ज्यादातर लोगों के घरों के बाहर या सोसाइटी के आसपास गंदे नाले जरूर बहते होंगे. सब सोचते हैं कि उसमें सिर्फ गंदगी होती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गंदे नालों और सीवेज में गंदगी के अलावा और क्या छिपा हो सकता है? शायद आपको लगे कि ये सिर्फ बदबू और कचरा है, लेकिन हाल ही में हुई एक चौंकाने वाली रिसर्च ने कुछ और ही खुलासा किया है.
सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्युलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) की रिसर्च के मुताबिक, भारत के कई बड़े शहरों के सीवेज सिस्टम में ऐसे खतरनाक बैक्टीरिया पनप रहे हैं, जिन पर अब आम दवाइयों का असर होना बंद हो गया है. इसे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) कहते हैं.
क्या है स्टडी?
ये स्टडी हैदराबाद के सीसीएबी और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है, जिसे मशहूर जर्नल नेचर कम्यूनिकेशंस में छापा गया है. इस स्टडी को करने के लिए मार्च 2022 से 2024 के बीच दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे बड़े शहरों से सीवेज के 447 सैंपल लिए गए थे. वैज्ञानिकों ने 'शॉटगन मेटाजीनोमिक्स' नाम की तकनीक से इन सैंपल्स के डीएनए की जांच की, ताकि ये पता चल सके कि गंदे पानी में दवाइयों को बेअसर करने वाले बैक्टीरिया कितने फैल चुके हैं.
चैन्नई ने चौंकाया
स्टडी में चेन्नई के जो मामले सामने आए हैं, वो सबसे ज्यादा हैरान करने वाले रहे. वैज्ञानिकों ने यहां के 5 इलाकों से 109 सैंपल लिए, जिसमें 69 तरह के ऐसे जीन मिले जो दवाइयों को बेअसर कर देते हैं. सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि चेन्नई के सीवेज में मिले लगभग 53% बैक्टीरिया ऐसे थे, जिन्हें वैज्ञानिक पहचान ही नहीं पाए. ये उनके लिए बिल्कुल नए हैं.
हर शहर के बैक्टीरिया अलग, लेकिन सभी हैं खतरनाक
रिसर्च में एक बड़ी ही डराने वाली बात सामने आई है. वैज्ञानिकों ने पाया कि हर शहर की गंदगी का अपना एक अलग फिंगरप्रिंट है. इसे यानी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता के सीवेज में मिलने वाले बैक्टीरिया इतने अलग-अलग हैं कि सिर्फ उन्हें देखकर बताया जा सकता है कि सैंपल किस शहर का है.
लेकिन असली चिंता की बात ये है कि भले ही बैक्टीरिया अलग हों, पर उन सभी में दवाइयों को बेअसर करने की ताकत (एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस) एक जैसी ही है. वैज्ञानिकों ने इसे शेयर्ड रेसिस्टोम (shared resistome) नाम दिया है. इसका मतलब ये है कि चाहे वो दिल्ली हो या चेन्नई, सभी शहरों के बैक्टीरिया में टेट्रासाइक्लिन और बीटा-लैक्टम जैसी आम एंटीबायोटिक दवाओं को मात देने वाले जीन एक जैसे पाए गए हैं. सीधे शब्दों में कहें तो खतरा हर जगह एक समान और बेहद गंभीर है.
मिले खतरनाक बैक्टीरिया
इस स्टडी में कुछ ऐसे खतरनाक बैक्टीरिया भी मिले हैं जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इंसानों के लिए बड़ा खतरा घोषित किया है. चेन्नई और मुंबई के सीवेज में क्लेबसिएला न्यूमोनी (Klebsiella pneumoniae) की भारी मौजूदगी पाई गई है, जो निमोनिया जैसी बीमारियां फैलाता है. वहीं, कोलकाता में सूडोमोनास एरुगिनोसा (Pseudomonas aeruginosa) नाम का बैक्टीरिया बहुत ज्यादा मिला है, जिसने माइक्रोब्स के नेचुरल बैलेंस को ही बिगाड़ दिया है. ये बैक्टीरिया इसलिए डरावने हैं क्योंकि इन पर ज्यादातर दवाइयां अब बेअसर साबित हो रही हैं.
बैक्टीरिया कैसे बनते हैं अंदर से खतरनाक?
वैज्ञानिकों के अनुसार, बैक्टीरिया खुद को बचाने के लिए तीन चालाक तरीके अपनाते हैं. सबसे पहले, वो अपनी आउटर लेयर को इतना सख्त कर लेते हैं कि दवा उनके अंदर घुस ही नहीं पाती. दूसरा, अगर दवा अंदर चली भी जाए, तो वो उसे पंप के जरिए बाहर फेंक देते हैं. तीसरा, वो ऐसे केमिकल छोड़ते हैं जो दवा को शरीर के अंदर ही तोड़कर बेकार कर देते हैं. सबसे डराने वाली बात ये है कि ये बैक्टीरिया अपने जींस को दूसरे बैक्टीरिया में भी फैला सकते हैं, जिससे पूरा ग्रुप 'सुपरबग' बन जाता है.
कैसे फैलता है खतरा?
खतरे का सबसे बड़ा कारण मोबील जेनेटिक एलिमेंट्स (MGEs) हैं, जो एक बैक्टीरिया से दूसरे में दवाओं को बेअसर करने वाले जीन ट्रांसफर करते हैं. शहरों के गंदे नाले (सीवेज) इसके लिए सबसे मुफीद जगह हैं, क्योंकि वहां भारी मात्रा में बैक्टीरिया और दवाओं के अवशेष एक साथ मौजूद होते हैं. स्टडी के अनुसार, टेट्रासाइक्लिन और बीटा-लैक्टम जैसी आम दवाओं के खिलाफ रेजिस्टेंस इसी वजह से बहुत तेजी से फैल रहा है.
इस रिसर्च से साफ हो गया है कि आपके शहरों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है. ये स्टडी चेतावनी देती है कि दवाइयों को बेअसर करने वाले जिवाणु हमारे आसपास के नालों में ही पल रहे हैं, जिनमें से कई तो अभी तक अनजान हैं. अगर हमने अब भी एंटीबायोटिक दवाओं का सही इस्तेमाल और गंदे पानी की बेहतर निगरानी शुरू नहीं की, तो आने वाले समय में मामूली बीमारियां भी लाइलाज और जानलेवा हो सकती हैं। वक्त रहते संभलना ही अब एकमात्र रास्ता है.