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उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज, SC की बड़ी टिप्पणी के बावजूद लोअर कोर्ट से राहत नहीं

दिल्ली में 2020 में हुए दंगे से जुड़े केस में जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को अंतरिम राहत नहीं मिली है. दिल्ली की एक अदालत ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि अस्थायी रिहाई के लिए दिए गए कारण पर्याप्त और उचित नहीं हैं.

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दिल्ली दंगा केस में उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका खारिज. (File Photo: PTI)
दिल्ली दंगा केस में उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका खारिज. (File Photo: PTI)

दिल्ली दंगों में बड़ी साजिश रचने से जुड़े यूएपीए मामले में दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को पूर्व जेएनयू छात्र नेता उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी. कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बजाज ने उमर खालिद की 15 दिनों की अंतरिम जमानत की मांग ठुकरा दी. कोर्ट ने कहा कि अंतरिम जमानत के लिए उमर खालिद की ओर से दिए गए कारण उचित और संतोषजनक नहीं हैं. 

खालिद ने अपने चाचा के निधन के बाद होने वाली चेहल्लुम रस्म में शामिल होने और 2 जून को निर्धारित अपनी मां की सर्जरी से पहले और बाद में उनकी देखभाल के लिए अंतरिम जमानत मांगी थी. कोर्ट ने अपने आदेश में माना कि याचिका में बताई गई परिस्थितियां अंतरिम राहत देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं बनतीं. यह फैसला ऐसे समय आया है, जब एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ट्रायल से पहले किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखना असंवैधानिक है. शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि उमर खालिद और अन्य आरोपियों, जिनमें गुलफिशा फातिमा भी शामिल हैं, उनकी जमानत के संबंध में सही फैसला नहीं किया गया था.

कड़कड़डूमा कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस आधार पर कि उमर खालिद और अन्य आरोपियों को पहले अंतरिम जमानत मिल चुकी है और उन्होंने कभी शर्तों का उल्लंघन नहीं किया, इसका मतलब यह नहीं कि हर बार मांगी गई अंतरिम जमानत मंजूर कर ली जाए. कोर्ट ने कहा कि चाचा की चेहल्लुम रस्म में शामिल होना इतना आवश्यक नहीं है. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि रिश्ता इतना करीबी और गहरा था, तो उमर खालिद को उनकी मृत्यु के समय ही जमानत की मांग करनी चाहिए थी, न कि इतने लंबे समय बाद.

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उमर की बहनें कर सकती हैं मां का देखभाल: कोर्ट 

मां की सर्जरी के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि उमर खालिद की अन्य बहनें भी उनकी देखभाल कर सकती हैं और पिता भी उनकी सहायता करने में सक्षम हैं. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के मुताबिक सर्जरी एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसमें केवल गांठ हटाई जानी है और इसमें आवेदक की ओर से किसी विशेष मदद की वास्तविक आवश्यकता नहीं दिखती. अदालत ने कहा कि दिए गए कारण उचित नहीं हैं, इसलिए अंतरिम राहत देना उचित नहीं होगा.

दिल्ली पुलिस ने अंतरिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि उमर खालिद की रिहाई का असर सार्वजनिक व्यवस्था और प्रशासन पर पड़ सकता है, क्योंकि मामला बेहद संवेदनशील और व्यापक प्रभाव वाला है. पुलिस ने दलील दी कि अंतरिम जमानत की मांग पूरी तरह गलत, आधारहीन और खारिज किए जाने योग्य है, क्योंकि ऐसा कोई असाधारण, तत्काल या मजबूर करने वाला कारण मौजूद नहीं है, जिससे खालिद को अंतरिम राहत दी जाए.

एफआईआर 59/2020 में उमर खालिद पर यूएपीए की धारा 13, 16, 17 और 18, आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27, सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 की धारा 3 और 4 समेत भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत गंभीर आरोप लगाए गए हैं. इस मामले में जिन अन्य लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है, उनमें आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन, जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की सदस्य सफूरा जरगर, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, एक्टिविस्ट ख़ालिद सैफी, शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक और अथर खान शामिल हैं. बाद में इस मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट भी दाखिल की गई थी.

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