क के एक तरफ पार्किंग की अनुमति है, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि दोनों तरफ कारें खड़ी की जा रही हैं. दोनों तरफ से वसूली हो रही है. इससे सड़क आधी रह जाती है.जाम और दुर्घटना का खतरा बढ़ता है.
जब पार्किंग अटेंडेंट से पूछा गया कि ये अवैध है तो उसने सहजता से कहा, “जो पैसे दे देता है, उसकी गाड़ी खड़ा करवा देते हैं.”
कीर्ति नगर- MCD पार्किंग बनी गोदाम
कीर्ति नगर फर्नीचर मार्केट में MCD पार्किंग का बोर्ड लगा है, लेकिन उसे चालाकी से ढंक कर रखा गया है. वहां का गार्ड रूम खाली है और पार्किंग की निर्धारित जगह पर निर्माण सामग्री का कारोबार फल-फूल रहा है.
इसी बीच रितिक नाम के युवक ने खुद को प्रभारी बताते हुए कहा कि ये MCD पार्किंग है और यहां गाड़ी खड़ा करने का ₹3,000 महीना लगेगा. यानी जिस जगह पर जनता के वाहन खड़े होने चाहिए थे, वहां माफिया ने अवैध वसूली और गोदाम का धंधा शुरू कर दिया है और नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं.
चिराग दिल्ली- DDA जमीन पर अवैध पार्किंग
दक्षिण दिल्ली के चिराग दिल्ली इलाके में डीडीए की जमीन पर बिना किसी लाइसेंस या रसीद के सैकड़ों गाड़ियां रोजाना खड़ी की जाती हैं. ये जमीन पार्किंग के लिए स्वीकृत नहीं है और न ही यहां कोई सरकारी बोर्ड लगा है. इसके बावजूद पार्किंग संचालक यहां बड़े पैमाने पर वसूली कर रहे हैं.
पार्किंग संचालक ने कहा कि जगह इतनी भर जाती है कि कभी-कभी गाड़ियां सड़क तक खड़ी करनी पड़ती हैं.
कहां जा रहे हैं पैसे?
इस पूरी पड़ताल से ये साफ हो गया है कि दिल्ली में वैध और अवैध दोनों तरह की पार्किंग में माफिया का राज है. स्लिप का कोई सिस्टम नहीं है और रोजाना लाखों रुपये की नकद वसूली हो रही है.अब सवाल ये है कि यह पैसा आखिर किसकी जेब में जा रहा है और क्या इसमें स्थानीय नेटवर्क की मिलीभगत है. ट्रैफिक जाम और कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए ये पूरा खेल जारी है, जहां सरकारी सिस्टम सो जाता है, वहां माफिया सड़कों को बेचकर अपनी तिजोरियां भरने लगते हैं.