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साढ़े 7 एकड़ जमीन मिलते ही पोतों ने बेसहारा छोड़ा, दादी ने केस कर दिया, गिफ्ट डीड कैंसिल

महाराष्ट्र के लातूर में 89 साल की महिला ने अपने पोतों से साढ़े 7 एकड़ जमीन वापस हासिल कर ली. महिला ने देखभाल नहीं होने का आरोप लगाया था, जिसके बाद सीनियर सिटिजन ट्रिब्यूनल ने गिफ्ट डीड रद्द कर संपत्ति फिर उनके नाम करने का आदेश दिया.

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देखभाल न करने पर कोर्ट ने पोतों की गिफ्ट डीड की रद्द. (Reparation photo Pixabay)
देखभाल न करने पर कोर्ट ने पोतों की गिफ्ट डीड की रद्द. (Reparation photo Pixabay)

महाराष्ट्र के लातूर जिले में 89 साल की एक बुजुर्ग महिला ने अपने ही पोतें के खिलाफ कानूनी लड़ाई जीतकर साढ़े 7 एकड़ जमीन वापस हासिल कर ली. आरोप है कि जमीन अपने नाम कराने के बाद दोनों ने दादी की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाई. इसके बाद बुजुर्ग महिला ने सीनियर सिटिजन ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया, जहां सुनवाई के बाद गिफ्ट डीड रद्द कर दी गई. इस फैसले के साथ जमीन का अधिकार फिर से महिला को मिल गया. अब यह मामला इस वजह से चर्चा में है कि बुजुर्गों की देखभाल के वादे पर ली गई संपत्ति को कानून के जरिए वापस भी लिया जा सकता है.

यह पूरा मामला लातूर जिले के करसा गांव का है. पीड़ित बुजुर्ग महिला हौसाबाई लहाड़े ने अपनी तीन हेक्टेयर (लगभग साढ़े सात एकड़) उपजाऊ खेती की जमीन अपने पोते और परपोते के नाम कर दी थी. उन्होंने यह जमीन एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के जरिए इस उम्मीद में सौंपी थी कि दोनों पोते उनके बुढ़ापे का सच्चा सहारा बनेंगे. वे जीवन के आखिरी पड़ाव में उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखेंगे.

जमीन मिलते ही बदले पोतों के तेवर

जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम होते ही दोनों पोतों ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया. उन्होंने बुजुर्ग हौसाबाई की देखभाल करने और उन्हें भोजन-दवाई देने से साफ मना कर दिया. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, जब प्रताड़ना हद से ज्यादा बढ़ गई, तब हौसाबाई ने हिम्मत दिखाई. उन्होंने Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act (माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण कानून) 2007 के तहत ट्रिब्यूनल में कानूनी न्याय की गुहार लगाई, ताकि उन्हें अपनी ही जमीन वापस मिल सके.

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सीनियर सिटिजन ट्रिब्यूनल की पीठासीन अधिकारी रोहिणी नरहे-विरोले ने मामले की गहन सुनवाई की. उन्होंने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद साफ कहा कि बुजुर्ग माता-पिता की सेवा करना सिर्फ एक नैतिक जिम्मेदारी नहीं है. जब कोई संपत्ति इस वादे पर ट्रांसफर की जाती है, तो बुजुर्गों की देखभाल करना एक कानूनी शर्त बन जाती है. पोतों ने इस शर्त का खुला उल्लंघन किया था, इसलिए उनका जमीन पर अब कोई अधिकार नहीं बचता.

अदालत ने न केवल रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड को रद्द किया, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज पोतों के नामों को भी तुरंत हटाने का निर्देश दिया. इसके साथ ही प्रशासन ने हौसाबाई के मालिकाना हक को दोबारा पूरी तरह बहाल कर दिया. कोर्ट ने स्थानीय अधिकारियों को साफ हिदायत दी कि भविष्य में इस जमीन पर बुजुर्ग महिला के काम में किसी भी तरह की कोई बाधा उत्पन्न न की जाए.

अदालत का डंडा यहीं नहीं रुका. ट्रिब्यूनल ने यह कड़ा आदेश भी जारी किया कि इस विवादित अवधि के दौरान जमीन से मिले तमाम सरकारी लाभ, सब्सिडी या फसल बीमा का जो भी पैसा पोतों ने उठाया था, वह सब उन्हें ब्याज समेत वापस लौटाना होगा. इस कड़े फैसले ने संपत्ति के लालच में आकर अपने ही घर के बुजुर्गों को अकेला छोड़ने वाले लोगों को एक बहुत बड़ा सबक दिया है.

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