हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने शहर का सियासी और सामाजिक पारा गरमा दिया है. यहां के प्रसिद्ध राम मंदिर में एक मुस्लिम परिवार की शादी का रिसेप्शन यानी दावत रखने की बात सामने आई, तो हिंदू संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जता दी. लोगों का कहना है कि मंदिर परिसर में इस तरह के आयोजन नहीं होने चाहिए. विवाद इतना बढ़ा कि मंदिर कमेटी को सामने आकर सफाई देनी पड़ी और साफ करना पड़ा कि वहां आखिर होने क्या जा रहा है.
असल में, राम मंदिर सूद सभा की ओर से मंदिर का कामकाज देखा जाता है. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, जब इस बुकिंग को लेकर सवाल उठे, तो कमेटी के अध्यक्ष राजीव सूद ने साफ किया कि यह बुकिंग किसी धार्मिक काम के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ एक रिसेप्शन के लिए की गई है. उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम मंदिर के कम्युनिटी हॉल में होना है, न कि मुख्य मंदिर के अंदर. कमेटी ने यह भी कहा कि आयोजकों से लिखित में लिखवा लिया गया है कि वहां नमाज या कोई भी मुस्लिम धार्मिक गतिविधि नहीं होगी.
नियम टूटे तो कटेगी बिजली और पहुंचेगी पुलिस
विवाद को बढ़ता देख मंदिर कमेटी अब काफी सख्त मूड में नजर आ रही है. राजीव सूद ने बताया कि पिछले 5 सालों में यहां अलग-अलग समुदायों के करीब 15-16 रिसेप्शन हो चुके हैं और कभी कोई समस्या नहीं आई. लेकिन इस बार के विरोध को देखते हुए सुरक्षा और निगरानी बढ़ा दी गई है. हॉल में लगे सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाई जाएगी और कमेटी के दो कर्मचारी पूरे समय वहां तैनात रहेंगे ताकि हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके.
कमेटी ने एक बड़ी चेतावनी भी दी है. उन्होंने कहा है कि अगर कार्यक्रम के दौरान किसी ने भी नियमों का उल्लंघन किया या कोई धार्मिक गतिविधि करने की कोशिश की, तो बीच में ही हॉल की बिजली काट दी जाएगी. इतना ही नहीं, फौरन पुलिस को भी बुला लिया जाएगा. यानी कमेटी ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती और मंदिर की मर्यादा का पूरा ख्याल रखा जाएगा.
दूसरी तरफ, हिंदू संगठनों का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ है. देवभूमि संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि अगर मंदिर परिसर में ऐसा कोई भी आयोजन होता है, तो वे उग्र प्रदर्शन करेंगे. फिलहाल प्रशासन और मंदिर कमेटी दोनों ही स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं ताकि शहर का माहौल खराब न हो. आसान शब्दों में कहें तो मंदिर कमेटी ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की है, लेकिन विरोध करने वाले इसे मंदिर की परंपरा के खिलाफ मान रहे हैं.