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हिमाचल प्रदेश में भाजपा के लिए क्यों ज़रूरी हैं प्रेम कुमार धूमल?

Prem Kumar Dhumal: हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा को एकबार फिर से अपने सबसे लोकप्रिय नेता की याद आ रही है. वजह है प्रेम कुमार धूमल की सक्रियता, जड़ें और संगठन पर पकड़.

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हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम सिंह धूमल हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम सिंह धूमल
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स्टोरी हाइलाइट्स
  • हिमाचल में इसी साल आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं
  • 2017 में बीजेपी को जिताया पर खुद धूमल हार गए चुनाव
  • एक मजबूत राजपूता नेता के तौर पर धूमल की पहचान

हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के पैर जमाने और उसे गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए जिन नेतृत्वकर्ताओं की सबसे अहम भूमिका रही है, उनकी पहली पंक्ति का नाम है प्रेम कुमार धूमल. धूमल की गिनती हिमाचल के कद्दावर नेताओं में की जाती है. धूमल ने हिमाचल में न केवल पार्टी और सरकार का नेतृत्व किया है, बल्कि पार्टी को खड़ा करने और संगठन बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाई है. 

यही कारण है कि साल 2017 में चुनाव हारने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी में उनका महत्व कम नहीं हुआ. जयराम ठाकुर के मुख्यमंत्री बनने के बाद भले ही अब सत्ता का केंद्र हमीरपुर से निकल कर मंडी हो गया हो लेकिन हमीरपुर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. राज्य में राजनीतिक और जातीय गणित से लेकर कार्यकर्ताओं में अपनी पैठ के कारण भी धूमल अभी भी पार्टी के लिए एक ट्रंप कार्ड हैं. 

जनता के बीच मजबूत कनेक्शन

धूमल जब पिछला विधानसभा चुनाव हारे थे तो कई लोग उनकी राजनीतिक यात्रा का पूर्णविराम घोषित करके आगे बढ़ने की भविष्यवाणी करने लगे थे. लेकिन धूमल के व्यक्तित्व के आगे ऐसी भविष्यवाणियां छोटी साबित हुई हैं. अपने चुनाव में हार के महज एक सप्ताह बाद ही धूमल फिर से कार्यकर्ताओं और लोगों के बीच थे. धूमल का यह पब्लिक कनेक्ट पिछले साढ़े चार साल में कमज़ोर नहीं पड़ा है और इसीलिए अब भी राज्य की राजनीति को धूमल के बिना देख पाना न भाजपा के लिए संभव है और न विश्लेषकों के लिए. 

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में राजपूत और ब्राह्मण समुदायों का वर्चस्व रहा है. धूमल राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जो हिमाचल के कुल मतदाताओं का 28 फ़ीसदी है. धूमल एक मजबूत राजपूत नेता के तौर पर जाने जाते हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा भी हिमाचल से आते हैं लेकिन वह ब्राह्मण समुदाय से हैं जो राज्य के मतदाताओं का 18 फीसदी है. 

पार्टी इस गणित को भी समझती है और धूमल के महत्व को भी. इसीलिए चुनाव करीब आते ही पार्टी को प्रेम कुमार धूमल याद आने लगे हैं. हाल ही में उनकी शादी की 50वीं सालगिरह पर राज्य की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर अपनी पूरी कैबिनेट के साथ धूमल के पास हमीरपुर पहुंचे थे. जानकार मानते हैं कि अगर भाजपा को पिछला प्रदर्शन राज्य में दोहराना है तो धूमल उसकी एक मजबूत कड़ी रहेंगे.  

2017 की भितरघात और हार 

राज्य में 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रेम कुमार धूमल भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा होते हुए भी अपने ही जिले में चुनाव हार गए. इसे विडंबना ही कहेंगे कि मोदी लहर से पार्टी को मिली अप्रत्याशित जीत के बावजूद धूमल चुनाव हार गए. धूमल को किसी वक्त उनके करीबी रहे कांग्रेस प्रत्याशी राजेंद्र सिंह राणा ने ही 3500 वोटों से हरा दिया था. 

दरअसल, धूमल ने 2017 में अपनी परंपरागत हमीरपुर सीट से चुनाव ना लड़कर सुजानपुर से चुनाव लड़ा था जहां पर भाजपा की पकड़ ढीली थी. धूमल की हार के लिए अचानक उनके चुनाव क्षेत्र में किए गए परिवर्तन को भी जिम्मेवार माना गया था.  

राजेंद्र सिंह राणा सुजानपुर से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार दो बार चुनाव जीत चुके थे, बावजूद इसके धूमल को सुजानपुर से ही चुनाव लड़वाया गया क्योंकि बीजेपी के पास धूमल के अलावा सुजानपुर से कांग्रेस को टक्कर देने के लिए कोई बड़ा चेहरा नहीं था. धूमल पार्टी के स्टार प्रचारक भी थे इसलिए दूसरे चुनाव क्षेत्रों में प्रचार करने में व्यस्त रहे. दूसरी ओर राजेंद्र सिंह लगातार प्रचार में जुटे रहे. धूमल ने भी खुद माना था कि वह सुजानपुर में प्रचार पर ध्यान नहीं दे पाए. 

क्या चुनाव लड़ेंगे धूमल? 

प्रेम कुमार धूमल भाजपा नेतृत्व द्वारा तय की गई रिटायरमेंट उम्र को पार कर चुके हैं और 78 साल के हैं. ‘आजतक’ से बातचीत में धूमल ने दावा किया कि अबकी बार भाजपा हिमाचल में सरकार रिपीट करेगी. वह चुनाव लड़ेंगे या नहीं? इस सवाल पर उन्होंने बस इतना कहा कि वह पार्टी के कार्यकर्ता हैं और उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी टिकट मांगा नहीं है. 

2017 के विधानसभा चुनाव में मिली हार के कारणों पर धूमल ने कहा कि वह गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ना चाहते. वो कहते हैं, "जो हुआ या जिन्होंने किया यह उनको भी पता है और जिनको पता होना चाहिए उनको भी पता है, इसलिए 2017 को छोड़कर 2022 में सरकार फिर से कैसे बने इस पर विचार करना है." 

प्रेम कुमार धूमल और पीएम नरेंद्र मोदी

सरकार के रिपीट होने का भरोसा क्यों है? इस सवाल पर धूमल ने कहा कि एक तो केंद्र में भाजपा की सरकार है. दूसरा बड़ा कारण है विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री होना. मोदी का हिमाचल के लोगों से खास नाता है और राज्य के लोग भी उनको पसंद करते हैं. 

पिछले दिनों पंजाब में अपनी जीत से उत्साहित आम आदमी पार्टी ने अब हिमाचल की ओर उम्मीद से देखना शुरू कर दिया है. धूमल इसपर कहते हैं  "हिमाचल में आम आदमी पार्टी का स्वागत है. पंजाब में आम आदमी पार्टी का काम उत्साहवर्धक रहा है लेकिन वह हमीरपुर में आकर चर्चा कर रहे हैं कि दिल्ली में शिक्षा का स्तर हिमाचल से बेहतर है तो ये उनकी गलतफहमी है. पंजाब के मुख्यमंत्री का हिमाचल ज्ञान भी कमाल का है, उन्होंने चंबा का मिंजर मेला हमीरपुर में करवा दिया".  

कर्मचारियों की मांगों, महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर धूमल ने कहा कि यह सभी ज्वलंत मुद्दे हैं. हिमाचल में कर्मचारी और उनसे जुड़े मुद्दे मायने रखते हैं. मैं चाहता हूं कि राज्य सरकार इन सभी मुद्दों पर ध्यान दे क्योंकि सरकार भले ही राजनीतिक पार्टी की हो लेकिन उसको चलाने वाले कर्मचारी ही होते हैं. कर्मचारियों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार होना चाहिए, संबंध भी अच्छे होने चाहिए. 

प्रेम कुमार धूमल का राजनीतिक सफर 

पूर्व सीएम धूमल ने अपना राजनीतिक करियर आरएसएस की छात्र शाखा एबीवीपी के साथ शुरू किया था. वे 1992 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के उपाध्यक्ष भी रहे. 1984 में जब भाजपा नेता जगदेव चंद ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया तो भारतीय जनता पार्टी ने धूमल को हमीरपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र से मैदान में उतारा. हालांकि, पहली बार धूमल चुनाव हार गए लेकिन उसके बाद 1989 और 1991 में चुनाव जीत गए. वह 1996 में लोकसभा चुनाव हार गए.  

प्रेम कुमार धूमल और लालकृष्ण आडवाणी

धूमल भाजपा नेता जगदेव चंद की मृत्यु के बाद राज्य की राजनीति में सक्रिय हो गए. उन्होंने मार्च 1998 में बमसन विधानसभा चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ा और 18,000 मतों के अंतर से विजयी रहे. धूमल को कई बार सड़क वाला मुख्यमंत्री भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल में सड़कों का लंबा चौड़ा जाल बिछाया.  

2007 में जब तत्कालीन सांसद सुरेश चंदेल पर सवाल पूछने के एवज में पैसा लेने के आरोप लगे तो भाजपा ने उनको पार्टी से बाहर कर दिया. तब धूमल ने हमीरपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीत भी गए. 2008 में हमीरपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र से उनके बड़े बेटे अनुराग ठाकुर उपचुनाव लड़े.

धूमल का जन्म एक कृषक परिवार में 10 अप्रैल 1944 को हुआ. उनके पिता फौज में थे. धूमल ने अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर करने के अलावा बीएएलएलबी की डिग्री भी हासिल की. धूमल राजनीति में आने से पहले एक निजी कॉलेज में इंग्लिश प्राध्यापक थे. 

2017 में अगर वह चुनाव जीत लेते तो मुमकिन है वह फिलहाल बतौर मुख्यमंत्री अपना तीसरा कार्यकाल पूरा कर रहे होते. वह इससे पहले मार्च 1998 से मार्च 2003 और जनवरी 2008 से दिसंबर 2012 के बीच हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे.  


 

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