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J&K: पर्यावरण को सुरक्षित रखने गाय के गोबर से दीये बनाने के लिए ओवर टाइम काम कर रही महिलाएं

जम्मू से लगभग 20 किलोमीटर दूर जम्मू-अखनूर रोड पर मिश्रीवाला गांव में महिलाओं द्वारा दीये बनाने की प्रक्रिया का निरीक्षण कर रहे रजत ने कहा कि उनकी कंपनी ने ग्रामीण महिलाओं को इसके लिए प्रशिक्षित किया और उन्हें सादे एवं आकर्षक दीये बनाने के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चा माल उपलब्ध कराया है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

जम्मू-कश्मीर में ग्रामीण महिलाओं का एक समूह पर्यावरण-अनुकूल दिवाली सुनिश्चित करने के लिए गाय के गोबर के दीये बनाने के लिए ओवर टाइम काम कर रही हैं. एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता से उद्यमी बने रजत सालगोत्रा ने त्योहार के दौरान महिला सशक्तीकरण और प्लास्टिक से बने उत्पादों पर निर्भरता कम करने के दोहरे उद्देश्यों के साथ गाय के गोबर से दीये बनाने की यह पहल की है.

रजत सालगोत्रा ने नवंबर 2021 में ‘समस्त इको-अल्टरनेटिव्स प्राइवेट लिमिटेड’ नामक अपना स्टार्ट-अप शुरू किया था. उनकी कंपनी पिछले साल जम्मू के बाजारों में गाय के गोबर से बने दीये पेश करने वाली पहली कंपनी थी और उनकी इस साल 12 नवंबर को मनाए जाने वाले रोशनी के त्योहार दीपावली के लिए 20,000 से अधिक दीये उपलब्ध कराने की योजना है.

गैर-सरकारी संगठन दिशा फाउंडेशन के सदस्य रजत सालगोत्रा ने कहा कि हम प्राचीन काल से ही पूजा के लिए गाय के गोबर का उपयोग करते आ रहे हैं. हमारा उद्देश्य गांव की महिलाओं को सशक्त बनाना और मूर्तियों तथा गोबर के दीयों जैसे पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों का उत्पादन करके पर्यावरण की रक्षा करना है. पिछले साल, हमने गाय के गोबर से बने आठ हजार दीये बेचे थे.

जम्मू से लगभग 20 किलोमीटर दूर जम्मू-अखनूर रोड पर मिश्रीवाला गांव में महिलाओं द्वारा दीये बनाने की प्रक्रिया का निरीक्षण कर रहे रजत ने कहा कि उनकी कंपनी ने ग्रामीण महिलाओं को इसके लिए प्रशिक्षित किया और उन्हें सादे एवं आकर्षक दीये बनाने के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चा माल उपलब्ध कराया है.

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रजत ने कहा, 'गाय के गोबर से बने दीये मिट्टी के दीयों से अलग होते हैं. इसे पूरी तरह से जला दिया जाता है और राख या उत्पाद का उपयोग कीटनाशक अथवा उर्वरक के रूप में किया जा सकता है, जिससे कोई नुकसान नहीं होता है. उत्पाद को धूप में सुखाया जाता है और इन्हें रिसावरोधी बनाने के लिए किसी रसायन या कृत्रिम रंग का उपयोग नहीं किया जाता है.'

उन्होंने कहा कि विनिर्माण से लेकर निपटान तक की पूरी प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल है और इससे गांव की महिलाओं को रोजगार मिल रहा है.

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