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Coal stock power crisis: चार दिन का कोयला, फिर अंधेरी रात? कई पावर प्लांट्स में चंद दिनों का स्टॉक, जानिए नियम

Coal stock in India: देश में कोयले से चलने वाले कुल 135 पावर प्लांट हैं. सभी पावर प्लांट को कम-से-कम 20 दिनों का कोयला भंडार रखना होता है. लेकिन सितंबर-अक्टूबर में सभी पावर प्लांट के पास कोयले का भंडार घटकर चंद दिनों का रह गया.

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • देश में आ सकती है बिजली की दिक्कत
  • चंद दिनों का कोयला स्टॉक बचा

पिछले हफ्ते बीजिंग और शंघाई समेत चीन के कई बड़े शहरों में बिजली का संकट इतना ज्यादा बढ़ गया था कि सड़कों पर सिर्फ गाड़ियों की लाइटें चमक रही थीं. इस बिजली संकट से चीन में आम लोगों का जीवन तो प्रभावित हुआ ही. चीन की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि बिजली न होने से फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ीं. उत्पादन रुक गया और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चीन में पावर प्लांट्स के पास कोयले की कमी हो गई. अब कुछ ऐसे ही संकट की ओर भारत भी बढ़ रहा है. हालांकि, सरकार ने इससे इनकार किया है, जबकि कई राज्य सरकारों ने कोयले के संकट का दावा किया है.

देश में कोयले से चलने वाले कुल 135 पावर प्लांट हैं. सभी पावर प्लांट को कम-से-कम 20 दिनों का कोयला भंडार रखना होता है. लेकिन सितंबर-अक्टूबर में सभी पावर प्लांट के पास कोयले का भंडार घटकर चंद दिनों का रह गया. 25 पावर प्लांट में तीन अक्टूबर को सात दिन से भी कम समय का कोयला भंडार था. कम-से-कम 64 पावर प्लांट में चार दिनों से भी कम समय का कोयला बचा था. एक अक्टूबर, 2021 को खुद ऊर्जा मंत्रालय ने कहा था कि देश के 134 थर्मल पावर प्लांट के पास मात्र चार दिनों का औसत कोयला भंडार बचा है., जिससे बिजली का उत्पादन कम हुआ है. 

हालांकि, इसके साइड इफेक्ट्स पावर प्लांट्स में भी दिखने लगे हैं. देश के कई पावर प्लांट्स में बिजली उत्पादन घट गया है. झारखंड के बोकारो में चंद्रपुरा थर्मल पावर प्लांट में कोल स्टॉक सुपर क्रिटिकल स्थिति में है. यहां महज तीन दिनों का स्टॉक बचा है. मध्य प्रदेश के खंडवा में संत सिंगाजी थर्मल पावर प्लांट समेत लगभग सभी पावर प्लांट्स में बिजली उत्पादन घटकर आधा रह गया है.

एमपी के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने कहा, ''आप यह देखिए कि 135 थर्मल पावर में 75 में पांच से दस दिन का कोयला बचा है. जो देश में स्थिति वही मध्य प्रदेश में, लेकिन बेहतर स्थिति में है. लगभग हमने 45000 मीट्रिक टन स्टॉक किया है. कहीं पांच दिन, कहीं सात दिन, कहीं तीन दिन का कोयला है.'' वहीं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, ''लगातार अधिकारी नजर रखे हैं कि आपूर्ति में कमी ना हो. यथासंभव प्रयास किये जा रहे हैं.'' कोयले की कमी से पावर प्लांट्स ठप होने का डर ना तो सिर्फ एक राज्य जता रहा है. ना ही सिर्फ गैर बीजेपी शासित राज्य जता रहे हैं, बल्कि ये एक देशव्यापी सच है.

क्या बोले ऊर्जा मंत्री आरके सिंह?

ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने कोयले में कमी के दावे को खारिज कर दिया. उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि बिजली का कोई संकट नहीं है और कोयले का पर्याप्त स्टॉक है. आरके सिंह ने कहा, ''कल शाम दिल्ली के उपराज्यपाल ने संभावित बिजली संकट को लेकर मुख्यमंत्री के लिखे पत्र को लेकर मुझसे बात की. मैंने उन्हें बताया कि हमारे अधिकारी की हालातों की निगरानी कर रहे हैं और ऐसा नहीं होगा.'' उन्होंने कहा कि मैंने बीएसईएस, एनटीपीसी और बिजली मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक की. मैं आपको बता रहा हूं कि कोई समस्या नहीं है. समस्या इसलिए शुरू हुई क्योंकि गेल ने दिल्ली डिस्कॉम को गैस आपूर्ति रोकने की बात कही थी और वह इसलिए क्योंकि गेल और दिल्ली डिस्कॉम का एग्रीमेंट खत्म हो रहा है. वहीं दिल्ली सरकार में मंत्री सतेंद्र जैन ने कहा कि कोयले की आपूर्ति एक दिन की बची है. एक महीने का नहीं तो 15 दिन का स्टॉक जरूर होना चाहिए. नहीं आती तो ब्लैक आउट सा होगा. इसके अलावा, मनीष सिसोदिया ने कहा कि मुझे बहुत दुख हुआ कि देश के केंद्रीय मंत्री इतनी बड़ी गैर जिम्मेदाराना अप्रोच लेकर चल रहे हैं कि जिस समय कई मुख्यमंत्री रिक्वेस्ट कर रहे हैं कि हल निकालिए तो कह रहे हैं कि क्राइसिस ही नहीं है.

कोयले के स्टॉक पर क्या है नियम?

नियम यह है कि पावर प्लांट्स में बैकअप के तौर पर औसतन बीस दिन का कोयला स्टॉक हमेशा उपलब्ध होना चाहिए और सच ये है कि सिर्फ चार दिन का कोयला ही बचा है, जिसे ऊर्जा मंत्री ने खुद कबूल किया है.  इसके अलावा भी कई राज्य सरकारें इसको लेकर खतरे का अलर्ट जारी कर चुकी हैं.

इस मामले पर एक ग्रामीण रमेश उपाध्याय ने बताया कि चार-पांच दिन पहले बिजली की अच्छी आपूर्ति हो रही थी लेकिन इधर कटौती बढ़ी है. एक सप्ताह पहले बिजली आपूर्ति अच्छी थी और 16 घंटे से अधिक आपूर्ति मिलती थी। लेकिन इधर कटौती अधिक बढ़ी है जिसके कारण उमस भरी गर्मी में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. वहीं, बिजली पावर हाउस पर कार्यरत कर्मचारी कृष्णा ने बताया कि हमारे यहां फीडर पर 18 घंटे बिजली की सप्लाई है. मगर इधर 11-12 घंटे ही दे पा रहे है। ऊपर से ही सप्लाई में कमी है, उसकी वजह से यह हो रहा है. बता रहे हैं कि कोयले की कमी के कारण सप्लाई में कमी आयी है.

राजस्थान, तमिलनाडु, झारखंड, बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र...ये वे राज्य हैं, जिनकी सरकारों ने कोयले की कमी से बिजली उत्पादन में कमी की शिकायत केंद्र सरकार से की है. लेकिन जिन राज्यों ने शिकायत नहीं भी की है, वहां भी कोयले की कमी से बिजली की कटौती कोई कम बड़ा संकट नहीं है. सबसे बड़ा उदाहरण तो उत्तर प्रदेश ही है. उत्तर प्रदेश के इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने बताया कि कोयले के संकट के कारण देश का बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है. 135 ऐसे हैं जो कोयले से चलते हैं. आधे से अधिक में कोयला समाप्त हो गया. आधे में दो ढाई दिन का कोयला बचा है. 

चार दिन का ही कोयला क्यों बचा? जानिए वजह?

सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि जब पावर प्लांट्स में हमेशा कम-से-कम बीस दिन का स्टॉक होने का नियम मौजूद है तो फिर सिर्फ चार दिन का कोयला स्टॉक ही क्यों मौजूद है ? ऊर्जा मंत्रालय ने इसके चार कारण गिनाएं है, जिन्हें हम विस्तार से आपको समझाते हैं- पहली वजह बताई गई है कि देश में बिजली की मांग बढ़ी है 2019 में अगस्त-सितंबर में बिजली की खपत करीब 10 हजार 660 करोड़ यूनिट्स हुई थी, जबकि इस साल अगस्त-सितंबर में 12 हजार 400 करोड़ यूनिट्स हो गई. अगस्त-सितंबर 2019 की तुलना में इस साल के इन्हीं दो महीनों में कोयले की खपत 18 प्रतिशत बढ़ गई. वहीं, दूसरी वजह बताई गई है कि  सितंबर में कोयला खदानों के आसपास ज्यादा बारिश होने से कोयले का उत्पादन प्रभावित हुआ है. भारत अपनी जरूरत का 75 फीसदी कोयला घरेलू खदानों से निकालता है. पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा के कई कोयला खदानों में पानी भर जाने की वजह से कई दिनों तक काम बंद रहा. 

तीसरी वजह ये बताई गई है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमत बढ़ने से पिछले साल की तुलना में इस साल कोयले के विदेश से आयात में कमी आई है. उदाहरण के तौर पर-इंडोनेशिया में मार्च में कोयले की कीमत 60 डॉलर प्रति टन थी जो सितंबर में बढ़कर 200 डॉलर प्रति टन हो गई. 2019 की तुलना में आयातित कोयले से बिजली के उत्पादन में 43.6 फीसदी की कमी आई है और चौथी वजह बताई गई है कि कोरोना काल के बाद औद्योगिक एक्टिविटी बढ़ी है, जिसकी वजह से बिजली की डिमांड भी बढ़ी है. अगस्त 2019 के मुकाबले 2021 अगस्त में देश में 18 अरब यूनिट की बिजली खपत बढ़ी है. ऊर्जा मंत्रालय ने इन वजहों का हवाला देते हुए कोयले की कमी को थोड़े दिन की परेशानी बताया है लेकिन ये परेशानी अब आम लोगों को भी महसूस होने लगी है. 

 

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