बिहार में जनता ने भले ही बीजेपी को बाहर का रास्ता दिखा दिया हो लेकिन मोदी सरकार अभी भी बिहार पर मेहरबान है. वोटों के खेतों पर फिर बीज डाल रही है पानी दे रही है ताकि चार साल बाद ही सही लेकिन फसल उगे तो सही. राजनीति की गंगा में हाथ तो चुनाव के समय धोए जाएंगे फिलहाल तो गंगा पर पुल बनाने में जुटी है केंद्र सरकार.
बरसों से बदहाली का शिकार रहा है. इसे भी केंद्र सरकार ने फोकस में रखा है. बरसों से बुरी तरह हिल रहे और जगह जगह से टूट चुके इस पुल की मरम्मत के लिए मोदी सरकार ने 1742 करोड़ रुपये मंजूर कर लिये हैं. इसमें से 1355 करोड़ रुपये तो सिविल निर्माण के लिए आवंटित हैं. इससे पहले जापानी कंपनी जायका से तखमीना लिया गया था. उस कंपनी ने 2800 करोड़ रुपये का एस्टीमेट पकड़ा दिया. लेकिन देसी कंपनी ने 1742 करोड़ में ही अच्छी गुणवत्ता के साथ ये मरम्मत का काम करने की हामी भर ली. 15 अगस्त से इस पर काम भी शुरू हो जाएगा. पुल के तकनीकी पक्ष पर रुड़की आईआईटी के विशेषज्ञ अध्ययन कर उपाय बताएंगे.
रख-रखाव के लिए अलग से मदद
ये तो उस 200 करोड़ रुपये की मदद के अतिरिक्त है जो बिहार और बेहतर रख रखाव के लिए दिए गए हैं. उपभोक्ता मामलों के मंत्री और एनडीए के घटक लोजपा अध्यक्ष राम विलास पासवान ने कहा कि केंद्र के लिए लाजिमी हो कि वो इस 200 करोड़ रुपये के खर्च पर निगरानी रखे. क्योंकि वहां राज्य सरकार के अधिकारी कमीशन खा जाएंगे.
इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी सेतु के समानांतर एक नया पुल बनाने की भी परियोजना को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है. इसकी डीपीआर यानी डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तीन महीने में तैयार हो जाएगी. इसके बाद काम शुरू हो जाएगा. सड़क यातायात और हाईवे मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि ये पुल तो निर्माण के समय ही लचर और पुरानी तकनीक की वजह से कमजोर था. फिर इस पर से भारी वाहनों की चौबीसों घंटे आवाजाही. पुल जवाब दे गया. 1972 में बनना शुरू हुआ और दस साल बाद 1982 में बनकर तैयार हुआ.
ये तो हुई पुलों की बात. अब केंद्र सरकार का कहना है कि हार के बावजूद हमने बिहार से जो वादा किया था उसे पूरा कर रहे हैं. चालू साल में 60 हजार करोड़ रुपये की योजनाएं बिहार के लिए मंजूर की जा चुकी हैं. अगले चार सालों में सरकार बिहार के लिए ढाई लाख रुपये की योजनाएं पूरी करने का लक्ष्य है.