scorecardresearch
 

गिरफ्तारी की वजह मराठी में बताई, POCSO आरोपी को समझ नहीं आई... मुंबई कोर्ट ने दी राहत

मुंबई सत्र अदालत ने POCSO आरोपी अनिरुद्ध विजयकुमार को रिहा किया, क्योंकि उसे गिरफ्तारी के आधार मराठी में दिए गए थे, जिसे वह समझ नहीं पाया. कोर्ट ने इसे गंभीर प्रक्रिया खामी मानते हुए पर्सनल बॉन्ड पर रिहाई दी और जांच अधिकारी को नोटिस जारी किया.

Advertisement
X
पुलिस की लापरवाही से POCSO आरोपी को मिली राहत (File Photo)
पुलिस की लापरवाही से POCSO आरोपी को मिली राहत (File Photo)

मुंबई की एक अदालत से पुलिस की कार्रवाई पर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है. मामला एक POCSO आरोपी की गिरफ्तारी से जुड़ा है, जिसे कोर्ट ने इसलिए रिहा कर दिया क्योंकि उसे गिरफ्तारी की वजह ऐसी भाषा में नहीं बताई गई, जिसे वह समझ सके. आरोपी अनिरुद्ध विजयकुमार मूल रूप से कर्नाटक के मंगलुरु का रहने वाला है और उसे मराठी भाषा की समझ नहीं थी, लेकिन पवई पुलिस ने उसे मराठी में तैयार अरेस्ट मेमो दे दिया.

अनिरुद्ध विजयकुमार को रिमांड आवेदन संख्या 151/2026 के तहत दिंडोशी की सिटी सिविल और सेशंस कोर्ट में एड-हॉक जज एस.एन. सचदेव के सामने पेश किया गया था. कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सिर्फ किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवा लेना काफी नहीं है, जब तक यह साफ न हो कि आरोपी उसे समझ भी रहा है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत यह जरूरी है कि गिरफ्तारी की जानकारी आरोपी को उसकी समझ की भाषा में दी जाए. इसके अलावा, परिवार को सूचना देने में भी कमी पाई गई. इन दोनों आधारों पर अदालत ने माना कि गिरफ्तारी प्रक्रिया में गंभीर खामी रही.

मराठी में अरेस्ट मेमो बना विवाद, कोर्ट ने पुलिस से पूछा जवाब

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि पुलिस ने BNSS की धारा 47 और 48 का उल्लंघन किया है. आरोपी को यह तक स्पष्ट नहीं था कि उसे किस आधार पर पकड़ा गया है, क्योंकि अरेस्ट मेमो मराठी में था. कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि यह कानूनी प्रक्रिया का सही पालन नहीं है. साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने जांच अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया.

Advertisement

अदालत ने आरोपी को 30,000 रुपये के पर्सनल बॉन्ड  पर रिहा करने का आदेश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 18 मई को तय की गई है, जहां पुलिस को अपनी प्रक्रिया पर जवाब देना होगा. यह मामला दिखाता है कि गिरफ्तारी जैसे संवेदनशील मामलों में नियमों की छोटी सी अनदेखी भी बड़े कानूनी फैसले को प्रभावित कर सकती है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement