डोनाल्ड ट्रंप के दौर का अमेरिका अपने विस्तारवादी मंसूबे खुलकर दिखा रहा है. ट्रंप को पनामा भी चाहिए, कनाडा भी और ग्रीनलैंड भी. साल की शुरुआत में ही अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अरेस्ट कर वहां के संसाधनों पर कब्जा कर लिया. अकूत संभावनाओं से सजा ग्रीनलैंड अगला टारगेट है. लेकिन यहां वेनेजुएला-स्टाइल टेकओवर नहीं होगा, बल्कि अमेरिका बेहद चुपचाप उसपर कब्जा कर सकता है.
लगभग 60 हजार की आबादी वाले ग्रीनलैंड के पास सेना के नाम पर डेनिश आर्मी है. अमेरिका के सामने उसकी कोई बिसात नहीं. कई रिपोर्ट्स ये तक कह रही हैं कि यूएस अपने पांच हेलीकॉप्टर भेजकर ही कब्जा कर सकता है. लेकिन इससे इंटरनेशनल मंच पर उसका नाम खराब होगा. लिहाजा उसने अलग तरीके खोज रखे हैं, और उन पर काम भी शुरू कर दिया.
ग्रीनलैंड में आजादी की चिंगारी लगाई जा चुकी
ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही उनकी सरकार ने ग्रीनलैंड की आजादी की बात शुरू कर दी. ग्रीनलैंड फिलहाल डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन उसे काफी हद तक खुद का शासन मिला हुआ है. अमेरिका चाहता है कि ग्रीनलैंड पूरी तरह स्वतंत्र हो जाए. अगर ऐसा हो, तो वो सीधे अमेरिका से समझौते कर सकेगा. अभी की स्थिति में उसे हर बड़े फैसले के लिए डेनमार्क की मंजूरी लेनी पड़ती है.
ट्रंप कुल मिलाकर एक बिचौलिए पर एनर्जी नहीं लगाना चाहते.
ऐसे में एक तरीका खोजा गया. ग्रीनलैंड के लोगों में आजादी की लौ लगाई जाए. चुपचाप ग्रीनलैंडर्स को इसके लिए उकसाया जा रहा है. इसके लिए पहले जनमत संग्रह होगा. अगर मेजोरिटी आजादी चाहे तो नूक और कोपेनहेगन के बीच समझौता होगा.

पिछले साल हुए सर्वे में सामने आया कि ग्रीनलैंड के 56 फीसदी लोग आजादी के पक्ष में हैं. वहीं 28 फीसदी इसके खिलाफ हैं.
क्या ट्रंप-समर्थक गुट ग्रीनलैंड में सक्रिय
इस बीच डेनमार्क की मीडिया की रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ट्रंप से जुड़े समूह ग्रीनलैंड में चुपचाप असर डालने की कोशिश कर रहे हैं. डेनिश इंटेलिजेंस पीईटी ने चेतावनी दी कि ग्रीनलैंड में बाहरी ताकतें अपना असर जमाने की प्रक्रिया में हैं.
अगर दावे में सच्चाई है तो कोई अनोखी बात नहीं. रूस को ही लें तो उसके यूक्रेन में कई राज्यों के साथ यही किया. रूसी बोलने वाले राज्यों में उसने धीरे-धीरे अपना असर जमाया और आजादी के नाम पर अलगाववादी ताकतों को सपोर्ट करने लगा. अब यूक्रेन से वो इन्हीं प्रांतों को मांग रहा है और राज्य तैयार भी हैं. पॉलिटिको की एक रिपोर्ट में रूस-यूक्रेन मामलों के एक्सपर्ट के हवाले से इसपर डिटेल में बात है.
रूस जमीन पर और ऑनलाइन, दोनों तरह की रणनीति इस्तेमाल करता है. ग्राउंड पर वह ऐसे लोगों के साथ काम करता है जो उसकी तरह सोचते हों. जैसे कट्टरपंथी दल, प्रवासी लोग या रूस के समर्थक कारोबारी.
रूस इंटरनेट पर भी बड़ा खेल करता है. वह फेक अकाउंट्स के जरिए कुछ लोगों को सही और कुछ को गलत दिखाता है. ऐसे संदेशों की बाढ़ लग जाती है, और ये इतनी बार लोगों को दिखता है कि वे रूस की बात पर यकीन करने लगते हैं. वो कुल मिलाकर खुद को ऐसे दिखाता है कि प्रांत या देश या किसी समूह के विकास के लिए वही सबसे जरूरी है. ऐसे में उसके साथ जाना ही विकल्प रह जाता है.

यही भ्रम अमेरिका भी ग्रीनलैंड में पैदा कर रहा
पिछले महीने ट्रंप के रक्षा विभाग से एक बड़ा बयान आया- कोई भी ग्रीनलैंड के लिए अमेरिकी मिलिट्री से नहीं लड़ेगा. ये बड़ा बयान है, जिसकी कई परतें हैं. इसे सुनकर किसी भी ग्रीनलैंडर को लगेगा कि वो अकेला है और अमेरिका से लड़ने की बजाए, उससे दोस्ती कर लेनी चाहिए.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पिछले साल ग्रीनलैंड के दौरे पर गए. वहां उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड के लोगों को अपने भविष्य का फैसला खुद करने का हक है. यानी यह तय करना कि वे आजाद रहना चाहते हैं या किसके साथ जाना चाहते हैं, यह उनका अधिकार है. आजादी की बात करते हुए वेंस ने यह भी जोड़ दिया कि अमेरिका ग्रीनलैंड के साथ साझेदारी चाहता है. यानी कब्जे जैसे क्रूर शब्द को खुद फैसला लेने की आजादी जैसी भाषा के पीछे छिपाया गया.
मान लीजिए अमेरिका की कोशिशें कामयाब हो जाती हैं और ग्रीनलैंड में आजादी पर जनमत संग्रह जल्दी हो जाए तब भी यूएस को काम करना होगा. अगर लोग डेनमार्क से अलग होने के पक्ष में वोट दें, तो उसके बाद अगला कदम होगा देश को अमेरिकी प्रभाव में लाना.
एक तरीका यह हो सकता है कि ग्रीनलैंड को अमेरिका का नया राज्य बना दिया जाए. ट्रंप के करीबी लोग इस विचार से पहले भी खेलते रहे हैं. कुछ रोज पहले ही सोशल मीडिया पर ग्रीनलैंड का नक्शा अमेरिकी झंडे में लिपटा हुआ दिखा, जिसपर सून लिखा हुआ था.

समझौतों का झुनझुना भी थमाया जा सकता है
हालांकि ग्रीनलैंड के लोग डेनमार्क की जगह अमेरिका को चुनने के पक्ष में नहीं. ऐसे में अमेरिका के पास और रास्ते भी हैं. पिछले साल मई से खबरें आ रही हैं कि ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड के साथ एक खास समझौता करना चाहता है, जिसे कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन यानी कोफा कहा जाता है. ऐसा समझौता अमेरिका पहले से माइक्रोनेशिया, मार्शल आइलैंड्स और पलाऊ जैसे देशों के साथ कर चुका है.
इसके तहत अमेरिका उन देशों को सुरक्षा और फ्री ट्रेड देता है. बदले में अमेरिकी सेना को वहां बिना रोक-टोक काम करने की आजादी मिलती है. यानी देश दिखने में आजाद लगे लेकिन सुरक्षा और रणनीति पर अमेरिका का गहरा असर होता है. यही मॉडल ग्रीनलैंड के लिए भी चर्चा में है. वैसे इसका अलग असर भी हो सकता है. ट्रंप ऐसे डीलमेकर के तौर पर जाने जाते हैं जो अपनी इच्छा अगली पार्टी पर थोपते हैं और बाद में वादे भी पूरे नहीं करते. ऐसे कई उदाहरण देख चुका ग्रीनलैंड अमेरिकी डील को नामंजूर भी कर सकता है.
यूरोप, खासकर डेनमार्क के यूरोपीय संघ वाले साथी देश, ग्रीनलैंड को डेनमार्क से अलग करने की किसी भी कोशिश पर तुरंत विरोध करेंगे. यानी वे इसे मंज़ूर नहीं करेंगे और दबाव डालेंगे.
अमेरिका के पास इस मामले में एक तुरुप का पत्ता है- यूक्रेन.
ग्रीनलैंड के मामले में अगर यूरोप यूएस के पक्ष में न आए तो वॉशिंगटन कह सकता है कि वो यूक्रेन को रूस से नहीं बचाएगा. पूरा यूरोप पहले से ही पुतिन से खौफ खाए हुए है. उससे बचने के लिए वो अनचाहे ही अमेरिकी इच्छा के साथ दिख सकता है, जिसका सीधा असर डेनमार्क और फिर ग्रीनलैंड पर पड़ेगा.

क्या हो अगर डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों अड़ जाएं
तब आखिरी रास्ता है, सैन्य कार्रवाई. अमेरिका के लिए ये सबसे आसान है. वो सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी भेजकर भी राजधानी पर क्लेम कर सकता है कि हां, अब ये मेरी है. ग्रीनलैंड में पहले से ही पांच सौ अमेरिकी सैन्य अधिकारी रह रहे हैं. इसके अलावा, न्यूयॉर्क के लगभग सौ नेशनल गार्ड्स भी हर साल रिसर्च मिशन में मदद करने आते हैं. ग्रीनलैंड में अमेरिकी दूतावास का स्टाफ भी है. यानी यूएस पहले से ही इसपर काम कर रहा है. पॉलिटिको की रिपोर्ट में एक सैन्य एक्सपर्ट के हवाले से दावा है कि यूएस फोर्स आधे घंटे के भीतर ग्रीनलैंड पर कब्जा कर सकती है.
इसके उलट, ग्रीनलैंड का डिफेंस बहुत कमजोर है. वहां अपनी सेना नहीं है. डेनमार्क का जॉइंट आर्कटिक कमांड भी वैसा मॉडर्न और तेज नहीं. उसके पास संसाधन भी बेहद कम हैं.
इसके बाद भी यूएस सैन्य कार्रवाई को सबसे आखिरी तरीका मानेगा. वो जानता है कि ऐसा करने का मतलब है नाटो का खत्म हो जाना. नाटो को लेकर ट्रंप धमकियां भले देते हों लेकिन इस सुरक्षा संगठन को खड़ा यूएस ने ही किया था, और इसकी धमक किसी न्यूक्लियर बम से कम नहीं. नाटो के खत्म होने के साथ ही अमेरिका और यूरोप के रिश्ते का आखिरी तार भी टूट जाएगा. इससे वॉशिंगटन खुद नाजुक स्थिति में पहुंच जाएगा, जहां चारों ओर दुश्मन ही दुश्मन हों. यानी लाख चाहकर भी ट्रंप प्रशासन इस एक्शन से बचेगा.