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किसानों के चक्का जाम से पहले कैट ने उपराज्यपाल को पत्र भेज कर की सुरक्षा की मांग

कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया और राष्ट्रीय महामंत्री श्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि दिल्ली एवं देश अभी तक लालकिले पर हुए तिरंगे के अपमान को भूला नहीं है. इसलिए आगे ऐसी किसी भी घटना की पुनरावृत्ति ना हो. इसके लिए सभी पुख्ता इंतजाम अवश्य किए जाएं.

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CAIT ने उपराज्यपाल अनिल बैजल को लिखा पत्र (फाइल फोटो) CAIT ने उपराज्यपाल अनिल बैजल को लिखा पत्र (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • CAIT ने दिल्ली के उपराज्यपाल को लिखा खत
  • किसानों के चक्का जाम के मद्देनजर सुरक्षा की मांग की

आंदोलनकारी किसानों ने 6 फरवरी को चक्का जाम करने की घोषणा की है. इसी को देखते हुए कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्ज (कैट) ने दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल को पत्र भेजकर सुरक्षा देने की मांग की है. उन्होंने आग्रह करते हुए लिखा है कि इस आंदोलन को अनेक राजनीतिक दल घोषित-अघोषित समर्थन दे रहे हैं. चक्का जाम के दौरान कोई असामाजिक तत्व हालात न बिगाड़े, इसके लिए दिल्ली के सभी बाजारों की सुरक्षा के मुकम्मल इंतजाम किए जाएं. हालांकि किसान आंदोलन ने दिल्ली को चक्का जाम से मुक्त रखने की घोषणा की है, लेकिन 26 जनवरी को जो कुछ भी दिल्ली में हुआ उसको लेकर व्यापारी बेहद आशंकित हैं. 

कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया और राष्ट्रीय महामंत्री श्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि दिल्ली एवं देश अभी तक लालकिले पर हुए तिरंगे के अपमान को भूला नहीं है. इसलिए आगे ऐसी किसी भी घटना की पुनरावृत्ति ना हो. इसके लिए सभी पुख्ता इंतजाम अवश्य किए जाएं. उन्होंने कहा कि इस मामले में दिल्ली के सभी व्यापारी संगठन उपराज्यपाल एवं दिल्ली पुलिस के साथ सहयोग के लिए तत्पर हैं. 

कैट ने कहा कि यह सत्य है कि अब तक देश में तमाम तरह की सब्सिडी मिलने के बाद भी किसान घाटे की खेती कर रहा है. जिसको लाभ की खेती में बदला जाना बहुत जरूरी है और इस ओर आवश्यक कदम तुरंत उठाए जाने की जरूरत है. जिसे सरकार से बातचीत के आधार पर सुलझाया जा सकता है. लेकिन बिना किसी ठोस कारण के तीनों कृषि कानूनों का विरोध करना उचित नहीं है. तीनों कृषि कानूनों में सभी प्रावधान स्वैछिक हैं और उनको मानने की कोई बाध्यता किसानों पर नहीं है. कुछ राजनीतिक दल अपनी राजनीति के कारण इस समस्या को उलझाए रखना चाहते हैं. 

कैट ने कहा कि इस देश के जो भी किसान केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के पक्ष में नहीं हैं, वे अपने स्तर पर ही इन्हें रद्द कर सकते हैं. पहला कानून है कि किसान केवल एपीएमसी मंडियों में बेचने के लिए मजबूर नहीं होगा. जहां चाहे और जिसे चाहे बेच सकेगा. जिन किसानों को यह स्वतंत्रता अच्छी ना लगे, वे तय कर सकते हैं कि हम तो एपीएमसी मंडी में जा कर उसी आढ़ती को अपनी फसल बेचेंगे, जिसे पहले बेचते रहे हैं. उन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है. 

उन्होंने कहा कि दूसरा कानून है कि किसान फसल बोते समय ही पहले से किसी खरीदार से समझौता कर सकेंगे कि उनकी फसल वह खरीदार किस भाव पर खरीदेगा. किसान को दूसरी जगह पर यदि किए सौदे से भी अच्छा भाव मिल रहा है तो किसान सौदे को रद्द कर सकता है. चाहे खरीदार व्यापारी का कितना भी नुकसान क्यों न हो. कानून में किसान को पूरी तरह स्वतंत्र रखा गया है. 

तीसरा कानून है कि कोई जितनी चाहे उतनी कृषि उपज इकट्ठा रख सकता है, कोई सीमा नहीं रहेगी. वैसे तो किसी किसान के लिए यह बात लागू ही नहीं है, यह प्रावधान तो व्यापारियों के लिए है. पर जो किसान इस कानून को गलत पा रहा हो, वह अपने खलिहान में फसल रखने की सीमा खुद तय कर ले. उस पर कोई बंदिश नहीं है.

खंडेलवाल ने कहा कि इन कानूनों से सबसे ज़्यादा लगभग 1.25 करोड़ व्यापारी, जो मंडियों में कृषि का व्यापार कर रहे हैं वो बुरी तरह प्रभावित होंगे और आंदोलन तो व्यापारियों को करना चाहिए लेकिन कैट ने जिम्मेदार संगठन के नाते उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल कर व्यापारियों का पक्ष रखना ज्यादा उचित समझा और अब कोर्ट के निर्देश के मुताबिक कोर्ट द्वारा गठित कमेटी के समक्ष अपनी बात रखेंगे और जब कोर्ट मामले की सुनवाई करेगी तब कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष मज़बूती से रखेंगे.


 

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