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दिल्ली को प्रदूषण से मिलेगी मुक्ति, पराली को खाद में बदलेंगे सिर्फ 4 कैप्सूल

दिल्ली सरकार में पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने वैज्ञानिकों के साथ पराली ले प्रदूषण से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में चर्चा की. इस दौरान राय ने केमिकल की मदद से पराली से खेत में ही सीधे खाद बनाने की विकसित की गई तकनीक (बायो डी-कंपोजर) का डेमोस्ट्रेशन देखा.

नई तकनीक का जायजा लेते गोपाल राय (फोटो-पीटीआई) नई तकनीक का जायजा लेते गोपाल राय (फोटो-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • भारतीय कृषि अनुसंधान ने तैयार किया खास कैप्सूल
  • पराली से खाद बनाकर उत्पादकता बढ़ा सकते हैं किसान
  • पराली जलाने से जल जाते हैं मिट्टी के पोषक तत्व

देश की राजधानी को सर्दियों के मौसम में पराली के प्रदूषण से बचाने के लिए दिल्ली सरकार विकल्प तलाश रही है. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा की तरफ से पराली से खेत में खाद बनाने की तकनीक (बायो डी-कंपोजर) तैयार की है. 'आजतक' की टीम ने वैज्ञानिकों के साथ नई तकनीक का जायजा लिया है.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने एक खास कैप्सूल तैयार किया है, जिसे एक तय मात्रा में पानी, बेसन और गुड़ के साथ मिलाकर छिड़काव के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. संस्थान से जुड़े प्रधान वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह ने 'आजतक' से बातचीत में बताया कि किसान पराली को जला देते हैं और पराली को मुसीबत समझते हैं जबकि किसान पराली से खाद बनाकर मिट्टी को उत्पादक बना सकते हैं.

वैज्ञानिकों के मुताबिक पराली जलाने से मिट्टी के पौषक तत्व भी जल जाते हैं और इसका असर फसल पर होता है. युद्धवीर सिंह ने कहा कि एक कैप्सूल भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बनाया गया है. ये कैप्सूल 5 जीवाणुओं से मिलाकर बनाया गया है जो खाद बनाने की रफ्तार को तेज करता है. 

पराली को खाद में बदलने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने 20 रूपए की कीमत वाली 4 कैप्सूल का एक पैकेट तैयार किया है. प्रधान युद्धवीर सिंह ने कहा, '4 कैप्सूल से छिड़काव के लिए 25 लीटर छिड़काव बनाया जा सकता है और 1 हेक्टेयर में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. सबसे पहले 5 लीटर पानी में 100 ग्राम गुड़ उबालना है और ठंडा होने के बाद घोल में 50 ग्राम बेसन मिलाकर 4 कैप्सूल घोलने हैं. इसके बाद घोल को 10 दिन तक एक अंधेरे कमरे में रखना होगा, जिसके बाद पराली पर छिड़काव के लिए पदार्थ तैयार हो जाता है.' 

हरियाणा में करीब 7 मिलियन टन पराली की पैदावार

अनुसंधान के वैज्ञानिकों के मुताबिक किसी भी कटाई के बाद ही छिड़काव किया जा सकता है. इस कैप्सूल से हर तरह की फसल की पराली गलने लगती है और खाद में बदल जाती है. साथ ही अगली फसल में भी कोई दिक्कत भी नहीं आती है. कैप्सूल बनाने वाले वैज्ञानिकों ने पर्याप्त कैप्सूल के स्टॉक का दावा किया है.

उधर, दिल्ली सरकार में पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने वैज्ञानिकों के साथ पराली ले प्रदूषण से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में चर्चा की. इस दौरान राय ने केमिकल की मदद से पराली से खेत में ही सीधे खाद बनाने की विकसित की गई तकनीक (बायो डी-कंपोजर) का डेमोस्ट्रेशन देखा.

गोपाल राय ने कहा, 'इस तकनीक की मदद से खेतों में पराली जलाने की समस्या का समाधान होने की उम्मीद है और अगर ऐसा होता है, तो दिल्ली वालों को जाड़े के दिनों में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के खेतों में जलाई जाने वाली पराली के धुंए की वजह से सांस लेने में होने वाली समस्या का समाधान हो जाएगा. दिल्ली के किसानों को दिल्ली सरकार सभी सुविधाएं उपलब्ध कराएगी, जबकि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को वहां की सरकारें सुविधाएं उपलब्ध कराएंगी. इसके लिए हम राज्य सरकारों, केंद्र सरकार और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से बात करेंगे.'

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि पिछले साल हमने देखा था कि दिल्ली का जो प्रदूषण है, उसके अलावा 44 प्रतिशत पराली की वजह से नवंबर के महीने में दिल्ली के लोगों को सांस के संकट का सामना करना पड़ा था. दिल्ली के अंदर पराली बहुत कम पैदा होती है, लेकिन पंजाब के अंदर 20 मिलियन टन पराली पैदा होती है, जिसमें से पिछले साल का जो आंकड़ा है, वहां पर करीब 9 मिलियन टन पराली जलाई गई है. हरियाणा के अंदर करीब 7 मिलियन टन पराली पैदा होती है, जिसमें से 1.23 मिलियन टन पराली जलाई गई थी और उसकी वजह से दिल्ली के लोगों को प्रदूषण का सामना करना पड़ा था. 

दिल्ली सरकार के मुताबिक केंद्र सरकार ने एक योजना बनाई है, जिसमें पराली के लिए किसानों को कुछ मदद दी जाती है, उसके लिए मशीन खरीदी जाती है, जिसमें आधा पैसा किसानों को देना पड़ता है और आधा पैसा सरकार देती है. 

पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि इसकी सफलता के बाद हम पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों से भी संपर्क करेंगे, क्योंकि बहुत से किसान कहते हैं कि हम कैसे करें? हमारे पास पैसा नहीं है? इसलिए हम चाहते हैं कि अगर यह मॉडल सफल होता है, तो हरियाणा, पंजाब और यूपी में भी यह लागू किया जाए, जिससे कि सरकारें पराली की समस्या का निदान कर सकें. किसानों को भी दिक्कत न हो और दिल्ली वालों को भी सांस लेने में तकलीफ न हो. 

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