scorecardresearch
 

सावरकर अंग्रेजों के पक्ष में होते तो छूटने के बाद भी उनकी जासूसी नहीं होतीः इतिहासकार डॉक्टर विक्रम संपत

डॉ. विक्रम संपत ने सावरकर के बारे में बताया कि मेरे लिए सावरकर एक प्रखर राष्ट्रभक्त थे, एक क्रांतिकारी, समाज सुधारक जिन्होंने हिंदू समाज को संगठित किया. वह एक प्रखर योद्धा और वीर थे.

X
एजेंडा आजतक के मंच पर डॉ. विक्रम संपत एजेंडा आजतक के मंच पर डॉ. विक्रम संपत
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 'सावरकर पर अंग्रेज सरकार बिल्कुल भरोसा नहीं करती थी'
  • डॉ. संपत बोले- प्रखर राष्ट्रभक्त थे सावरकर

Agenda Aajtak 2021: 'एजेंडा आजतक' के कार्यक्रम में शनिवार को इतिहासकार डॉ. विक्रम संपत, चमन लाल और स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक के रंजीत सावरकर ने हिस्सा लिया. नई दिल्ली में आयोजित किए गए कार्यक्रम में डॉ. विक्रम संपत ने कहा कि यदि सावरकर अंग्रेजों के पक्ष में होते तो छूटने के बाद भी उनकी जासूसी नहीं की जाती. इतिहासकार विक्रम संपत ने कहा कि साल 1911 में सावरकर पहली बार अंडमान की जेल में जाते हैं. उन्हें बेसिक सहूलियत तक नहीं दी गई थी. दिनभर उन्हें कोल्हू के बैल का टास्क दिया जाता था कि 30 पाउंड का तेल निकालना है और फिर उसे चेक किया जाता था. अगर तय मात्रा में नहीं निकला तो उन्हें खाना नहीं दिया जाता. 

'सावरकर के नाम पर' सत्र में डॉ. विक्रम संपत ने आगे कहा, 'अंग्रेज सरकार अपनी तरफ रहने वालों का बहुत ख्याल रखती थी. हिंदी के लेखक यशपाल के बारे में कहा जाता है कि वह क्रांतिकारियों के साथ थे, लेकिन अंग्रेजों के पिट्ठू की तरह थे. जब क्रांतिकारियों को पता चल गया कि यशपाल ही घर के भेदी हैं तो अंग्रेजों ने उन्हें बचाने के लिए जेल में डाल दिया और वहीं शादी भी हुई. जब अंग्रेज सरकार देश से चली गई तब एक लेटर सामने आया कि वह बहुत वफादार आदमी थे, जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए.' इतिहासकार ने सावरकर के बारे में बताया कि सावरकर कोई आम आदमी नहीं थे. उन्होंने विदेश से वकालत की थी. उनका सरकार में इस्तेमाल किया जा सकता था. 1937 में जब सरकारें बनना शुरू हो गईं, तब उन्हें भी पद दिया जा सकता था, यदि वे अंग्रेजों के पक्ष में होते तो. लेकिन जब साल 1924 में उनकी रिहाई हुई तो शर्त रखी गई कि पांच साल राजनीति से दूर रहना है और फिर रत्नागिरी में ही नजरबंद करके रखा जाएगा. 

'वफादार होते तो क्यों की जाती बाद में निगरानी?'
उन्होंने आगे कहा, 'बाद में सावरकर की पांच साल की अवधि को बढ़ाकर 13 साल कर दिया गया. ऐसे में सवाल उठता है कि जो आपका वफादार है तो उनकी निगरानी क्यों की जाती? आप तुरंत उन्हें रिहा करके अंग्रेज सरकार में रख सकते थे, लेकिन यही दिखाता है कि 1947 तक सावरकर पर अंग्रेज सरकार बिल्कुल भरोसा नहीं कर रही थी. उनके छूटने के बाद भी अंग्रेज सरकार घबराई हुई थी.' वहीं, सावरकर कौन हैं? इस पर कार्यक्रम में शामिल हुए रंजीत सावरकर ने कहा कि वे ऐसे राष्ट्रभक्त हैं, जोकि उपयुक्तवाद में विश्वास रखते थे. जो देश के लिए सही होता था, वे करते थे और उनका यह मानना था कि स्थल और काल बदलता है तो विचार बदलने पड़ेंगे. जो सही है, उसे करना है. 

विक्रम संपत ने बताया- उनके लिए कैसे थे सावरकर
डॉ. विक्रम संपत ने सावरकर के बारे में बताया कि मेरे लिए सावरकर एक प्रखर राष्ट्रभक्त थे, एक क्रांतिकारी, समाज सुधारक जिन्होंने हिंदू समाज को संगठित किया. वह एक प्रखर योद्धा और वीर थे. वहीं, इतिहासकार चमनलाल ने कहा कि सावरकर हिंदुस्तान की तीन धाराओं में से एक का प्रतिनिधित्व करते थे, जोकि धारा धर्म आधारित राज्य का समर्थन करती थी. वहीं, जब वक्ताओं से पूछा गया कि सावरकर को आखिर अंग्रेजों से माफी मांगने की आवश्यकता क्यों पड़ी थी? तब इस पर रंजीत सावरकर ने दावा किया कि सावरकर ने कभी भी माफी नहीं मांगी. उन्होंने कहा, 'उन्होंने (सावरकर) कभी माफी नहीं मांगी. उन्होंने जो एप्लीकेशन दी, उसका अधिकार सभी बंदियों को था. दस साल में सात पत्र भेजने की उन्हें अनुमति दी गई थी और इसमें उन्होंने कुछ भी व्यक्तिगत नहीं लिखा. सिर्फ एक दो लाइन ही घरवालों के बारे में थी. हर पत्र में यही विषय था कि क्रांतिकारी यातनाएं सहन कर रहे हैं. इससे प्रेरणा उत्पन्न हों. यह सब मौजूद हैं. ब्रिटिश सावरकर को सबसे खतरनाक मानते थे और सोचते थे कि यदि उन्हें भारत में रखा जाएगा तो उनके साथी उन्हें छुड़वा लेंगे.''

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें