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गांधी परिवार के करीबी होने के चलते राव के राज में किनारे कर दिए गए थे अहमद पटेल

माना जाता है कि नरसिम्हा राव के दौर में गांधी परिवार का प्रभाव थोड़ा कम हो गया था और इस वजह से परिवार के वफादारों और करीबियों के लिए यह वक्त मुश्किलों भरा था.

अहमद पटेल 8 बार सांसद रहे (फाइल-पीटीआई) अहमद पटेल 8 बार सांसद रहे (फाइल-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अहमद पटेल 8 बार सांसद रहे
  • राजीव के भी बेहद करीबी रहे
  • 2018 में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष बने
  • 1977 में पहली बार सांसद बने

अहमद पटेल कांग्रेस के ऐसे नेता रहे जो हमेशा गांधी परिवार के प्रति वफादार रहे. इंदिरा गांधी के दौर में राजनीतिक सफर शुरू करने के बाद उनका राजीव गांधी के साथ गहरा नाता बना रहा और फिर यह सोनिया गांधी के वक्त भी जारी रहा. लेकिन उनके राजनीतिक करियर में एक वक्त ऐसा भी आया जब वह कांग्रेस पार्टी में किनारे कर दिए गए. 

राजीव गांधी की हत्या के बाद जब केंद्र में नरसिम्हा राव की अगुवाई में कांग्रेस की सरकार बनी तो गांधी परिवार से नजदीकी होने के बाद भी अहमद पटेल को किनारे कर दिया गया. अहमद पटेल को कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की सदस्यता के अलावा लगभग सभी पदों से हटा दिया गया था.

माना जाता है कि नरसिम्हा राव के दौर में गांधी परिवार का प्रभाव थोड़ा कम हो गया था और इस वजह से परिवार के वफादारों और करीबियों के लिए यह वक्त मुश्किलों से भरा था. लेकिन कुछ समय तक साइडलाइन होने के बाद वक्त बदला और फिर से वह पार्टी के शीर्ष स्तर पर कर्ताधर्ता बन गए.

जब बेघर हो गए थे पटेल

इंदिरा और राजीव गांधी की तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भी अहमद पटेल को मंत्री पद की पेशकश की तो उसे उन्होंने ठुकरा दिया. पटेल तब गुजरात से लोकसभा चुनाव हार गए थे और इस वजह से उन्हें सरकारी आवास खाली करने के लिए लगातार नोटिस मिलने लगे.

तब उनकी मित्र और तत्कालीन कांग्रेस नेता नजमा हेपतुल्ला ने उनके लिए सरकारी आवास के लिए कई विकल्प तलाशे, लेकिन इसके लिए नरसिम्हा राव सरकार से मंजूरी मिलना आवश्यक था. उन्होंने नजमा हेपतुल्ला के प्रयास के लिए शुक्रिया तो अदा किया, लेकिन मदद नहीं स्वीकार की. कहा जाता है कि अगर वो नजमा की मदद ले लेते तो इसका मतलब होता नरसिम्हा राव से मदद लेना. जो वह बिल्कुल नहीं चाहते थे.

राजनीति में होने के बावजूद अहमद पटेल ने कभी भी कोई पद स्वीकार नहीं किया और बिना पावर लिए खुद को पावर में बनाए रखने की कला का उपयोग करते रहे.

पहले इंदिरा गांधी फिर राजीव गांधी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहा, लेकिन अहमद ने इसे स्वीकार नहीं किया और पार्टी संगठन से ही जुड़े रहे. राजीव ने भी 1984 लोकसभा चुनाव में जीत के बाद अहमद को मंत्री पद देना चाहा, लेकिन उन्हेंने फिर पार्टी को चुना.

राजीव गांधी के दौर में उन्होंने यूथ कांग्रेस का नेशनल नेटवर्क तैयार किया, जिसका सबसे ज्यादा फायदा आगे चलकर सोनिया गांधी को मिला. पार्टी के कई पदों पर रहने वाले अहमद पटेल को 1991 में नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी का सदस्य बनाया गया, लेकिन उस दौर में उन्हें अन्य पदों से दूर रखा गया.

5 बार राज्यसभा सांसद रहे पटेल

गुजरात के भरूच जिले के अंकलेश्वर में पैदा हुए अहमद पटेल तीन बार लोकसभा के लिए चुने गए तो 5 बार राज्यसभा के सांसद रहे. अगस्त 2018 में अहमद पटेल को कांग्रेस का कोषाध्याक्ष नियुक्त किया गया था.

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अहमद पटेल पहली बार 1977 में 26 साल की उम्र में भरूच से लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. उन्होंने अपना पहला चुनाव 1977 में भरूच से लड़ा था, जिसमें वो 62,879 वोटों के अंतर से जीते. 1980 में उन्होंने फिर यहीं से चुनाव में जीत हासिल की. 1984 के अपने तीसरे लोकसभा चुनाव में वह 1,23,069 वोटों से जीते. 1980 और 1984 दोनों चुनावों में जनता पार्टी के चंदूभाई देशमुख दूसरे नंबर पर रहे. 

हमेशा पर्दे के पीछे से राजनीति करने वाले अहमद पटेल कांग्रेस परिवार के विश्वस्त नेताओं में गिने जाते थे. 1993 से अहमद राज्यसभा सांसद रहे और 2001 से सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार.

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