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MP उपचुनाव: दलित वोट साधने के लिए कांग्रेस कर रही BSP में सेंधमारी

मध्य प्रदेश की 24 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव में शह-मात का खेल जारी है. बसपा प्रमुख मायावती ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान करके कमलनाथ की बेचैनी को बढ़ा दिया है. कांग्रेस ने दलित वोट साधने के लिए बसपा में सेंधमारी शुरू कर दी है. हाल ही में बसपा के कई नेता कांग्रेस में शामिल हुए हैं.

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एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ
एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ

  • मध्य प्रदेश की 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव तेज
  • चंबल-ग्वालियर में करीब 20 फीसदी दलित मतदाता हैं

मध्य प्रदेश की 24 विधानसभा सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. उपचुनाव वाली ज्यादा तक सीटें ग्वालियर-चंबल संभाग की हैं, जहां दलित मतदाता काफी अहम और निर्णायक माना जाता है. बसपा प्रमुख मायावती ने इन सीटों पर चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान करके पूर्व सीएम कमलनाथ की बेचैनी को बढ़ा दिया है तो कांग्रेस ने दलित वोट साधने के लिए बसपा में सेंधमारी शुरू कर दी है.

बसपा नेता प्रागी लाल जाटव सहित दो दर्जन से अधिक नेताओं ने मायावती का साथ छोड़कर रविवार को कांग्रेस का दामन थाम लिया है. जाटव पहले शिवपुरी के करेरा निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़े थे और तीसरे नंबर पर रहे थे. इसके अलावा डबरा नगरपालिका की पूर्व अध्यक्ष सत्य प्रकाशी बीएसपी कार्यकर्ताओं के साथ कांग्रेस में शामिल हो गईं. ये दोनों नेता ग्वालियर-चंबल इलाके में बसपा का बड़ा चेहरा माने जाते थे. इससे पहले बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार, पूर्व विधायक सत्यप्रकाश और पूर्व सांसद देवराज सिंह पटेल कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं.

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मध्य प्रदेश की जिन 24 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें 9 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं तो एक सीट अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित है. इसके अलावा 14 सीटें सामान्य जातियों के लिए हैं. इन सभी सीटों पर करीब 20 फीसदी दलित मतदाता हैं. दलित बहुल और उत्तर प्रदेश से सटा होने के चलते इस इलाके में बसपा का अच्छा खासा इलाके में जनाधार है.

बसपा की चंबल-ग्वालियर में ताकत

ग्वालियर-चंबल संभाग के तहत आने वाली सीटों पर बसपा को अच्छा खासा वोट मिलता रहा है. पिछले चुनाव में 15 सीटों पर उसे निर्णायक वोट मिले थे. इनमें से दो सीटों पर बसपा प्रदेश में दूसरे नंबर पर रही थी जबकि 13 सीटें ऐसी थीं, जहां बसपा प्रत्याशियों को 15 हजार से लेकर 40 हजार तक वोट मिले थे. ग्वालियर-चंबल की जिन सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं, उनमें से मेहगांव, जौरा, सुमावली, मुरैना, दिमनी, अंबाह, भांडेर, करैरा और अशोकनगर सीट पर बसपा पूर्व के चुनाव में जीत दर्ज कर चुकी है.

2018 के विधानसभा चुनाव में गोहद, डबरा और पोहरी में बसपा दूसरे नंबर पर रही है जबकि ग्वालियर, ग्वालियर पूर्व और मुंगावली में उसकी मौजूदगी नतीजों को प्रभावित करने वाली साबित हुई. मुरैना में बीजेपी की पराजय में बसपा की मौजूदगी प्रमुख कारण था. इसके अलावा पोहरी, जौरा, अंबाह में बसपा के चलते भाजपा तीसरे नंबर पर पहुंच गई थी.

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बसपा ने 2018 में ग्वालियर-चंबल की 16 सीटों पर निर्णायक वोट हासिल किए थे. इनमें अंबाह 22179, अशोकनगर 9559, करैरा 40026, ग्वालियर 4596, ग्वालियर पूर्व 5446, गोहद 15477, डबरा 13155, दिमनी 14458, पोहरी 52736, भांडेर 2634, मुंगावली 14202, मुरैना 21149, मेहगांव 7579, बमोरी 7176, सुमावली 31331 एवं जौरा में बसपा प्रत्याशी को 41014 वोट मिले थे.

2018 में दलितों की पसंद बनी थी कांग्रेस

दरअसल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित संगठनों ने 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद किया था. भारत बंद के दौरान ग्वालियर-चंबल इलाके में हिंसा भड़क गई थी, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी और काफी लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई थी. उस समय मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी, जिससे दलित समुदाय काफी नाराज थी और चुनाव में उसका फायदा कांग्रेस को मिला था.

मध्य प्रदेश के 2018 विधानसभा में दलित की पहली पसंद कांग्रेस बनी थी और इसी के सहारे चंबल-ग्वालियर इलाके में बीजेपी का पूरी तरह सफाया हो गया था. दलित समुदाय का कहना है कि कांग्रेस सत्ता में आने के बाद उनके मुद्दों को भूल गई, 15 महीने सत्ता में रहने के दौरान कमलनाथ सरकार ने 2 अप्रैल को दलितों पर दर्ज मुकदमे वापस नहीं लिए. हालांकि, इस दिशा में कमलनाथ ने कदम जब बढ़ाया तो सरकार चली गई और दलितों के मुकदमे वापस नहीं हो सके. ऐसे में बसपा उपचुनाव में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर अपने कोर दलित वोटबैंक को साधने में जुटी है. ऐसे में कांग्रेस की नजर बसपा नेताओं पर है, जिनके दम पर सत्ता में वापसी का सपना देख रही है.

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