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मुंबई के ज़वेरी बाज़ार में मज़दूरों की कमी, चुनावों के लिए बंगाल रवाना हो रहे कारीगर

मुंबई के ज़वेरी बाज़ार में बंगाल चुनावों के चलते कारीगरों का पलायन बढ़ गया है. मजदूरों की कमी, महंगे सोने और घटती मांग से ज्वेलरी इंडस्ट्री पर असर पड़ रहा है.

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मुंबई के ज़वेरी बाज़ार में बंगाल चुनाव का दिखा असर (Photo: ITG)
मुंबई के ज़वेरी बाज़ार में बंगाल चुनाव का दिखा असर (Photo: ITG)

मुंबई का ज़वेरी बाज़ार पूरे देश में सोने के गहने बनाने के लिए मशहूर है. इस साल, पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों की वजह से यहां से लोगों का बड़े पैमाने पर अपने घरों को लौटना (रिवर्स माइग्रेशन) देखने को मिल रहा है. जब मैं कालबादेवी पहुंचा, तो मैंने इकरामुल्लाह हक़ शेख़ को फ़ोन किया. बादाम वाड़ी में सोने के गहने बनाने की उनकी एक यूनिट है. कालबादेवी का यह मेरा पहला दौरा नहीं था, लेकिन जर्जर हो चुकी इमारतों के अंदर करोड़ों रुपये के गहने बनते देखना हमेशा ही दिलचस्प लगता है. सोना भले ही रईसी का प्रतीक हो, लेकिन इसे पुरानी इमारतों और छोटे-छोटे कमरों में ढाला जाता है, जहां कारीगर ज़मीन पर बैठकर काम करते हैं और उन्हें ताज़ी हवा भी बहुत कम मिल पाती है.

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सोने के गहने इंसान के मन में लालच पैदा कर देते हैं. इसीलिए शेख़ जैसे मालिक सुरक्षा गार्ड और CCTV मॉनिटरिंग सिस्टम का इंतज़ाम रखते हैं. जब मैं वर्कशॉप पहुंचा, तो मुझे दरवाज़े की घंटी बजानी पड़ी. जब शेख़ ने दरवाज़े के बाहर लगे CCTV कैमरे में देखकर यह पक्का कर लिया कि आने वाला मैं ही हूं, तो उन्होंने एक बटन दबाया जिससे दरवाज़ा खुल गया.

अंदर दाख़िल होते ही मैंने देखा कि 200 वर्ग फ़ीट का वह कमरा तीन हिस्सों में बंटा हुआ था. एक हिस्से में शेख़ अपनी मेज़ पर बैठे थे, जबकि बाकी दो हिस्सों में कारीगर काम कर रहे थे.

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मजदूरों ने क्या बताया?

बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के बारे में बात करते हुए इकरामुल्ल हक शेख ने कहा कि यह LPG सिलेंडरों की कमी की वजह से हो रहा है, जिससे मालिकों के लिए काम चलाना मुश्किल हो गया है. 

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उन्होंने बताया, "मेरी कई यूनिट्स में करीब 40 कारीगर काम करते हैं. उनमें से आधे लोग जा चुके हैं और भी कारीगरों के जल्द ही जाने की संभावना है. ट्रेनों की कमी के कारण बसों का इंतज़ाम किया जा रहा है. इससे सोने के गहने बनाने वाले सेक्टर में बड़ी रुकावटें आने का खतरा है. सोने की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण इस इंडस्ट्री में पहले से ही मांग कम है. कारीगरों की तादाद में कमी को देखते हुए मैं मांग पूरी नहीं कर पा रहा हूं."

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इकरामुल्ल हक शेख ने आगे कहा, "कच्चे माल की कीमतें भी बढ़ गई हैं, लेकिन हम बनाने का चार्ज नहीं बढ़ा सकते, क्योंकि सोने की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण रेट बहुत ज़्यादा प्रतिस्पर्धी हैं. SIR उन कारीगरों के लिए एक अहम वजह है, जो पश्चिम बंगाल में वोट डालने पर ज़ोर दे रहे हैं. जब तक दूसरे कारीगर वापस नहीं आ जाते, तब तक हमें मौजूद कारीगरों के साथ ही काम चलाना होगा."

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मेरा अगला पड़ाव ज़वेरी बाज़ार था, जहां 'बंगाल स्वर्ण शिल्प कल्याण संघ' (बंगाली कारीगरों का एक संगठन) का दफ़्तर मदन मेंशन की तीसरी मंज़िल पर है. बंगाल स्वर्ण शिल्प कल्याण संघ के महासचिव कालिदास सिन्हा रॉय ने बताया कि 60% कारीगर पहले ही मुंबई छोड़ चुके हैं, जबकि वोटिंग के नज़दीक आने पर और भी कारीगरों के जाने की संभावना है.

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बंगाल स्वर्ण शिल्प कल्याण संघ के महासचिव कालिदास सिन्हा रॉय ने कहा, "इस इलाके में करीब 1.5 लाख कारीगर हैं. SIR के बाद कारीगरों में इन चुनावों में वोट डालने का ज़बरदस्त उत्साह है. SIR के दौरान जो कई कारीगर बंगाल गए थे, वे चुनावों के बाद ही वापस लौटेंगे. सोने की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण सोने के गहने बनाने के काम में सुस्ती आ गई है. शादी के सीज़न में मांग तो होती है, लेकिन काम रोकना मुश्किल हो जाता है. मेरे पास खुद 12 लोगों का स्टाफ़ था, अब मेरे पास सिर्फ़ छह लोग बचे हैं, और जल्द ही तीन और लोग भी चले जाएंगे." 

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कई मज़दूरों ने कहा कि उन्हें डर है कि अगर उन्होंने वोट नहीं दिया, तो उनका नाम लिस्ट से काट दिया जाएगा, उनकी नागरिकता पर सवाल उठाया जाएगा और उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली जाएगी. अब्दुल्ला SIR के दौरान अपने होमटाउन हुगली गया था. उसने कहा, “मेरा नाम वोटर लिस्ट में आ गया है. मैं अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल करना चाहता हूं, जिससे भविष्य में कोई दिक्कत न हो. मेरे जान-पहचान के करीब 12 लोग पहले ही जा चुके हैं. मज़दूरों के चले जाने से मेरे मालिक का बिज़नेस ठप पड़ रहा है, लेकिन हम भी बेबस हैं. जैसे ही मुझे ट्रेन का टिकट मिल जाएगा, मैं भी चला जाऊंगा.”

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राज मंडल की उम्र सिर्फ़ 19 साल है. उसने कहा, “मैं पश्चिम मेदिनीपुर का रहने वाला हूं. मेरा नाम पहली बार लिस्ट में आया है. मेरा परिवार मुझे वोट डालने के लिए बुला रहा है. मैंने तीन बार तत्काल टिकट लेने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाया. अब जब मैं जा रहा हूं, तो कुछ महीनों बाद ही वापस आऊंगा.”

जब मैं वहां से निकल रहा था, तो मैंने सड़क पर एक स्टॉल देखा, जहां पूड़ी, सब्ज़ी और चावल बिक रहे थे. यह स्टॉल केरू काले का है. उसने बताया कि वह ज़वेरी बाज़ार में दूसरे राज्यों से आए मज़दूरों के लिए यह सस्ता खाना वाला स्टॉल चलाता है. उसने कहा, “मुझे खाने की मांग में 80% की कमी दिख रही है. ज़्यादातर मज़दूर पश्चिम बंगाल चले गए हैं. हम बहुत ही कम दामों पर खाना खिलाते हैं, फिर भी मांग में भारी कमी आई है, जो आने वाले दिनों में और भी बढ़ सकती है.”

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