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Mental Illness: नताशा, आकाश और वैभव की ये कहानी, जो बदल सकती है आपका नजरिया

दुनियाभर में वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे मनाया जा रहा है, विश्व मानसिक स्वास्थ्य संगठन ने इस बार का विषय दिया है "सबों के लिए मानसिक स्वास्थ्य - एक वैश्विक प्राथमिकता". मानसिक रोग विशेषज्ञ और देश के जाने- माने साइकेट्रिस्ट डॉक्टर रोहित शर्मा का कहना है कि मेंटल इलनेस महामारी का एक रूप है. दुनियाभर में करोड़ों लोग अपनी कीमती जिंदगी के सबसे ज्यादा साल मेंटल इलनेस की वजह से खराब कर रहे हैं.

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(प्रतीकात्मक- Getty Images)
(प्रतीकात्मक- Getty Images)

32 साल की स्कूल टीचर नताशा (काल्पनिक नाम) कहती हैं कि उन्हें दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद है. लेकिन उनके साथ भावात्मक तौर पर जुड़ने से वह डरती हैं. अंदर ही अंदर काफी अकेलापन महसूस करती हैं. वह बताती हैं कि मुझे आज भी वो बचपन के दिन याद हैं जब मैं बच्चों के साथ पिकनिक पर गई और खेलते-खेलते गिर गई. यह देखते ही वहां खड़े बच्चे और टीचर्स मुझ पर हंसने लगे. मैं सोच में पड़ गई कि आखिर सब लोग मेरे साथ ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे हैं?  उस वक्त मुझे लगा कि अपनी जिंदगी खत्म कर लेनी चाहिए. इस घटना के बाद मैं खुद से नफरत करने लगी. मैंने छोटी-छोटी बातों पर रोना शुरू कर दिया. जिसके बाद लोग मुझसे  सवाल पूछने लगे कि मैं छोटी-छोटी बातों पर क्यों रो देती हूं? मेरे जहन में बार-बार एक ही सवाल आता है कि मुझे यह जिंदगी क्यों जीनी है? मुझे लगने लगा था कि मैं किसी भी चीज के लायक नहीं हूं. लेकिन एक डॉक्टर की सलाह ने मेरी जिंदगी बदल दी और अब मैं दूसरों को भी इसके लिए जागरूक कर रही हूं. 

कुछ ऐसी ही कहानी 38 साल के आकाश (काल्पनिक नाम) की भी है. आकाश बताते हैं कि एक बार वह दोस्तों के साथ जयपुर घूमने गए. जहां बिना प्रोटेक्शन के एक महिला के साथ फिजिकल रिलेशन बना लिए. उन्होने बताया कि इसके बाद मुझे हमेशा ही यह डर सताने लगा कि कहीं मुझे Aids ना हो गया हो. मैं इतना घबरा गया कि मैंने एक माह के अंदर करीब 15 बार अपना  HIV टेस्ट करा लिया. बावजूद इसके मेरा डर खत्म नहीं हुआ. धीरे-धीरे मेरे मन में मरने के खयाल आने लगे. जिसका असर मेरे रोजमर्रा के कामों पर पड़ने लगा. मैं सोचने लगा कि कहीं मैं मर ही ना जाऊं. काफी डरते हुए इसका जिक्र मैंने पत्नी से किया. शुरुआत में मुझे यह लग रहा था कि पता नहीं मेरी इस समस्या को पत्नी समझेगी या नहीं. लेकिन उन्होंने समझा और तुरंत ही डॉक्टर के पास मुझे लेकर गईं. अब मैं पहले की तरह नॉर्मल जिंदगी जी रहा हूं.  

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इसी तरह 26 साल के वैभव बताते हैं कि उन्होंने दुनिया से मायूस होकर नौकरी छोड़ दी थी, यहां तक कि वह फोन पर भी किसी से बात नहीं करते थे. उन्होंने बताया कि एक दिन तीन बक्सों में सामान बांधने के बाद मैं घर से निकला और जंगल की तरफ बढ़ा. इरादा आत्महत्या का था रास्ते में एक परिचित मिले उन्होंने बात छेड़ी और कहा कि अच्छा है बसंत करीब है. इस 'बसंत' शब्द ने मेरी जिंदगी ही बदल दी. मुझे लगा कि बसंत मतलब नई उम्मीद और नई जिंदगी का मौसम. अगले ही पल मैंने सोचा की जान देने का ख्याल कितना बेमतलब है. अगर परिचित से बात ना होती तो मैं हर साल खुदकुशी करने वाले लोगों में शुमार हो जाता. 

क्या आप भी नताशा, आकाश और वैभव की तरह मायूस और परेशान हुए हैं? अगर आपका जवाब 'नहीं' है तो अच्छा है. अगर आपका जवाब 'हां' है तो आप भी किसी मानसिक बीमारी की चपेट में हैं और तुरंत ही आपको डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है.

क्या युवाओं को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है?

देश के जाने माने डॉक्टर रोहित शर्मा का कहना है कि युवाओं को सुसाइड करने से बिल्कुल रोका जा सकता है, क्योंकि सुसाइड एक प्रीवेंटेबल डेथ है. कई बार ऐसा होता है कि हम चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं. जो लोग सुसाइड अटैम्ट करते हैं वो और उनके साथ वाले भी. जिसके कारण सुसाइड केस बढ़ जाते हैं. 

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 साइकेट्रिस्ट, डॉक्टर रोहित शर्मा
साइकेट्रिस्ट, डॉक्टर रोहित शर्मा


 

वहीं, दिल्ली की जानी मानी क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट कनिका कौशिक का मानना है कि किसी को भी आत्महत्या करने से रोका जा सका है. जरूरत है तो बस उसकी परेशानी को समझकर उसे सही रास्ता दिखाने की. ऐसे श्ख्स को सही गाइडेंस और सहानुभूती की जरूरत होती है. ध्यान से उसकी बात सुनकर उसके मन के अंतरद्वंद को शांत करने की जरूरत होती है. इस काम को प्रोफेशनल के अलावा मरीज का दोस्त, रिश्तेदार या परिवार का कोई भी सदस्य कर सकता है.   

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट, कनिका कौशिक
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट, कनिका लश्कर कौशिक

 

 

लगभग 20 करोड़ भारतीय मानसिक रोग से पीड़ित

साइंस जनरल लेंसेट की एक रिसर्च बताती है, लगभग 20 करोड़ भारतीय किसी ना किसी मानसिक रोग से पीड़ित हैं. यानी सात में एक भारतीय मानसिक रोग का शिकार है. इस रिसर्च से यह भी पता चलता है कि इन 20 करोड़ भारतीयों में से लगभग साढ़े चार करोड़ ऐसे हैं जो डिप्रेशन से जूझ रहे हैं और इतने ही एंजाइटी (Anxiety) का शिकार हैं. यह आंकड़ा 2017 का है और अब 2022 चल रहा है. मुमकिन है यह संख्या अब और भी बढ़ गई होगी.

डॉक्टर रोहित शर्मा की मानें तो मेंटल इलनेस महामारी का ही एक रूप है. दुनियाभर में इस बीमारी की वजह से करोड़ों लोग अपनी जिंदगी के कई अहम साल खो देते हैं. मानसिक बीमारी दुनिया में दूसरे नंबर पर आती है. करोड़ों लोग अपनी जिंदगी के सबसे ज्यादा साल मेंटल इलनेस की वजह से खराब कर रहे हैं. हर तीन से दो व्यक्ति माइड या सीवियर मेंटल इलनेस से ग्रसित है. इससे भी ज्यादा हैरान कर देने वाली बात यह है कि लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं होती कि वो किसी मानसिक रोग की चपेट में हैं. आमतौर पर लोग इसे मन का भ्रम या कोई उदासी मानकर इसे नजरअंदाज कर देते हैं. कुछ जादू टोना या ऊपरी चक्कर का नाम देकर इसे इग्नोर कर देते हैं. 

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भारत में 14 फीसदी बच्चे एंजाइटी की गिरफ्त में 

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सोशल साइकियाट्री में पब्लिश एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर चौथा व्यक्ति मानसिक बीमारी, जैसे डिप्रेशन, दबाव, थकान, एंजाइटी से जूझ रहा है. वहीं यूनिसेफ (UNICEF) की 2021 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 14 फीसदी बच्चे एंजाइटी (Anxiety) की गिरफ्त में हैं. इन गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए हमें अपने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सजग होने की जरूरत है. मेंटल हेल्थ से जुड़ी तमाम रिपोर्ट को देखें तो आत्महत्या का सीधा संबंध तनाव से है. तनाव सबसे पहले दिमाग पर चोट करता है. इसके बाद किडनी, हृदय, लिवर को नुकसान पहुंचाता है. 

साइकेट्रिस्ट और क्लीनिकल साइकोजिस्ट की मानें तो ज्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं चल पाता कि वे कब मानसिक बीमारी का शिकार हो चुके हैं. हमारे देश में अगर कोई मेंटल हेल्थ से चुपचाप जूझता है, तो उसकी दो सबसे बड़ी वजह हैं. पहला- महंगा इलाज और दूसरा- कहीं कोई मजाक ना उड़ा दे. अगर किसी को कुछ लक्षण दिखने भी लगते हैं, तो इस बीमारियों को ठीक करने के लिए झाड़-फूंक करने वाले तांत्रिकों के पास लोग इलाज के लिए चले जाते हैं, जिसकी वजह से यह बीमारी कभी ठीक नहीं हो पाती. उल्टा इससे और बीमार पड़ सकते हैं. मेंटल हेल्थ को ठीक रखने और सही इलाज के लिए लोगों को जगरूक करने की जरूरत है.  

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डॉक्टर रोहित शर्मा का कहना है कि जब कोई मरीज ठीक होकर वापस अपने समाज में जाता है तो इसका असर लोगों पर काफी पढ़ता है. जब लोगों को यह दिखता है कि जो शख्स कल तक अपने परिवार पर एक बोझ था ठीक होने के बाद वो अपने पैरों पर खड़ा है. अब अपने और परिवार के लिए कुछ कर पा रहा है. इस तरह के मैसेज से सोसायटी को एजुकेट और जागरूक किया जा सका है.  

ऐसे पहचानें मानसिक बीमारी- 

जिस तरह शरीर में अंदरूनी दिक्कतों की वजह से बिमारियां होती हैं, उसी तरह दिमाग की कार्यप्रणाली प्रभावित होने से डिप्रेशन और एंजाइटी होती है. अगर किसी को लंबे समय से नींद की समस्या है, वह तनाव में रहता है, जल्दी घबरा जाता है, भविष्य के लिए अधिक चिंता करता है तो उसे तुरंत ही डॉक्टर के पास जाना चाहिए. इसके अलावा इसके और भी लक्षण हैं जैसे, ध्यान लगाने में कमी, एकाग्रता में कमी, भूख-प्यास कम या ज्यादा होना, मन में उदासी, असहाय महसूस होना, अकेले बाहर निकलने में घबराहट, पेट की समस्या, गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाना आदि.

आमतौर पर डिप्रेशन टीनएज (Teenage) या 30 से 40 साल की उम्र में शुरू होता है. लेकिन यह किसी भी उम्र में हो सकता है. पुरुषों की तुलना में महिलाओं के डिप्रेशन की समस्या ज्यादा होने की संभावना रहती है. मानसिक कारकों के अलावा हार्मोन्स का असंतुलित होना, प्रेगनेंसी और जेनेटिक डिफेक्ट भी डिप्रेशन का कारण हो सकता है. डॉक्टर रोहित बताते हैं कि आपके किसी करीबी के व्यवाहर में काफी बदलाव देखने को मिले कोई चुलबुला है और अचानक शांत रहने लगे. उसका लोगों से मिलना जुलना कम हो  जाए. उसके साथ बैठकर बात करनी चाहिए. कहीं वो एंजाइटी या डिप्रेशन का शिकार तो नहीं हो रहा है.

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महंगे इलाज की वजह से लोग डॉक्टर के पास नहीं जाते

आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि भारत में मानसिक रोगों का इलाज बहुत महंगा है और सरकारी अस्पतालों में साइकेट्रिस्ट और साइकोलॉजिस्ट की भारी कमी है. साइकेट्रिस्ट के हर सेशन के लिए 1 से 5 हजार रुपये तक फीस होती है. साइकोलॉजिस्ट के हर महीने कम से कम भी दो सेशन होते हैं. इसके अलावा दवाइयों का खर्च भी काफी होता है. वहीं, एंजाइटी के लिए भी हर सेशन के लिए 1 से 3 हजार रुपये की फीस लगती है. 

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट कनिका कौशिक की मानें तो आधुनिक युग में लोगों के जीने का तरीका पूरी तरह से बदल गया है. खुद को सफल बनाने के दबाव ने लोगों के अंदर मानसिक बीमारियों को बढ़ा दिया है. लोग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ज्यादा करने लगे हैं. देर रात जागकर टीवी, मोबाइल या लेपटॉप की स्क्रीन लगातार देखते रहते हैं. जिसकी वजह से नींद की समस्या बढ़ गई है. फिर डिप्रेशन और एंजाइटी लोगों को घेर लेती है. इसका असर उनके रोजमर्रा के कामों पर भी पढ़ने लगता है और व्याहार में भी बदलाव आ जाता है.

ऐसे रखें अपने मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल

मानसिक तौर पर स्वस्थ रखने के लिए हमें अपनी लाइफ स्टाइल को बदलने की जरूरत है. ऐसे में परिवार के साथ ज्यादा समय बिताना चाहिए, जीवन को गुणवर्तापूर्ण बनाना चाहिए, रिश्तों को समझना और उन्हें बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए. छह से सात घंटे की नींद जरूर लें, ध्यान, प्राणायम के लिए समय निकालें. 

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मानसिक बीमारियों के कुछ कॉमन लक्ष्ण  

मानसिक बीमारियां कई तरह की होती हैं. इनके लक्षण भी बीमारी के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं. मानसिक बीमारियों में बाइपोलर डिसऑर्डर, डिमेंशिया, अल्जाइमर, आटिज्म, डिस्लेक्सिया, ADHD और डिप्रेशन आदि शामिल हैं.  मानसिक बीमारियों की शुरुआत में दिखने वाले कुछ कॉमन लक्षण इस तरह से हैं. 

1) किसी भी काम में मन न लगना
2) चिड़चिड़ापन और बेचैनी रहना
3) नींद से जुड़ी परेशानियां होना
4) वजन तेजी से बढ़ना या कम होना
5) ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत
6) मूड में बदलाव
7) शरीर में एनर्जी की कमी
8) खानपान की आदतों में बदलाव
9) सिरदर्द, कमर दर्द और शरीर में लगातार दर्द
10) शराब या ड्रग्स का सेवन

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