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Ram Mandir: 'राम के वंशज' आदिवासियों ने की थी एक्टिंग, रामायण पर बनी इस फिल्म को मिला था नेशनल अवार्ड

अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर का उद्घाटन होने में बस कुछ ही दिन हैं. इस शानदार आयोजन से पहले हर तरफ राम नाम की धूम है. प्रभु श्रीराम और राम कथा को सिनेमा ने भी खूब बड़े पर्दे पर उतारा है. आपको बताते हैं रामायण पर बेस्ड एक अनोखी फिल्म के बारे में...

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'कंचन सीता' फिल्म का एक सीन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)
'कंचन सीता' फिल्म का एक सीन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

भारतीय संस्कृति में राम नाम का महत्त्व क्या है, इसका असर इन दिनों खूब देखा जा सकता है. अयोध्या में राम लला के भव्य मंदिर का उद्घाटन होना है और इस मौके का इंतजार टकटकी लगाए कर रही जनता में माहौल एकदम राममय हो चुका है. इस माहौल में राम नाम और राम कथा की चर्चा भी खूब हो रही है. भारत की संस्कृति को आकार देने वाली राम कथा को स्क्रीन पर भले ही लोगों ने रामानंद सागर के 'रामायण' टीवी सीरियल में देखा हो, मगर राम नाम को सिनेमा ने भी बड़े पर्दे पर खूब उतारा है. 

रामायण पर बेस्ड फिल्मों की शुरुआत तो साइलेंट सिनेमा के दौर में ही, दादासाहब फाल्के की 'लंका दहन' से हो चुकी थी. मगर सिनेमा की बेहतर होती तकनीकों के साथ, भारत के प्राचीन महाकाव्यों में से एक रामायण को पर्दे पर, उसकी पूरी भव्यता और दिव्यता के साथ उतार पाने का सपना हमेशा से फिल्ममेकर्स देखते रहे हैं. 

मगर क्या आपको रामायण पर बेस्ड ऐसी फिल्म के बारे में पता है जिसमें आदिवासी कलाकारों ने, राम कथा के पात्रों का किरदार निभाया था? ये शायद एक अकेली ऐसी फिल्म है जिसमें भगवान राम के अंतिम दिनों और उनके महाप्रस्थान को दिखाया गया है. सिनेमा की क्रिएटिविटी का बेहतरीन नमूना पेश करने वाली इस फिल्म ने नेशनल अवार्ड भी जीता था. क्या आप इस फिल्म का नाम जानते हैं?

'सोने की सीता'
रामायण पर बेस्ड जिस फिल्म की बात हम कर रहे हैं, वो है मलयालम में बनी, डायरेक्टर जी. अरविंदन की फिल्म 'कंचन सीता'. अरविंदन ने इस फिल्म में रामायण के उत्तर कांड से कहानी ली थी, जहां सीता अयोध्या छोड़कर दंडकारण्य जा चुकी हैं. फिल्म की शुरुआत में राम कहते दिखते हैं कि सीता का पति, केवल अयोध्या की जनता का सेवक है. दिलचस्प बात ये है कि पूरी फिल्म में सीता हैं ही नहीं. लेकिन उनके चरित्र पर उठे सवाल, अग्नि परीक्षा और फिर अयोध्या छोड़ने से पूरा माहौल कैसे बदला, ये अरविंदन ने फिल्म में दिखाया. 

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'कंचन सीता' फिल्म का एक सीन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

फिल्म में राम के अश्वमेध यज्ञ की कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट है. यहां प्लॉट ये है कि अश्वमेध यज्ञ करने वाला बिना पत्नी यज्ञ पर नहीं बैठ सकता. और चूंकि सीता अयोध्या में नहीं हैं, तो सवाल उठता है कि राम अकेले कैसे बैठेंगे? इस फिल्म में बिन सीता, राम के यज्ञ पर बैठने से भरत इतने नाराज दिखाए गए हैं कि वो अपने बड़े भाई से लड़ने लगते हैं. गुरु वशिष्ठ राम को दूसरी शादी करने की सलाह देते हैं. राम तैयार नहीं होते तो ये तय किया जाता है कि यज्ञ के लिए सीता की एक सोने की प्रतिमा बनाकर उनके बगल में रख दी जाए. और सोने यानी 'कंचन' की सीता से ही इस फिल्म का टाइटल निकला है. 

आदिवासियों ने निभाए फिल्म के किरदार 
अरविंदन की इस फिल्म को साउथ सिनेमा में इंडिपेंडेंट फिल्म मेकिंग के मामले में एक लैंडमार्क मानी जाती है. अरविंदन ने इस फिल्म में पहले से सीखे-सिखाए एक्टर नहीं लिए. उन्होंने फिल्म के सारे किरदारों में चेंचू आदिवासियों को कास्ट किया था. आंध्रप्रदेश के नल्लामलाई जंगलों में रहने वाला ये आदिवासी समुदाय खुद को भगवन राम के वंश से जुड़ा हुआ मानता है. ये समुदाय अपनी उत्पत्ति इक्ष्वाकु के वंश से मानता है, जिस वंश में राम हुए थे. इन्हें राम चेंचू भी कहा जाता है. 

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अरविंदन ने 'कंचन सीता' के सारे किरदारों में इन्हीं लोगों को कास्ट किया. 'कंचन सीता' में सीता भले न दिखें, मगर उनके न होने को अरविंदन ने प्रकृति और लोगों के मूड के जरिए दिखाया. फिल्म के अंत में राम बहुत सारी चीजों के दुख और गिल्ट में नजर आते हैं. उन्हें लक्ष्मण से अलग होने, सीता के साथ हुए अन्याय और शम्बूक वध से अपराध बोध में चले जाते हैं. वो सबके पीछे छूट जाने से भी दुखी हैं और अंत में महाप्रस्थान करने का रास्ता चुनते हैं. यज्ञ की अग्नि लिए राम, सरयू नदी के गहराई में समाते दिखते हैं.  

'कंचन सीता' फिल्म का एक सीन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

'कंचन सीता' की कहानी, श्रीकंटन नायर के 1961 में लिखे गए मलयालम नाटक पर आधारित थी. मगर अरविंदन ने इसे अपने विजन के साथ पेश किया. अरविंदन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि राम के महाप्रस्थान की कहानी रामायण में नहीं थी, बल्कि उनका अपना इंटरप्रेटेशन था. उन्हें अपनी फिल्म का यही हिस्सा सबसे ज्यादा पसंद था. 

फिल्म को मिला था नेशनल अवार्ड 
'कंचन सीता' में आदिवासियों को कास्ट करने और रामायण की कहानी के डिफरेंट ट्रीटमेंट के लिए अरविंदन को आलोचनाएं भी खूब झेलनी पड़ीं. उन पर ईश-निंदा तक का आरोप लग गया. मगर उनके काम को तारीफें भी जमकर मिली थीं. फिल्म में उनके अपने विजन, कैमरे के यूज और रामायण को नई दृष्टि से देखने के लिए क्रिटिक्स ने उनकी बहुत तारीफ की. लेकिन अरविंदन की फिल्म पर शानदार होने की अल्टीमेट स्टैम्प बनकर आया नेशनल फिल्म अवार्ड. 'कंचन सीता' में 'एक नई सिनेमेटिक भाषा के जरिए, एक प्राचीन महाकाव्य को साहसी तरीके से एक्स्प्लोर करने' के लिए अरविंदन को 'बेस्ट डायरेक्शन' कैटेगरी में अवार्ड मिला. 

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भारत में रामायण को बड़े पर्दे पर उतारने वाली फिल्मों का इतिहास 100 साल से ज्यादा पुराना है. मगर इस अरविंदन की 'कंचन सीता' ने रामायण पर आधारित एक कहानी को एक ऐसी नजर और ऐसे अंदाज में दिखाया, जो शायद आजतक सबसे यूनीक कहा जा सकता है.

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