सूरज तप रहा था. एक तरफ तो तपिश में झुलसाता थार का रेगिस्तान तो दूसरी ओर हर एक कोस पर पानी की झलक दिखाती झिलमिलाते मृगतृष्णा... गजनी का सुल्तान महमूद अपने घोड़े की लगाम कसकर थामे था. उसकी काठी से बंधे थे सोमनाथ के अवशेष. गुजरात के सबसे समृद्ध मंदिर से लूटा गया सोना-चांदी और रत्नों का अंबार. जनवरी 1026 ईस्वी की सुबह विजय के साथ शुरू हुई थी. 50,000 योद्धाओं ने मंदिर पर धावा बोला, मूर्तियां तोड़ीं और रक्षकों का संहार किया.
लेकिन अब, कच्छ के रण और थार के अभिशप्त रास्ते से लौटते हुए, उसकी सेना विनाश के मुहाने पर थी.रेगिस्तान का शाप उसका इंतज़ार कर रहा था.
गजनवी वंश का स्वर्णकाल
962 ईस्वी में सामानी वंश के पतन के दौर में तुर्की ग़ुलाम सेनापति अलप्तगीन ने बुखारा के दरबारी षड्यंत्रों का लाभ उठाकर गजनी पर कब्जा कर लिया. उसका उत्तराधिकारी सबुक्तगीन, बचपन में तुर्की घुमंतुओं से खरीदा गया एक गुलाम था, 977 में सत्ता में आया और उसने लघमान व पेशावर में हिंदू शाही शासकों को हरा दिया.
सबुक्तगीन का राज्य काबुल नदी तक फैल गया. 997 में उसकी मौत के बाद बेटों में संघर्ष हुआ, लेकिन महमूद ने अपने भाई इस्माइल को हराकर 998 में सुल्तान की गद्दी संभाल ली. इसके बाद लूट और छापों से साम्राज्य का विस्तार हुआ. भारत पर एक के बाद एक हमले हुए. मुल्तान पर कब्ज़ा (1005), थानेसर के मंदिरों का विध्वंस (1014), कन्नौज की लूट (1019).
1025 तक महमूद ने अपने पिता के मामलुक राज्य को एक विशाल साम्राज्य में बदल दिया था. ऑक्सस नदी से लेकर सिंधु घाटी और पश्चिमी ईरान तक उसका प्रभुत्व फैल चुका था. यही गजनवी वंश का स्वर्णकाल था.
25 वर्षों में 16 बार भारत पर हमला कर चुका था महमूद
भारतीय परंपराओं के अनुसार, सोमनाथ की उत्पत्ति दक्ष प्रजापति के श्राप और भगवान शिव के वरदान से जुड़ी है. अरब सागर के तट पर स्थित यह मंदिर सदियों तक भारत का सबसे बड़ा तीर्थ और अपार संपत्ति का केंद्र रहा (केएम मुंशी, जय सोमनाथ).
1000 ईस्वी के बाद से ही यह महमूद के निशाने पर था. एक दिन उसके शिविर में एक दूत हांफता हुआ पहुंचा. 'मेरे सुल्तान,' उसने कहा, 'सोमनाथ… वहां कल्पना से परे ख़ज़ाना है. आदमी के कद की सोने की मूर्तियां और ऐसे रत्न, जो खिलाफत को भी प्रसन्न कर दें.' महमूद की आंखों में वह चमक थी, जिसमें धार्मिक उन्माद और ठंडी गणना दोनों शामिल थे. पच्चीस वर्षों में वह सोलह बार भारत पर हमला कर चुका था, और हर बार पहले से अधिक धन लेकर लौटा था.

“सुरक्षा कैसी है?” उसकी आवाज़ में रेशम-सी नरमी और फौलाद-सी कठोरता थी. 'मंदिर समुद्र तट पर है, किसी बड़े राज्य की सीधी सैन्य सहायता से दूर.' दरबारी इतिहासकारों ने कलम उठाई. बाद में वे लिखेंगे कि सुल्तान ने फैसला लेने में कुछ ही क्षण लगाए.
नवंबर 1025 था. महमूद को अंदाज़ा नहीं था कि यह अभियान उसका अबतक का सबसे बड़ा अभियान होगा, जो सफल तो होगा लेकिन उसके पूरे साम्राज्य को तबाह कर देगा.
सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किए गए
जनवरी 1026 में, दुर्गम इलाकों से लंबे पैदल सफर के बाद गजनवी की सेना सोमनाथ पहुंची. 50,000 सैनिकों ने मंदिर परिसर को मधुमक्खियों के झुंड की तरह घेर लिया. रक्षकों ने अद्भुत साहस दिखाया. दो दिनों तक राजपूत योद्धा आत्मघाती वीरता के साथ ढालों से टकराते रहे. तीसरे दिन घेराबंदी मीनारों और दीवारों तक पहुंच गईं. इसके बाद नरसंहार हुआ. रक्षक मारे गए, पुजारियों को वेदियों पर ही मौत के घाट उतारा गया, भागते तीर्थयात्रियों को काट डाला गया. प्रसिद्ध सोमनाथ लिंग, जिसे दैवी शक्ति का प्रतीक माना जाता था, तोड़ दिया गया. कहा जाता है कि महमूद ने स्वयं पहला प्रहार किया और उसके टुकड़े साम्राज्य की मस्जिदों के द्वारों पर बिछाने के लिए भेजे गए.
लेकिन असली इनाम मंदिर के तहखानों में था.
सोने-चांदी के हज़ारों संदूक, रत्न, हाथीदांत, रेशमी वस्त्र, सदियों के चढ़ावे की संपत्ति. ऊंटों, घोड़ों और हाथियों पर जितना लादा जा सकता था, लादा गया, फिर भी बहुत कुछ छूट गया. उस रात विजय का जश्न मना. शराब बहती रही. सेनापति अपने हिस्से गिनने लगे. महमूद विजय और मदिरा के नशे में था. उसने कच्छ के रण और थार के रास्ते सिंध होकर लौटने का निर्णय लिया. उसे पता था कि गुजरात का चालुक्य शासक राजा भीम (1022–1064) सहयोगियों को जुटा रहा है और सामान्य रास्ते बंद हो सकते हैं.
...लेकिन कच्छ के रास्ते वापसी की भूल
ऐसे में महमूद ने कच्छ की ओर से जाना चुना. इस यात्रा का पहला हफ्ता आसान रहा. जनवरी में कच्छ का रण, नमक का विशाल मैदान कठिन जरूर था, लेकिन सेना आगे बढ़ती रही.
फिर सूरज ने अपनी आंखें बदल लीं. थार का रेगिस्तान मौत की फैली हुई चादर की तरह सामने था. सेना पुराने रस्तों पर आगे बढ़ती रही. भूख से अधिक प्यास सता रही थी और हर थोड़ी दूर देखने पर लगता कि पानी उधर ही होगा.
खैर... पस्त होती सेना आगे बढ़ती रही. कुछ दिनों तक चलने पर पहला कुआं सूखा निकला. फिर दूसरा भी और तीसरा भी. आसपास के कई कुएं जहरीले थे. इस तरह दो हफ्ते बीते और 15वें दिन मौत ने अपना खेल दिखाना शुरू किया. सैनिक मरने लगे. कवच पहनकर चलते सैनिक सूरज की आग में झुलसने लगे, लेकिन अफसरों ने आगे बढ़ते रहने का आदेश दिया, क्योंकि रुकने का सिर्फ एक मतलब था, मौत
...फिर रेत में बिछने लगीं लाशें ही लाशें
बीसवें दिन हालात पूरी तरह बिगड़ चुके थे. खजाना अब अभिशाप बन चुका था. हर सुबह लाशों की गिनती होती, पहले 15,000, फिर 18,000 और हर दिन संख्या बढ़ती गई. इस पर जाट लुटेरे कोढ़ में खाज की तरह थे. वे रेगिस्तान से भूतों की तरह निकलते. छोटी टुकड़ियों में हमला करते, लेकिन कमजोर पड़ चुकी सेना के लिए जानलेवा बन जाते. कहीं से भी तीर बरसते. कभी सुबह-सुबह ही तीरों की वर्षा शुरू हो जाती तो कभी शाम ढलने को होती और किसी भी दिशा से तीरों की बौछार आने लगती. यह दशकों तक जारी रही गजनवी की लूट का ही बदला था.

कम से कम 30 हजार सैनिकों की मौत के बाद बचा-खुचा और लुटा-पिटा कारवां किसी तरह सिंध की सीमा पर पहुंचा. यहां ज्यों ही सिंधु नदी दिखाई दी तो प्यासे सैनिकों को वह स्वर्ग जैसी लगी. सैनिक रो पड़े. अनुशासन टूट गया और वे पानी में कूद पड़े. महमूद नदी किनारे बैठा और अपनी बची हुई सेना को गिनता रहा. सोमनाथ से 50,000 की संख्या में निकली सेना में से लगभग 30,000 मर चुके थे या बिछुड़ गए थे. आधे से अधिक बल नष्ट हो चुका था. वह घुड़सवार सेना, जिसने एक पीढ़ी तक भारत में आतंक मचाया था, लगभग समाप्त हो चुकी थी.
इतिहासकार लिखते हैं कि महमूद इस रेगिस्तानी त्रासदी से कभी पूरी तरह उबर नहीं पाया, हालांकि 1027 में उसने जाटों को दंडित करने के लिए अभियान चलाया. लेकिन उन हफ्तों में सुल्तान के भीतर कुछ टूट गया. इसके बाद उसने कभी भारत के बहुत भीतर तक हमला नहीं किया. पंजाब ही उसका अंतिम लक्ष्य रह गया. आगे धीरे-धीरे महमूद के साम्राज्य और वंश का भी अंत हो गया.