देशवासियों को आज भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के वे शब्द याद आते हैं, जिनमें उन्होंने कहा था कि कोई भी राजनीति राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकती. अगर राजनीति देशहित को नुकसान पहुंचाने लगे, तो वह राष्ट्र के लिए कैंसर की तरह विनाशकारी बन जाती है. शुक्रवार को जो हुआ है, वह उसी चिंता को दोहराता है.
जिस तरह यूथ कांग्रेस के नेताओं ने मोदी विरोध में अपने कपड़े उतारकर एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान विरोध प्रदर्शन किया, उसे राजनीति नहीं कहा जा सकता. वह राजनीति जो भारत के मान-सम्मान को ठेस पहुंचाए, जो देश को अपमानित करे, जो लोकतंत्र की छवि पर दाग लगाए और जो यह भूल जाए कि देशहित सर्वोपरि है, उसे राजनीति नहीं कहा जा सकता.
ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और फ्रांस के बाद भारत दुनिया का चौथा देश था, जिसने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर इस तरह के वैश्विक सम्मेलन की मेजबानी की. यह वह मंच था, जहां दुनिया भारत की क्षमता और भविष्य की दिशा को देख रही थी. लेकिन इसी मंच पर यूथ कांग्रेस के नेताओं ने विरोध के नाम पर राष्ट्रीय गरिमा की सीमा लांघ दी.
अब तक मामले में क्या-क्या हुआ?
अब तक इस मामले में पुलिस ने चार कार्यकर्ताओं को तुरंत गिरफ्तार किया और तीन को हिरासत में लिया है. यूथ कांग्रेस अध्यक्ष उदय भानु चिब ने प्रदर्शन को युवाओं का स्वाभाविक आक्रोश बताया और कहा कि प्रधानमंत्री ने देश के हितों से समझौता किया है. वहीं बीजेपी ने इसे "एंटी-इंडिया" हरकत करार दिया.
दिल्ली के तिलक मार्ग थाने में यूथ कांग्रेस के सदस्यों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है. यूथ कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने के बाद थाने में क्रिमिनल साजिश (धारा 61(2)), सार्वजनिक सेवक को चोट पहुंचाना, सार्वजनिक सेवक पर हमला करना, सार्वजनिक सेवक के निर्देश का उल्लंघन करना, अवैध सभा करना, प्रतिबंधित आदेश का उल्लंघन करना और समान उद्देश्य के तहत अन्य संबंधित आरोप लगाए गए हैं.
अभी तक की पूछताछ में, गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों ने साझा किया कि 16 और 17 तारीख को रजिस्ट्रेशन के लिए एक्सटेंशन मिलने के बाद ही उन्होंने ऑनलाइन पंजीकरण कराया था. ये प्रदर्शनकारी दो दिन पहले ही बिहार और तेलंगाना से दिल्ली आए थे.
विरोध या राष्ट्र की छवि पर आघात
यह विरोध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बताया गया. जबकि यह समिट किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं, बल्कि 145 करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने वाला आयोजन था. दुनिया इस मंच के माध्यम से नए भारत को देख रही थी.
विरोध के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगाए गए और टी-शर्ट्स पर आपत्तिजनक संदेश लिखे गए. लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि कब विरोध को विराम देकर देश की सामूहिक छवि को प्राथमिकता दी जाए.
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यूथ कांग्रेस और संगठन का सवाल
कुछ लोग कह रहे हैं कि यूथ कांग्रेस का कांग्रेस पार्टी से सीधा संबंध नहीं है. लेकिन यूथ कांग्रेस खुद को कांग्रेस की इकाई बताती है. ऐसे में संगठनात्मक जिम्मेदारी से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है.
नारे की राजनीति
प्रधानमंत्री के खिलाफ जो नारा लगाया गया, वही नारा इससे पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी संसद के बाहर लगा चुके हैं. आरोप यह है कि भारत ने अमेरिका के साथ जो ट्रेड डील की, उसमें किसानों और डेयरी उत्पादकों के हितों से समझौता किया गया.
हालांकि, अमेरिका की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि कृषि और डेयरी क्षेत्र की जिन श्रेणियों को पहले सुरक्षित रखा गया था, वे अब भी सुरक्षित हैं. इसके बावजूद यह नारा राजनीतिक मंचों पर दोहराया जा रहा है.
विरोध का अधिकार सबको है. पहले भी प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगाए गए और किसी ने रोका नहीं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय एआई समिट जैसे मंच को राजनीतिक विरोध का स्थल बनाना अलग बात है.
वैश्विक उपस्थिति और भारत का एआई क्षण
इस एआई समिट में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि, 60 से अधिक मंत्री और उपमंत्री, 20 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष, 500 से अधिक वैश्विक नेता और 50 से अधिक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के प्रमुख शामिल हुए.
ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन, गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई, गूगल डीपमाइंड के सीईओ डेमिस हासाबिस, माइक्रोसॉफ्ट के ब्रैड स्मिथ, एडोबी के शांतनु नारायण और क्वालकॉम के क्रिस्टियानो एमन जैसे दिग्गज इसमें मौजूद थे.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा, अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद, स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़, ब्रिटेन के उप-प्रधानमंत्री और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने भी भाग लिया.
यह मंच भारत के लिए एक बड़ा एआई क्षण था. कई निवेश घोषणाएं भी हुईं. विशाखापट्टनम के पास एआई सिटी विकसित करने की योजना, वैश्विक कंपनियों के निवेश और भारत में डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के ऐलान इस समिट की प्रमुख उपलब्धियां रहीं.
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विरोध का तरीका और समय
कांग्रेस के कुछ नेता इस विरोध का बचाव करते हुए 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हुए प्रदर्शनों का उदाहरण दे रहे हैं. लेकिन उस समय विरोध आयोजन स्थल के भीतर नहीं हुआ था और आयोजन समाप्त होने के बाद हुआ था. यहां विरोध समिट के दौरान, आयोजन स्थल के भीतर किया गया. यह अंतर महत्वपूर्ण है.
लोकतंत्र में असहमति, लेकिन गरिमा के साथ
लोकतंत्र में असहमति अनिवार्य है. विरोध भी जरूरी है. लेकिन विरोध का स्तर और स्थान भी मायने रखता है. कुछ मूल बातें याद रखी जानी चाहिए: