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सावरकर का हिंदुत्व RSS से अलग था, संघ से उनके रिश्ते उतार-चढ़ाव वाले थेः डॉ. विक्रम संपत

इतिहासकार डॉ. विक्रम संपत ने कहा, 'हम लोग हिंदू राष्ट्र के बारे में जो विचार रखते हैं, वह भी काफी गलत है. यह भी लोग नहीं जानते हैं कि सावरकर आरएसएस का हिस्सा नहीं थे. उनके बड़े भाई बाबाराव आरएसएस के संस्थापकों में थे, लेकिन सावरकर और रिश्ते हमेशा ऊपर-नीचे होता ही रहा.'

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Dr. Vikram Sampath Dr. Vikram Sampath
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 'सावरकर और RSS के रिश्ते हमेशा ऊपर-नीचे होते रहे'
  • संपत बोले- सावरकर ने हिंदू समाज को किया संगठित

Agenda Aajtak 2021: विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) का हिंदुत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से अलग था और संघ के साथ उनके रिश्ते उतार-चढ़ाव वाले थे. ये बातें इतिहासकार डॉ. विक्रम संपत (Dr. Vikram Sampath) ने शनिवार को नई दिल्ली में आयोजित 'एजेंडा आजतक' के मंच पर कहीं. 'सावरकर के नाम पर' सत्र में डॉ. विक्रम संपत के अलावा, इतिहासकार चमनलाल और स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक के रंजीत सावरकर ने भी हिस्सा लिया. कार्यक्रम में तीनों ने सावरकर को लेकर विस्तार से चर्चा की.

इतिहासकार डॉ. विक्रम संपत ने कहा, 'हम लोग हिंदू राष्ट्र के बारे में जो विचार रखते हैं, वह भी काफी गलत है. ये भी लोग नहीं जानते हैं कि सावरकर आरएसएस का हिस्सा नहीं थे. उनके बड़े भाई बाबाराव आरएसएस के संस्थापकों में थे, लेकिन सावरकर और संघ के रिश्ते हमेशा ऊपर-नीचे होते ही रहे. जब गोलवलकर जोकि आरएसएस के सरसंघचालक थे, तब उनके साथ काफी मतभेद थे. उन्होंने एक काफी लोकप्रिय बयान दिया था कि आरएसएस के स्वयंसेवक की समाधि पर कुछ लिखा जाए कि उसकी जीवन में उपलब्धि क्या रही तो सिर्फ तीन बातें होंगी. पहली- वह पैदा हुए, फिर आरएसएस में शामिल हुए और फिर निधन हो गया. इसके अलावा, उसकी कोई और उपलब्धि नहीं है. सावरकर का हिंदुत्व अलग है. आरएसएस के हिंदुत्व की परिकल्पना अलग थी और गोडसे का हिंदुत्व अलग था.''

कार्यक्रम में जब इतिहासकार डॉ. विक्रम संपत से सवाल पूछा गया कि उनके हिसाब से सावरकर का हिंदुत्व क्या था, तब उन्होंने जवाब दिया कि जब वे रत्नागिरी के जेल में थे, तब हिंदुत्व की परिकल्पना की. उस समय पूरे देश में खिलाफत आंदोलन चल रहा था. उन्होंने एक किताब में लिखा कि आखिर कौन हिंदू है. यह धर्म से जुड़ी हुई चीज नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रवाद से जुड़ा हुआ है, जोकि इस देश से अपनी वफादारी रखता है. बाद में जब वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने, तब सारे भाषण में इसे लेकर साफ बोला था. उनके हिसाब से हिंदू राष्ट्र में कोई मैजोरिटी-माइनॉरिटी नहीं होगा. कानून की नजर में सभी बराबर होंगे. मैजोरिटी को कुछ अलग चीजें नहीं मिलेंगी कि वे बहुसंख्यक हैं और माइनॉरिटी को कुछ रियायतें नहीं दी जाएंगी कि वे अल्पसंख्यक हैं. कानून के हिसाब से सबकुछ बराबर होगा. 

'अंग्रेजों के खिलाफ भूख हड़ताल से सावरकर ने बनाई दूरी'
वहीं, इतिहासकार चमनलाल ने सावरकर की दया याचिकाओं को लेकर पूछे गए सवाल पर एक किताब के हवाले से जवाब दिया कि अंडमान की जेल में 498 राजनीतिक बंदी थे और ज्यादातर उनमें क्रांतिकारी भावनाओं के थे. उनमें शहीद भगत सिंह के साथी और कई अन्य बंदी वहां बंद थे. एक बंदी त्रिलोकनाथ चक्रवर्ती 40 साल से ज्यादा अंडमान में रहे. भगत सिंह के साथी 16-17 साल तक रहे. वहीं, सावरकर सिर्फ 10 साल ही रहे. उन्होंने कहा,  'भगत सिंह के साथी और अन्य ने अंग्रेजों के खिलाफ भूख हड़तालें कीं. लेकिन सावरकर ने कोई भूख हड़ताल नहीं की. सात-आठ लोग शहीद हो गए. सावरकर से कहा गया था कि वह भी भूख हड़ताल में आएं, लेकिन सावरकर इससे दूरी बनाकर रखते थे.' चमनलाल ने कहा, 'मैं दया याचिका देने को बुरा नहीं समझता हूं. यह उनका हक था.'

विक्रम संपत बोले- सावरकर ने हिंदू समाज को किया संगठित
डॉ. विक्रम संपत ने कार्यक्रम में कहा कि उनके लिए सावरकर प्रखर राष्ट्रभक्त, क्रांतिकारी और समाज सुधारक थे, जिन्होंने हिंदू समाज को संगठित किया. साथ ही, वह प्रखर योद्धा और वीर थे. डॉ. संपत ने सावरकर के बारे में बताया कि अगर वे अंग्रेजों के पक्ष में होते तो उनकी जासूसी नहीं की जाती. उन्होंने कहा कि सावरकर कोई आम आदमी नहीं थे. उन्होंने विदेश में वकालत की थी. उनका सरकार में इस्तेमाल किया जा सकता था. 1937 में जब सरकारें बनना शुरू हो गईं, तब उन्हें भी पद दिया जा सकता था, यदि वे अंग्रेजों के पक्ष में होते तो. लेकिन जब साल 1924 में उनकी रिहाई हुई तो शर्त रखी गई कि पांच साल राजनीति से दूर रहना है और फिर रत्नागिरी में ही नजरबंद करके रखा जाएगा. 

 

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