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मध्य प्रदेश विधानसभा उपचुनावः मेहनत से संतुष्ट कमलनाथ

ऐसा लगता है कि सारी कोशिशों के बावजूद कमलनाथ इस समस्या को दूर करने में सफल नहीं हुए हैं. अगर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करती है लेकिन सरकार नहीं बना पाती है तो क्या होगा?

योजना तैयार है सांची के गैरतगंज में 29 अक्तूबर को जनसभा को संबोधित करते कमलनाथ योजना तैयार है सांची के गैरतगंज में 29 अक्तूबर को जनसभा को संबोधित करते कमलनाथ

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ (73 वर्ष) 3 नवंबर को उपचुनावों से पहले दिनचर्या के तहत अपने हेलिकॉप्टर में सवार होकर हर रोज 2-3 निर्वाचन क्षेत्रों में जनसभा को संबोधित करने निकल जाते थे. छिंदवाड़ा के सांसद ने अपने बेटे नकुल के साथ प्रदेश के छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में घंटों जमकर चुनाव प्रचार किया. ये उपचुनाव कुछ अलग रहे हैं क्योंकि लंबे समय के बाद ऐसा है जब कांग्रेस के अंदर किसी तरह की गुटबाजी और दबाव देखने को नहीं मिला जबकि कांग्रेस की मध्य प्रदेश इकाई इसके लिए बदनाम रही है.

मार्च में ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलग होने के बाद दो राज्य में अन्य क्षत्रप पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ ज्यादातर मुद्दों पर एकमत नजर आए. मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विपक्ष के नेता के तौर पर कमलनाथ ने अब राज्य में पार्टी के मामलों में पूरा नियंत्रण बना लिया है और यह नजर भी आता है. टिकट वितरण, मीडिया और चुनाव प्रचार की रणनीति सब कुछ उनकी ही योजना के मुताबिक हुआ. वे बताते हैं कि आठ महीने पहले सरकार गिरने के तुरंत बाद ही उन्होंने चुनाव प्रचार की रणनीति तैयार करने और योजना पर काम करना शुरू कर दिया गया था. वे कहते हैं, ''लोग पार्टी से दगाबाजी करने वालों से खुश नहीं हैं. वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे.'' जनसभाओं को संबोधित करते हुए वे सबसे पहले 'गद्दारी' पर ही बात करते थे.

उसके बाद 'बिकाऊ' बनाम 'टिकाऊ' का मुद्दा उठाते थे. कमलनाथ संबोधन में आम तौर पर दलबदलू विधायकों पर निशाना साधते थे. भाषणों में वे 15 महीने की अपनी सरकार की उपलब्धियां और मौजूदा भाजपा सरकार की विफलताओं को गिनाते हैं और अंत में स्थानीय मुद्दे और वहां के उम्मीदवार के बारे में भी बात करते हैं. कुछ सभाओं को छिंदवाड़ा के सांसद नकुल नाथ ने भी संबोधित किया. इसका मकसद कुछ हद तक यह भी था कि भाजपा कांग्रेस पर यह कहकर निशाना न साध सके कि उसके यहां युवा नेताओं का अभाव है. नकुल कहते हैं, ''युवा आकर देखें कि कमलनाथ जी ने छिंदवाड़ा में निवेश लाकर और लोगों को रोजगार देकर क्या काम किया है.'' वे वादा करते हैं कि उनके पिता अगर सत्ता में दोबारा आते हैं तो पूरे राज्य के लिए ऐसा ही काम करके दिखाएंगे.

कमलनाथ ने राज्य में पार्टी के सभी नेताओं को कुछ न कुछ काम सौंपा था चाहे वे किसी भी पद पर हो. इसके पीछे उनका यही उद्देश्य था कि सभी नेता और कार्यकर्ता पूरी जिम्मेदारी से हिस्सा लें और उन्हें लगे कि उपचुनाव में उनकी साख भी दांव पर लगी है.

निर्वाचन क्षेत्रों के कैंप ऑफिस में कमलनाथ पार्टी नेताओं से मुलाकात करते हैं और जिन नेताओं को कोई जिम्मेदारी दी गई थी, उनके बारे में जानकारी हासिल करते हैं. चुनाव में लोगों के बीच उन्होंने जितना समय बिताया वह उनके राजनैतिक विरोधियों के मुकाबले भले ही कम हो लेकिन उनकी योजना और चतुराई के साथ बनाई गई रणनीति को देखें तो यह कमी ज्यादा मायने नहीं रखती है. कागजों के पुलिंदे में निर्वाचन क्षेत्र के बारे में पूरी जानकारी दर्ज है और हाथ से लिखे कार्डों पर उन मुद्दों का जिक्र है जिन पर रैलियों में जोर देना है. जमीन पर काम करने वाले नेताओं से वे जो सवाल करते हैं वे उस निर्वाचन क्षेत्र के जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दों के बारे में होते हैं. वे यह भी जानकारी मांगते हैं कि वहां किन नेताओं को आगे लाया जाए और किन्हें दूर रखना चाहिए.

सभी विधानसभा चुनावों की तरह अगर 'गद्दारी' राज्य स्तर का मुद्दा है और सभी 25 निर्वाचन क्षेत्रों (इनमें से ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में आने वाले 16 सीटों पर विशेष रूप से) में इसका जिक्र किया जाता है तो स्थानीय मुद्दों को भी उठाया जाता है जिससे यह उपचुनाव बहुत कांटे का हो गया है.

सांची के सतकुंडा गांव में गोपीलाल, जिन्होंने कांग्रेस के पूर्व विधायक प्रभुराम चौधरी के चुनाव प्रचार का जिम्मा संभाला था, वे इस बार भी वही काम कर रहे हैं लेकिन भाजपा के एजेंट के तौर पर. इस प्रक्रिया में भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता नाराज हैं. गांव के प्रेमनारायण कहते हैं, ''पिछली बार हमने पार्टी के लिए काम किया था लेकिन इस बार भाजपा के प्रत्याशी तक ने हमसे कोई बात नहीं की.'' 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को यहां डाले गए 600 वोटों में से 550 वोट मिले थे. लेकिन इस बार यह गांव पिछली बार की तरह वोट नहीं देने वाला है क्योंकि एक स्थानीय प्रतिद्वंद्वी उनकी पार्टी का उम्मीदवार है.

बहुत से मतदाता अब भी भाजपा को वोट देंगे लेकिन बहुत से ऐसे भी हैं जो स्थानीय समीकरणों के कारण शायद ऐसा नहीं करेंगे. पूरे क्षेत्र में राजनैतिक रेखाएं धुंधली पड़ जाने से ऐसी ही स्थिति पैदा हो गई है. मजे की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अब भी लोगों में लोकप्रिय बने हुए हैं. गैरतगंज के निवासी दिनेश शर्मा कहते हैं, ''लोकसभा के चुनाव में मैंने मोदी को वोट दिया था लेकिन कांग्रेस की सरकार को जिस तरह गिराया गया, वह मुझे अच्छा नहीं लगा. उन्हें पांच साल दिए जाने चाहिए थे.''

कांग्रेस ने जिन सीटों पर भाजपा के विद्रोही नेताओं को खड़ा किया है उनमें से एक सुरखी भी है, जहां कांग्रेस ने अलग मुद्दों को उठाया है. सुरखी में कमलनाथ कहते हैं, ''चुनाव कांग्रेस या भाजपा को लेकर नहीं है बल्कि लोकतंत्र के भविष्य को लेकर है. जो लोग जीतने के बाद खुद को बेच देते हैं तो आप भूल जाइए कि पंचायत के चुनाव भी निष्पक्ष हो सकते हैं.''

कमलनाथ बाहर से साहस का परिचय देते हैं लेकिन वे जानते हैं कि उनकी लड़ाई आसान नहीं है. भाजपा को सत्ता में बने रहने के लिए 28 में से 8 सीटें जीतने की जरूरत है. जब उनसे पूछा जाता है कि कांग्रेस अगर 28 में से ज्यादातर सीटें जीत जाती है लेकिन सरकार बनाने के लिए जरूरी सीटें नहीं मिल पाती हैं तो क्या होगा, इस पर उनका जवाब होता है, ''अगर मैं कहूंगा तो 7 निर्दलीय, बसपा और सपा के विधायक कांग्रेस के साथ आ जाएंगे.'' कमलनाथ आश्वस्त नजर आते हैं लेकिन इस सचाई को भूल जाते हैं कि राज्य और केंद्र में भाजपा की सरकार उन विधायकों को कांग्रेस के साथ जाने से रोक भी सकती है. उनसे जब यह पूछा जाता है कि भाजपा संगठन का मुकाबला कैसे करेंगे जो अपने मतदाताओं को वोट डालने के लिए बूथ तक ले आता है तो उनका जवाब होता है, ''जब लोगों में नाराजगी होती है तो कोई भी संगठन दोषी को बचा नहीं सकता है.''

कांग्रेस को एक अन्य समस्या से भी जूझना पड़ रहा है—अपने विधायकों को संगठित रखने में अक्षमता. पार्टी का दावा है कि वह सत्ता में वापस आ रही है और दलबदलू चुनाव हार रहे हैं. लेकिन वह दमोह से अपने विधायक राहुल लोधी को भाजपा में जाने से नहीं रोक पाई. अटकलें हैं कि कांग्रेस के कुछ अन्य विधायक भी जरूरत पडऩे पर इस्तीफा देने के लिए तैयार बैठे हैं (ऐसा हुआ तो भाजपा को बहुमत का आंकड़ा हासिल हो जाएगा). ऐसा लगता है कि सारी कोशिशों के बावजूद कमलनाथ इस समस्या को दूर करने में सफल नहीं हुए हैं. अगर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करती है लेकिन सरकार नहीं बना पाती है तो क्या होगा? क्या कमलनाथ राजनैतिक को हमेशा के लिए अलविदा कह देंगे? उनका जवाब है, ''मैं कहीं नहीं जा रहा हूं. लंबे समय तक इसमें रहने वाला हूं.''

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