बीएमसी चुनाव से पहले मुंबई की राजनीति गरमा गई है. आजतक मुंबई मंथन कार्यक्रम में हुई तीखी बहस के दौरान मराठी अस्मिता, मेयर की पहचान और मुंबई महानगरपालिका (BMC) में कथित भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और कांग्रेस के नेता आमने-सामने आ गए. बहस में साफ दिखा कि विकास के मुद्दों से ज्यादा लड़ाई राजनीतिक नैरेटिव और पहचान की राजनीति पर केंद्रित है.
कार्यक्रम में भाजपा नेता और महाराष्ट्र के आईटी एंड कल्चरल अफेयर मिनिस्टर आशीष शेलार ने बीएमसी में भ्रष्टाचार के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि 2014 के बाद यदि कहीं गड़बड़ी हुई है तो उसकी जांच भी हुई है और दोषियों पर कार्रवाई भी की गई है. शेलार ने दावा किया कि मुंबई आज भी देश का सबसे बेहतर सिविक इंफ्रास्ट्रक्चर वाला शहर है. उन्होंने कहा कि अगर हालात इतने खराब होते, तो देश के बड़े उद्योगपति, क्रिकेटर और फिल्मी सितारे मुंबई छोड़ चुके होते. मराठी बनाम गैर-मराठी की बहस को उन्होंने विपक्ष का 'नैरेटिव गढ़ने का प्रयास' बताया.
वहीं शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेता वरुण सरदेसाई ने भाजपा और शिंदे गुट पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि मराठी माणूस की पहचान नाम, सरनेम या धर्म से नहीं होती. सरदेसाई के मुताबिक जो मराठी भाषा का सम्मान करता है और मुंबई को अपना मानता है, वही असली मुंबईकर है. चाहे उसका नाम मेहता हो, शाह हो, यादव हो या खान. उन्होंने 'खान-कुरैशी' जैसे शब्दों के बार-बार इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह जानबूझकर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है. उनका दावा था कि मराठी वोट अब 'ठाकरे ब्रांड' के साथ कंसोलिडेट हो चुका है और मुंबई का मेयर मराठी होगा.
कांग्रेस की ओर से मुंबई मंथन में कांग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत ने भाजपा और शिवसेना दोनों को कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने कहा कि बीएमसी में 30 साल तक सत्ता में रहने वालों को भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी से बचने का अधिकार नहीं है. सावंत ने अवैध निर्माण, दलाल नेटवर्क, फिक्स्ड डिपॉजिट में गिरावट और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि अगर विकास का श्रेय साझा है, तो नाकामी और भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी भी साझा होनी चाहिए.
तीनों नेताओं के बीच 'मराठी मेयर बनाम हिंदू मेयर' का मुद्दा बहस का सबसे बड़ा केंद्र बना. शिवसेना ने इसे मुंबई की सांस्कृतिक पहचान और अस्मिता से जोड़ा, जबकि भाजपा ने इसे गैर-ज़रूरी और भटकाने वाला मुद्दा बताया. कांग्रेस ने इस पूरी बहस को बीएमसी के असली सवालों जैसे वायु प्रदूषण, जलभराव, गटर, कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक स्वास्थ्य से ध्यान हटाने वाला करार दिया.
कुल मिलाकर, ये बहस साफ संकेत देती है कि बीएमसी चुनाव अब सिर्फ नगर निकाय का चुनाव नहीं रह गया है. यह मराठी अस्मिता, हिंदुत्व, विकास और भ्रष्टाचार चारों के बीच राजनीतिक टकराव का बड़ा मंच बन चुका है. आने वाले दिनों में यही मुद्दे मुंबई की सियासत की दिशा और मतदाता का मूड तय करेंगे.