कांग्रेस की मुश्किलों का अंत नहीं है. एक तो साल भर में वो दो-दो जगह अपनी सरकार खो चुकी है. जहां सत्ता नहीं है उन राज्यों से भी गुटबाज़ी की ख़बरें खुलकर आ ही रही हैं. उधर G23 के नेता अपने ही नेतृत्व पर घुमा फिरा कर हमले करने से बाज़ नहीं आ रहे और ऊपर से बंगाल जैसे राज्यों में कोई कांग्रेस को लड़ाई में भी मानने को तैयार नहीं. इन सभी फज़ीहतों के बावजूद रस्साकशी चालू है. ताज़ा मामला मध्यप्रदेश का है जहां हिंदू महासभा के नेता बाबूलाल चौरसिया ने पूर्व सीएम कमलनाथ की मौजदूगी में कांग्रेस ज्वॉइन कर ली. चौरसिया गोडसे का मंदिर बनाने और आरती उतारने के मामले में पहले ही ठीकठाक चर्चित हो चुके थे. अब जैसे ही कमलनाथ ने उनको पार्टी में एंट्री दिलाई वैसे ही दिग्विजय सिंह से लेकर अरुण यादव जैसे दिग्गज एक्टिव हो गए. ये नेता चौरसिया को तो बर्दाश्त करने के मूड में हैं ही नहीं, साथ ही खुलकर बयानबाज़ी करके बिना नाम लिए कमलनाथ को भी घेर रहे हैं. लग रहा है जैसे कांग्रेस में गुटबाज़ी अब सतह पर आ गई है.
अरुण यादव जो सांसद रहे हैं, केंद्र में मंत्री रह चुके हैं, मध्यप्रदेश कांग्रेस के मुखिया भी रहे हैं फिलहाल खुलकर कमलनाथ के सामने आ गए हैं. और कांग्रेस की मुश्किल मध्य प्रदेश तक ही महदूद नहीं हैं. पार्टी के 23 सीनियर नेता अपनी बयानबाज़ी से रुक नहीं रहे. इन्हें आजकल G 23 भी कहा जाता है. दो दिन पहले गुलाम नबी आज़ाद के एनजीओ ने एक प्रोग्राम रखा. जम्मू में हुए इस कार्यक्रम का इस्तेमाल G 23 ने राहुल और सोनिया गांधी को कड़ा संदेश देने के लिए किया. कार्यक्रम में सारे नेता भगवा साफे में नजर आए. कपिल सिब्बल ने गुलाम नबी आज़ाद को फिर से राज्यसभा ना भेजे जाने पर सवाल खड़ा किया वहीं आनंद शर्मा ने भी कहा कि हमने ये हक किसी को नहीं दिया कि वो बताए हम कांग्रेसी हैं या नहीं. कार्यक्रम में ये बार बार दोहराया गया कि केंद्रीय नेतृत्व को मान लेना चाहिए कि कांग्रेस कमज़ोर हो गई है. ये सब तो हुआ ही ऊपर से कल ही गुलाम नबी आज़ाद ने फिर से पीएम मोदी की तारीफ की. अब मसला ये है कि ये नेता जिस तरह खुलकर पार्टी में बदलाव की बात कर रहे हैं या विपक्षियों की तारीफ कर रहे हैं उस पर सवाल उठते हैं. सवालों के जवाब में G 23 कहता है कि ये तो डेमोक्रेसी है कि हम अपनी मतभिन्नता ज़ाहिर कर रहे हैं तो इसमें ग़लत क्या है.
कोरोना ने लोगों की ज़िंदगी पर हर तरफ़ से वार किया है. फिर चाहे वो लाइफस्टइल हो जीवन बिताने का तरीका हो या फिर काम करने का तरीका हो. करोड़ों लोगों की नौकरियां गई, कितनी ही कंपनियां बंद हो गई, यहां तक की वेतन तक में भी कटौती हो गई। अब हाल ही में International Labour Organization ने एक रिपोर्ट निकाली है जिसमें लोगों के काम करने के घंटे के साथ-साथ उनके वेतन पर भी बात की गई है। आपको कैसा लगेगा अगर मैं आपसे कहूं की covid 19 के वक्त में आपकी मेहनत के हिसाब से जो आपको महनताना मिलता है वह बंग्लादेश को छोड़ कर ऐशिया-पैसिफिक रीजन में सबसे कम है. इस रिपोर्ट के हिसाब से भारत के लोग एक हफ्ते में अड़तालीस घंटे काम करते है लेकिन बाकी देशों की तुलना में सबसे कम वेतन पाते हैं.
महाराष्ट्र के पुणे जिले के बारामती में साड़ी बैंक खुला है. अब साड़ी बैंक है तो ज़ाहिर तौर पर यहां साड़ियों का ही लेन देन होता है. तो बारामती का इलाका गन्ने के उत्पादन के लिए जाना जाता है. रागिनी फाउंडेशन की अध्यक्ष राजश्री आगम के जेहन में इस तरह का साड़ी बैंक खोलने का आइडिया आया. समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले की जयंती 3 जनवरी को बारामती में इस साड़ी बैंक की शुरुआत की गई. अब क्योंकि ये बैंक बारामती में है जहां गन्ने का उत्पादन होता है तो ज्यादातर ऐसी महिलाओं को ये साड़ियां दी जाती हैं जो खेतों में गन्ने की कटाई जैसे मजदूरी के काम करती हैं और उन महिलाओं में भी बांटा जाता है जो पैसे की किल्लत की वजह से इन्हें खरीदने की क्षमता नहीं रखतीं.
इन सब मुद्दों पर विस्तार से चर्चा, देश-दुनिया के अख़बारों से सुर्ख़ियां और आज के दिन की इतिहास में अहमियत सुनिए 'आज का दिन' में अमन गुप्ता के साथ.