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MP: कैबिनेट विस्तार में किसे दें जगह? शिवराज के सामने नई चुनौती

सीएम शिवराज सिंह चौहान के सामने असली चुनौती होगी कि वह कैबिनेट की बची हुई सीटों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को शामिल करें या फिर बीजेपी के उन नेताओं को जिनको पिछले कैबिनेट विस्तार में जगह नहीं मिल पाई थी. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उप-चुनाव में अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया और कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आए नेताओं को जिताने में महती भूमिका निभाई.

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 मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान
स्टोरी हाइलाइट्स
  • एमपी में अब सबकी नजर मंत्रिमंडल विस्तार पर
  • कैबिनेट में सिंधिया या बीजेपी समर्थकों को मिलेगी जगह
  • सिंधिया समर्थकों, बीजेपी विधायकों में कैसे हो संतुलन

मध्य प्रदेश विधानसभा के उप-चुनाव के नतीजे आने के बाद अब सबकी नजर मंत्रिमंडल विस्तार पर है. दरअसल, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भले ही अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया है, पार्टी और खासतौर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने एक अलग चुनौती है. 

सीएम शिवराज सिंह चौहान के सामने असली चुनौती होगी कि वह कैबिनेट की बची हुई सीटों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को शामिल करें या फिर बीजेपी के उन नेताओं को जिनको पिछले कैबिनेट विस्तार में जगह नहीं मिल पाई थी. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उप-चुनाव में अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया और कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आए नेताओं को जिताने में महती भूमिका निभाई. 

दरअसल, उप-चुनाव में जीत के बाद सीएम शिवराज ने मंगलवार को मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल से मुलाकात की थी. हालांकि उन्होंने इस मुलाकात को औपचारिक बताया, लेकिन इस मुलाकात के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या दिवाली के बाद कभी भी शिवराज कैबिनेट का विस्तार हो सकता है? अगर ऐसा होता है तो मुख्यमंत्री के सामने चुनौती होगी कि वो अपनी कैबिनेट में सिंधिया समर्थकों और बीजेपी के अपने विधायकों के बीच संतुलन कैसे बनाएं?

दरअसल मार्च 2020 में घटे राजनीतिक घटनाक्रम के बाद कमलनाथ सरकार गिर गई थी और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह थे ज्योतिरादित्य सिंधिया जब उनके 19 समर्थकों समेत कांग्रेस के कुल 22 विधायकों ने इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था. बदले में बीजेपी की सरकार बनने के बाद शिवराज मंत्रिमंडल में सिंधिया समर्थकों को सबसे ज्यादा तवज्जो दी गयी थी लेकिन इसके कारण बीजेपी के अपने कई नेता मंत्रिपद की दौड़ से बाहर हो गए थे. 

अब उप-चुनाव में जीत के बाद कैबिनेट विस्तार होना तय है. ऐसे में सिंधिया समर्थकों समेत बीजेपी नेताओं में भी मंत्रीपद की उम्मीद जगी है. हालांकि बीजेपी बोल रही है कि यहां किसी एक नेता के समर्थक नहीं बल्कि पूरी पार्टी होती है. लिहाजा ये कहना गलत होगा कि सिंधिया समर्थकों को जगह मिलेगी या नहीं. 

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'आजतक' से बात करते हुए प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने कहा, 'कैबिनेट को लेकर कोई चुनौती नहीं है. कैबिनेट को लेकर माननीय मुख्यमंत्री जी को अपना अधिकार है. इस कठिन चुनाव में बीजेपी को बहुमत नहीं प्रचंड बहुमत मिला है. यह सामान्य नहीं, जनता ने जो भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया है. सिंधिया समर्थक, कोई किसी का नहीं है सब भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता हैं'. वहीं सहकारिता मंत्री अरविंद भदौरिया ने भी 'आजतक' से बातचीत में कहा, 'अब सब बीजेपी समर्थक मंत्री हो गए हैं और माननीय सिंधिया जी भी बीजेपी के रीति नीति में ढल गए हैं. इसलिए कैबिनेट में जिसको भी जगह मिलेगी वह जाहिर तौर पर बीजेपी का ही कार्यकर्ता होगा'. 

दरअसल मार्च में घटे राजनीतिक घटनाक्रम के बाद मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार बन गई थी. 

- इसके बाद जब कैबिनेट का गठन हुआ और उसका विस्तार हुआ तो  33 मंत्रियों में से 11 सिंधिया समर्थक नेताओं को मंत्री बनाया गया. 
-इसके अलावा तीन ऐसे नेता जो कांग्रेस से बगावत कर बीजेपी में आए थे उन्हें भी मंत्री पद से नवाजा गया था. 
-हाल ही में उप-चुनाव के नतीजे आए तो इसमें से सिंधिया समर्थक दो मंत्री इमरती देवी और गिर्राज दंडोतिया को हार का मुंह देखना पड़ा. 
-वहीं कांग्रेस से बगावत कर आए मंत्री एंदल सिंह कंसाना भी उपचुनाव में हार गए. 
-चुनाव से ठीक पहले गोविंद सिंह राजपूत और तुलसी सिलावट ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. 
-ऐसे में फिलहाल शिवराज कैबिनेट में छह मंत्रियों का पद खाली है (इमरती देवी और गिर्राज डंडोतिया ने इस्तीफा नहीं दिया है लेकिन उनका मंत्री पद का कार्यकाल पूरा होने पर उन्हें मंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ेगी).

ऐसे में शिवराज सिंह चौहान के सामने अब असली चुनौती होगी कि इन रिक्त मंत्री पदों पर सिंधिया समर्थकों को तवज्जो दी जाए या फिर बीजेपी के ही उन नेताओं को जिन्हें पिछली बार मंत्रिमंडल से दूर रखा गया था. दरअसल उपचुनाव में बीजेपी को सबसे बड़ा खतरा भीतरघात से था कि टिकट ना मिलने की सूरत में नेता बगावत कर सकते हैं. लेकिन बीजेपी अपने नेताओं के गुस्से को काबू में करने में काफी हद तक कामयाब रही. ऐसे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर मंत्रिमंडल में अपनी बारी का इंतजार कर रहे नेताओं को जगह देने का दबाव इस बार ज्यादा रहेगा.  


 

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