महाराष्ट्र सरकार के कानून और न्यायपालिका विभाग ने पूर्व राज्यसभा सांसद और बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका का विरोध किया है. विभाग ने महाराष्ट्र के पंढरपुर मंदिर पर सरकारी नियंत्रण के खिलाफ दाखिल उनकी याचिका का विरोध करते हुए अपना जवाब दाखिल किया है.
उप सचिव ने अपने जवाब में कहा है कि स्वामी की याचिका इस आधार पर आधारित है कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर पहले विचार नहीं किया गया है या निर्णय नहीं लिया गया है. जवाब में कहा गया है कि मुख्य मुद्दा यानी अधिनियम की संवैधानिकता और याचिका में उठाए गए मु्द्दों को पहले भी उठाया गया है. भारतीय न्यायपालिका के सभी स्तरों ने इस पर विचार किया है.
जवाब में आगे कहा गया है कि महाराष्ट्र का पंढरपुर मंदिर सार्वजनिक मंदिर है. अलग-अलग मतों को मानने वाले लोगों की इसमें आस्था है. 1973 का पंढरपुर मंदिर अधिनियम (पीटीए) उनके संरक्षित धार्मिक अधिकारों को प्रभावित नहीं करता है. स्वामी की याचिका में पीटीए को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि महाराष्ट्र सरकार ने पंढरपुर में मंदिर का प्रशासन मनमाने ढंग से अपने हाथ में ले लिया है.
जवाब में कहा गया है कि1960 के दशक के आसपास सरकार को पुजारी वर्गों के खिलाफ कुप्रबंधन और कदाचार और उपासकों के उत्पीड़न की कई शिकायतें मिलीं. इसके बाद सरकार ने एक जांच आयोग का गठन किया, जिसने मंदिरों में कार्यरत पुजारी वर्गों के सभी वंशानुगत अधिकारों और विशेषाधिकारों को समाप्त करने के लिए पीटीए अधिनियमित करने का निर्णय लिया था.
सरकार ने दोहराया कि यह अधिनियम सार्वजनिक हित में और आर्थिक और धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था. इसने नागरिकों के धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं किया. यह अधिनियम आम जनता के हित में पेश किया गया था और इसका उद्देश्य आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों में बदलाव लाने के साथ-साथ सामाजिक कल्याण और धार्मिक अभ्यास से जुड़े सुधार प्रदान करना था. हलफनामे में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि यह अधिनियम किसी भी तीर्थयात्री या भक्त को दिए गए संरक्षित धार्मिक अधिकार को प्रभावित नहीं करता है और प्रचलित पारंपरिक उपयोग और रीति-रिवाज के अनुसार धार्मिक संस्कारों के प्रदर्शन और धार्मिक प्रथाओं के पालन की सुरक्षा करता है.