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बिहार की सियासत पर उपचुनाव डालेगा असर, समझें क्या गणित बिगड़ेगा और क्या बनेगा

बिहार उपचुनाव में एनडीए एकजुट तो महागठबंधन बिखरा हुआ नजर आ रहा. बुधवार तक महागठबंधन में सुलह-समझौता नहीं होता है और कांग्रेस-आरजेडी के प्रत्याशी चुनावी मैदान में डटे रहते हैं तो एनडीए को मात देना आसान नहीं होगा. बिहार में भले ही दो सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं, लेकिन इसके नतीजे राज्य की सियायत पर गहरे असर छोड़ने वाले हैं. 

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार उपचुनाव में जेडीयू के साथ एनडीए एकजुट
  • महागठबंधन: कांग्रेस और आरजेडी आमने-सामने
  • चिराग पासवान की सियासत पर भी डालेगा असर

बिहार में तारापुर और कुशेश्वरस्थान विधानसभा सीटों पर उपचुनाव का बिगुल बज गया. इस उपचुनाव में एनडीए एकजुट तो महागठबंधन बिखरा हुआ नजर आ रहा. बुधवार तक महागठबंधन में सुलह-समझौता नहीं होता है और कांग्रेस-आरजेडी के प्रत्याशी चुनावी मैदान में डटे रहते हैं तो एनडीए को मात देना आसान नहीं होगा. बिहार में भले ही दो सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं, लेकिन इसके नतीजे राज्य की सियायत पर गहरे असर छोड़ने वाले हैं. 

कुशेश्वरस्थान विधानसभा सीट पर जेडीयू ने अपने दिवंगत विधायक शशिभूषण हजारी के पुत्र आनंद भूषण हजारी को मैदान में उतारा है. आरजेडी से गणेश भारती, कांग्रेस के अतिरेक कुमार, समता पार्टी के सच्चिदानंद पासवान, लोजपा (रामविलास) की अंजू देवी और छह निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में है. 

वहीं, तारापुर विधानसभा सीट पर जेडीयू ने कई दावेदारों के बीच राजीव कुमार सिंह पर दांव लगाया है. आरजेडी से अरुण कुमार साह राष्ट्रीय जनसंभावना पार्टी के उपेंद्र सहनी, दी प्लूरल्स पार्टी के वशिष्ठ नारायण, कांग्रेस के राजेश कुमार मिश्र, एलजेपी (रामविलास) के कुमार चंदन, बिहार जस्टिस पार्टी के मो. जसीम सहित पांच निर्दलीय प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं. 

एनडीए एकजुट तो महागठबंधन में टूट

बिहार की दोनों ही सीटों के उपचुनाव में जेडीयू को बीजेपी और पशुपति पारस की पार्टी राष्‍ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी का समर्थन प्राप्‍त है. जबकि महागठबंधन में आरजेडी और कांग्रेस दोनों ही चुनाव लड़ रही है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव में दोनों सीटों पर जेडीयू की जीत हुई थी. सत्ता में होने के बावजूद जेडीयू  उपचुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है और पूरे दमखम के साथ जीत के लिए मशक्कत कर रही हैं. 

वहीं, उपचुनाव में आरजेडी ने जाति और उससे जुड़ी पार्टी की प्रचलित मान्यता को तोड़ दिया है. तारापुर सीट पर अरुण साह (वैश्य) और कुशेश्वरस्थान में गणेश भारती (मुसहर) आरजेडी के प्रत्याशी हैं. अवधारणा के स्तर पर ये दोनों जातियां एनडीए से जुड़ी मानी जाती हैं. ऐसे में आरजेडी ने उम्मीदवार अपनी जातियों का वोट ले आएं और उसमें पार्टी का कोर वोटर जुड़ जाएं तो जीत की संभावना बन सकती है. लेकिन, कांग्रेस ने भी जिस तरह से अपने कैंडिडेट उतार रखें है, उससे साफ है कि विपक्षी दलों के वोटों में बिखराव तय है. 

कांग्रेस-आरजेडी के रिश्ते पर पड़ेगा असर

बिहार में जिन दोनों सीटों पर चुनाव हो रहे हैं और कांग्रेस-आरजेडी ऐसी चुनावी मैदान में डटे रहते हैं तो महागठबंधन के सियासी भविष्य पर भी असर पड़ेगा. कांग्रेस लगातार आरजेडी को गठबंधन धर्म नहीं निभाने के निशाना बना रही है तो आरजेडी बेफिक्र होकर उपचुनाव जीतने की कवायद में जुटी है. ऐसे में उनके बीच समर्थक वोटों का विभाजन हुआ तो जेडीयू की जीत आसान हो सकती है. हालांकि, राजद और कांग्रेस के बीच सुलह की कोशिश हो रही हैय नाम वापस लेने की आखिरी तारीख 13 अक्टूबर है.

आरजेडी प्रत्याशियों को जिताने के लिए पार्टी सुप्रीमो लालू यादव के भी चुनाव प्रचार मैदान में उतरेंगे. ऐसे में अगर कांग्रेस की स्थिति कुशेश्वरस्थान विधानसभा सीट पर अच्छी नहीं रहती है और आरजेडी अगर बेहतर स्थिति में आती है. ऐसे में निश्चित तौर पर दोनों ही पार्टियों के संबंधों में बड़ा बदलाव आएगा. यह बदलाव कहीं न कहीं महागठबंधन के अस्तित्व पर संकट खड़ा करेगा.

चिराग पासवान के भविष्य पर डालेगा प्रभाव

एलजेपी दो खेमों में बंटने के बाद बिहार में पहला उपचुनाव हो रहा है, जिसमें चिराग पासवान ने दोनों सीट पर अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं. वहीं, चिराग के चाचा पशुपति पारस जेडीयू के समर्थन में खड़े नजर आए रहे हैं. ऐसे में अगर एलजेपी के कैंडिडेट 2020 के विधानसभा चुनाव से भी कम वोट लाते हैं तो साफ है कि चिराग पासवान के सियासत को भी प्रभावित करेगा. हालांकि, चिराग दोनों ही सीटों पर खुद प्रचार की कमान संभालने का ऐलान कर चुके हैं.

 

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