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हिम्मत को सलाम! मुंडका अग्निकांड में 6 बच्चियों को बचाया, फिर तीसरी मंजिल से कूदी महिला

मुंडका में शुक्रवार को हुए अग्निकांड में अब तक 27 लोगों के शव मिल चुके हैं. इनमें से 8 मृतकों की पहचान को गई लेकिन 27 लोग अभी भी लापता हैं. इस मामले में बिल्डिंग के मालिक मनीष लाकरा, सुशीला लाकड़ा, सुनीता लाकड़ा के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है.

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हादसे के वक्त कई लोगों ने बिल्डिंग से कूद कर बचाई थी जान (फाइल फोटो) हादसे के वक्त कई लोगों ने बिल्डिंग से कूद कर बचाई थी जान (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • हादसे में अब तक 27 लोगों की मौत, 27 लापता
  • बिल्डिंग मालिक के पिता की भी चली गई जान

दिल्ली के मुंडका में शुक्रवार को हुए हादसे को देखकर कोई भी भीतर से हिल जाएगा. आग की लपटों के बीच लोगों की चीखें डरा देने वाली थीं. इस खौफनाक मंजर को देखकर जहां हर कोई खुद बचाने में लगा हुआ था, वहीं बिल्डिंग में कुछ ऐसे भी लोग मौजूद थे जो अपनी जान जोखिम में डालकर बिल्डिंग फंसे लोगों को बचाने में जुटे हुए थे. आज तक/ जीएनटी और इंडिया टुडे ने ऐसे बहादुरों से बातकर हादसे के बिल्डिंग के अंदर का मंजर जाना.


घर में अकेली कमाने वाली फिर भी जान जोखिम में डाली

ममता देवी 52 साल की हैं. पिछले 8 दिनों से फैक्ट्री में काम कर रही थीं. उनके पति विकलांग हैं, चल-फिर नहीं सकते. घर में दो बच्चे हैं. वह परिवार में इकलौती कमाने वाली हैं. ममता ने बताया कि जब आग लगी तब चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था. लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे. कमरे में अचानक गर्मी इतनी बढ़ गई कि कुछ लोग बेहोश हो गए. जैसे ही शीशा टूटा क्रेन मशीन उस खिड़की के पास आ गई.

परिवार में इकलौती कमाने वाली हैं ममता

ममता ने अपनी जान बचाने से पहले बिल्डिंग की फंसी छोटी बच्चियों की जान बचाना जरूरी समझा. ममता ने बताया कि उन्होंने पहले उन लड़कियों को नीचे उतारा. उसके बाद कमरे भागकर देखा कि कहीं कोई और बच्ची तो नहीं रह गई है. जब कोई नहीं मिला तो वहां से निकलने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि वहां से निकलने का जब कोई रास्ता नहीं दिखा तो बिल्डिंग से छलांग लगा दी. इससे उनके हाथ और पैर में चोट आई है.

दोस्तों की मदद से कांच तोड़कर लोगों को क्रेन से उतारा

27 साल के अविनाश 1 साल से फैक्ट्री में काम कर रहे हैं. अविनाश ने बताया कि दूसरी मंजिल पर मीटिंग चल रही थी, जिसमें करीब 70 से 80 लोग शामिल थे. तभी अचानक कमरे में गर्मी बढ़ने लगी. एक कर्मचारी नीचे का दरवाजा खोलते हुए ऊपर आया और बेहोश हो गया. कमरे में जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती गई वैसे-वैसे चारों ओर धुआं होता चला गया. ऐसे में अविनाश और उसके साथियों ने बिल्डिंग से बाहर निकलने के लिए टेबल, कुर्सी, नुकीली चीजें जो हाथ आया उससे बिल्डिंग के कांच को तोड़ने की कोशिश की लेकिन कांच नहीं टूट रहा था. 

हादसे के वक्त बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर करीब 80 लोग कर रहे थे मीटिंग

अविनाश ने बताया कि करीब आधे घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद कांच टूट गया लेकिन हम लोगों ने खुद को बचाने के बजाए बिल्डिंग में फंसी महिलाओं को क्रेन के जरिए नीचे उतरवाया. इसके बाद सभी सुरक्षित बाहर निकल आए. अविनाश ने बताया कि जब यह हादसा हुआ तो चारों ओर चीखें सुनाई दे रही थीं. उस समय मन में बस यही चल रहा था कि कैसे भी करके जल्द से जल्द लोगों को बचा लूं.

पहले बेहोश लोगों की जान बचाई फिर अपनी

विनीत कुमार ने बताया कि अग्निकांड के समय बिल्डिंग के अंदर का मंजर दिल दहला देने वाला था. जमीन पर लोग बेहोश होकर गिर रहे थे. लोग उनके ऊपर से चलकर जान बचाने के लिए भाग रहे थे. मैंने कोशिश की कि जो लोग नीचे गिरे हुए हैं या बेहोशी की हालत में हैं पहले उनकी जान बचाई जाए. मैंने और मेरे बाकी साथियों ने मिलकर 12 से भी ज्यादा लोगों की जान बचाई.

दोस्तों के साथ मिलकर 12 लोगों की बचाई जान

विनीत ने बताया कि मंजर इतना डराने वाला था कि एक पल में लिए मेरे मन में ख्याल आया कि मैं पहले अपने आप को बचाऊं लेकिन अगले ही पल मन में आया कि ये वही लोग हैं, जिनके साथ मैं काम करता हूं, साथ खाता हूं, साथ बैठता हूं इसलिए मैं नीचे नहीं उतरा. 

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