scorecardresearch
 

गुजरात: पल्ली उत्सव में वरदायिनी माता को चढ़ाया जाता है लाखों किलो शुद्ध घी

माता की पल्ली पर शुद्ध घी से अभिषेक करके भक्त अपनी मन्नत पूरी होने का कामना करते हैं. हर साल अष्ठमी की रात को वरदायिनी माता की पल्ली पूरे गांव में घूमती है. भक्त बाल्टियां और बड़े-बड़े बेरल्स भरकर माता की पल्ली पर घी चढ़ाते हैं.

Advertisement
X
माता की पल्ली पर शुद्ध घी से अभिषेक
माता की पल्ली पर शुद्ध घी से अभिषेक

गुजरात में नवरात्रि के दौरान गरबा के अलावा शुद्ध घी का उत्सव आकर्षण का केंद्र रहता है. गांधी नगर जिले के छोटे से रुपाल गांव में कई दशकों से मनाए जा रहे उत्सव पर वरदायिनी माता की पल्ली पर लाखों किलो घी चढ़ाया जाता है. पूरे गांव की गलियां मानो शुद्ध घी की नदी में तबदील हो जाती हैं.

रात को करीब 3.30 बजे जब वरदायिनी माता का पल्ली रुपाल गांव के चौक में पहुंचता है तो भक्त लाखों की तादाद में इकट्ठा होकर इस पल्ली पर घी चढ़ाते है. माता की पल्ली पर शुद्ध घी से अभिषेक करके भक्त अपनी मन्नत पूरी होने का कामना करते हैं. यहां परिवार में पैदा हुए छोटे-छोटे बच्चों को पहले साल इसी तरह माता के दर्शन करवाने की परंपरा रही है. जिसमें छोटे बच्चों को लाखों की भीड़ से ले जाकर उन्हें पल्ली कि जल्ती आग के दर्शन करवाए जाते हैं. यहां हर साल अष्ठमी की रात को वरदायिनी माता की पल्ली पूरे गांव में घूमती है. भक्त बाल्टियां और बड़े-बड़े बेरल्स भरकर माता की पल्ली पर घी चढ़ाते हैं.

Advertisement

मंदिर के पुजारी केसी जोशी के मुताबिक इस पल्ली के लिए कहा जाता है कि जिसकी भी मन्नत पूरी होती है वो अपनी हैसियत के मुताबिक मां वरदायिनी को घी का चढ़ावा चढ़ाता है.

पांडवों से जुड़ी वरदायिनी माता की कहानी
रुपाल गांव की वरदायिनी माता की कहानी पांडवों से जुड़ी हुई है. पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहीं आकर रुके थे और शक्ति प्राप्ति के लिए यज्ञ किया था. जिसमें उन्होंने घी से अभिषेक किया तो वरदान देने वाली शक्ति उत्पन्न हुई. जिसे वरदायिनी माता के नाम से जाना जाता है. पांडवों ने तब संकल्प लिया था कि हर नवरात्रि की रात को वरदायिनी माता के रथ को निकालकर उसे घी का अभिषेक करवाएंगे तब से यह परंपरा चली आ रही है.

जैसे-जैसे पल्ली गांव की गलियों में आगे बढ़ती है, उन पर अभिषेक किया गया सड़कों पर गिरा हुआ घी बटौरने के लिए गांव के वाल्मीकि समाज के लोग जुट जाते हैं. जो नीचे गिरे हुए घी को बर्तनों में इकट्ठा कर गर्म करके फिर से उपयोग करते हैं. इस घी को बरतनों में इकट्ठा करने वाले केसी वाधेला का कहना है कि यहां ये परंपरा दादा परदादा के वक्त से चली आ रही है. गांव के वाल्मीकि समाज के जरिए जमीन पर गिरे इस घी को इकट्ठा किया जाता है. जिसे वे खुद नहीं खाते बल्कि अपने समाज के दूसरे लोगों को प्रसाद के तौर पर देते हैं.

Advertisement

करीब 8 से 10 लाख श्रद्धालु यहां पल्ली के मौके पर जुटते हैं. हर साल ये एक चर्चा का विषय रहता है कि इतना घी क्यों बरबाद किया जाता है. इसे आस्था कहें या अंधविश्वास.

Advertisement
Advertisement