मध्य प्रदेश में हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने शुक्रवार को धार भोजशाला मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. मामला एक प्राचीन ऐतिहासिक-धार्मिक स्थल भोजशाला से जुड़ा था. जिसके दावेदार हिंदु-मुस्लिम दोनों पक्ष थे. यह मामला जिस तरह से अयोध्या राम मंदिर जैसी स्थितियों वाला था, इसका फैसला भी वैसा ही आया है. कोर्ट ने धार जिले में मौजूद इस भोजशाला परिसर को मंदिर करार दिया है, साथ ही अपनी टिप्पणी में मुस्लिम पक्ष के लिए कहा कि वह अपने लिए सरकार से जमीन की मांग कर सकते हैं.
भोजशाला परिसर में मिलीं मूर्तियां और हवन कुंड
हाईकोर्ट में भोजशाला को मंदिर मानने के पीछे जो तर्क दिए, उनमें ASI की दलीलें सबसे प्रमुख हैं. जहां परिसर में मिली मूर्तियों, हवन कुंड और खंभे पर खुदे श्लोकों के आधार पर इसे मंदिर परिसर माना. लेकिन, भोजशाला पर हाईकोर्ट के फैसले के संदर्भ में जो आदेश आया है, उसमें एक शीर्षक अनायास ही अपनी ओर ध्यान खींचता है. इस पूरे फैसले को समझने के लिए इस आदेश में शामिल 'Historical Literature, Archaeological Features and Its Discussion' शीर्षक वाले भाग को गंभीरता से देखना-समझना बेहद जरूरी बन जाता है.
जैन ग्रंथ में ऐतिहासिक विरासत का जिक्र
जैन ग्रंथ प्रबंध चिंतामणि में जिक्र आता है कि, प्रसिद्ध परमार शासक राजा भोज ने 1034 ईस्वी में मध्यप्रदेश के धार में देवी सरस्वती की पूजा के लिए भोजशाला मंदिर बनवाया. यह मंदिर हिंदू दर्शन और संस्कृत भाषा का प्रमुख केंद्र था.
इसके साथ ही यह एक बड़ा और प्रसिद्ध आवासीय विश्वविद्यालय भी था. यहां लगभग 1400 महान विद्वान, कवि और धर्मशास्त्री, जैसे माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भवभूति, मानतुंग, भास्कर भट्ट और धनपाल आदि राजा भोज के संरक्षण में रहे.

भोजशाला में अवनी कूर्मशतम, सरस्वती कंठा भरण, राजमार्तंड और तिथि सारणिका जैसे अनेक विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ रचे गए. धार ज़िला गज़ेटियर के अनुसार भोजशाला उस समय लगभग सभी प्रचलित भारतीय आस्थाओं और विद्याओं के अध्ययन का महान केंद्र थी. खुद राजा भोज 72 प्रकार की कलाओं और 36 प्रकार की सैनिक विद्याओं में निपुण थे. उन्होंने ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, राजनीति, मूर्तिशास्त्र, दर्शन, रसायन, वास्तु आदि विविध विषयों पर 84 ग्रंथों की रचना की थी.
हिंदू संस्कृति के वाहक रहे हैं राजा भोज
केके मुंशी ने राजा भोज के हिंदू सांस्कृतिक योगदान का महत्व इन शब्दों में रेखांकित किया है कि 'उनके शासनकाल में मालवा की सभ्यता एक अद्वितीय उत्कर्ष पर पहुंच गई थी. वे लिखते हैं कि ‘शृंगारमंजरीकथा’ में राजा भोज ने जिस युग-चित्र को उकेरा है वह मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सबसे अधिक गौरवशाली काल की सजीव और विश्वसनीय झलक है. यह समझने पर कि राजा भोज किस-किस प्रकार हिंदू संस्कृति की सभी महान उपलब्धियों के समर्थक और संवाहक रहे, उनके प्रति सम्मान और भी बढ़ जाता है.
1903 में धार रियासत के शिक्षा अधीक्षक केके. लेले ने भवन की दीवारों में से अर्जुनवर्मन (लगभग 1210–15 ई.) के समय का संस्कृत–प्राकृत अभिलेख खोजा. यह अभिलेख आज भी प्रवेश द्वार के भीतर प्रदर्शित है. इसमें ‘विजयश्रीनाटक’ नाम के एक नाटक के अंश हैं, जिसे राजा के आचार्य मदन, जिन्हें ‘बालसरस्वती’ भी कहा गया, ने रचा था.
क्यों पड़ा परिसर का नाम भोजशाला?
लेले ने अन्य शिलालेखों का भी उल्लेख किया, एक बड़े शिलापट्ट पर भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की स्तुति में रचित कूर्मशतक के श्लोक अंकित हैं. एक सर्पाकार अभिलेख संस्कृत व्याकरण के नियमों को दर्शाता है. खासकर यह व्याकरणिक अभिलेख ही वह कारण बना, जिसकी वजह से लेले ने इस भवन को राजा भोज के नाम पर ‘भोजशाला’ या ‘Hall of Bhoja’ कहा, क्योंकि राजा भोज (लगभग 1000–1055 ई.) अलंकारशास्त्र और व्याकरण पर ‘सरस्वती कंठाभरण’ जैसे अनेक ग्रंथों के लेखक थे. ‘भोजशाला’ शब्द का पहला प्रकाशित उल्लेख सीई. लुअर्ड ने 1908 में किया.

इंडिया इंपीरियल गज़ेटियर 1908, खंड XI, के पेज 295 पर जिक्र है कि ‘Raja Bhoj’s School’ चौदहवीं–पंद्रहवीं सदी में हिंदू अवशेषों से निर्मित एक और मस्जिद है. इसका वर्तमान नाम उन असंख्य शिलाफलकाओं से निकला है जिन पर संस्कृत व्याकरण के नियम अंकित हैं और जिन्हें फर्श में बिछा दिया गया था.
देवी सरस्वती को समर्पित था मंदिर
यह भवन एक प्राचीन मंदिर के स्थान पर खड़ा है, जो संभवतः उसी मंदिर का अवशेष है जिसे यहां मिले नाट्य‑शिलालेख में जिक्र किया गया है, वह मंदिर देवी सरस्वती को समर्पित था और जिसे धारनगरी के चौरासी चौकों का ‘आभूषण’ कहा गया है. दो स्तंभों पर संस्कृत के विभक्ति–प्रत्ययों का संक्षिप्त सार सर्प के आकार आकृति में उत्कीर्ण है, जिसे इसी कारण ‘सर्पबन्धी’ कहा गया.
रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की 1904 की पत्रिका में ‘Dhar and Mandu’ शीर्षक अध्याय के अनुच्छेद XI में भोजशाला का उल्लेख है. वहां लिखा है कि कमाल‑उल‑दीन की क़ब्र से सटी यह मस्जिद स्थानीय हिंदू समुदाय में ‘राजा भोज का मदरसा’ के नाम से जानी जाती है. वर्तमान रूप में यह आसपास की इमारतों के समकालीन है, लेकिन इसकी समस्त सामग्री हिंदू मंदिरों से ली गई प्रतीत होती है.

अनुष्टुप छंद के श्लोक भी मिले
मुख्य सारणी के ऊपर अनुष्टुप छंद के दो संस्कृत श्लोक उत्कीर्ण हैं; पहले में उदयादित्य और नरवर्मन तथा दूसरे में केवल उदयादित्य का नाम आता है. ये दोनों राजा, धार पर शासन करने वाले राजा भोज के लगभग तत्काल उत्तराधिकारी थे. इन श्लोकों का आशय यह है कि राजा उदयादित्य और नरवर्मन की तलवारें चारों वर्णों और वर्णमाला के अक्षरों दोनों की समान रूप से रक्षा के लिए सदैव तत्पर थीं; यह स्तंभ‑लेख कवियों और राजाओं को संतोष देने के लिए उदयादित्य ने स्थापित कराया. इसके अतिरिक्त, मस्जिद की फर्श में लगी काली शिलाओं पर आज भी अनेक स्थानों पर प्राचीन शिलालेखों के अवशिष्ट चिह्न देखे जा सकते हैं, जिन्हें मुस्लिम विजेताओं ने लगभग पूरी तरह मिटा दिया.