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'मैं कौन हूं?' करोड़पति कोरियोग्राफर के मन में उठा सवाल, स्वामी शैलेंद्र की ली शरण

कोरियोग्राफर टेरेंस लुइस का मन अशांत चल रहा है. उन्होंने ओशो के भाई स्वामी शैलेंद्र सरस्वती की शरण ली और इसका जवाब मांगने की कोशिश की. टेरेंस ने कहा कि मेरे मन में हमेशा एक सवाल चलता है कि मैं कौन हूं और मुझे क्या करना है.

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टेरेंस लुइस के मन में उठा तूफान (Photo: Screengrab)
टेरेंस लुइस के मन में उठा तूफान (Photo: Screengrab)

मशहूर कोरियोग्राफर टेरेंस लुइस अपने फील्ड के महारथी हैं. उन्हें कंटेम्परेरी डांस स्टाइल को पहचान दिलाने के लिए जाना जाता है. वो किसी महाराज से कम लैविश जिंदगी नहीं जीते हैं. उन्होंने सालों की मेहनत के बाद मुंबई में अपनी एक दुनिया बसाई है. बावजूद इसके उनके मन में कई सवाल हैं जो बवंडर मचाते रहते हैं. उन्हें खुद की मौजूदगी पर सवाल उठाने पर मजबूर करते हैं. 

क्यों परेशान हैं टेरेंस?

मन की शांति खोजते हुए हाल ही में टेरेंस ओशो के भाई स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती से मिलने पहुंचे, जहां उन्होंने अपनी फीलिंग्स बयां की. सवाल करते हुए टेरेंस ने पूछा कि मैं कौन हूं, मुझे क्या करना है. स्वामी जी ने भी कोरियोग्राफर की असमंजस की स्थिति को समझा और उनका मन शांत किया. 

टेरेंस ने कहा कि स्वामी जी मेरा बड़ा अंदरूनी सवाल है, जो मेरे अंदर हमेशा खलबली मचाता रहता है. मुझे अक्सर सोचने पर मजबूर कर देता है. इसी के साथ उन्होंने पूछा कि- अगर सबकुछ तय है और खुद ही हो रहा है, तो मेरा रोल क्या है. क्या मुझे खुद से कुछ करना चाहिए, या बस होने देना चाहिए. मैं कैसे जानूं कि यहां पर कर्म करना है, और कहां पर इसे एकदम छोड़ देना है. अगर कोई करने वाला नहीं है तो मैं कैसे समझूं कि मेरा पथ क्या है?

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स्वामी ने दिखाई राह

स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने जवाब देते हुए कहा कि ये बड़ा सवाल है कि हम कौन हैं. अक्सर हम खुद को अंदर ही खोजते हैं. स्वामी जी ने टेरेंस के मन की उथल-पुथल को समझा और सही राह दिखाई. 

उन्होंने कहा कि- जिदगी के इस गहरे और रहस्यमयी सफर में इंसान खुद से यही पूछता रह जाता है- मैं कौन हूं? बाहर से जो दिखता है, वो सिर्फ शरीर, नाम, पहचान और रिश्तों का एक मुखौटा है, लेकिन असली कहानी भीतर चल रही है. जैसे-जैसे इंसान अपने अंदर उतरता है, उसे एहसास होता है कि वो न सिर्फ तन-मन से परे है, बल्कि एक ऐसी चैतन्य शक्ति है जो सब देख रही है, पर खुद कुछ कर नहीं रही. फिर एक पल आता है जब 'मैं' भी मिट जाता है और सिर्फ एक शून्य बचता है. जहां न कोई कर्ता है, न कोई सवाल, बस घटनाएं अपने आप घट रही हैं, जैसे किसी फिल्म का सीन बिना डायरेक्टर के चलता जा रहा हो.

'इस पूरे खेल में इंसान का काम सिर्फ अपना किरदार ईमानदारी से निभाना है, बिना परिणाम की चिंता किए, क्योंकि असली कंट्रोल कभी हमारे हाथ में था ही नहीं और यही इस जिंदगी का सबसे बड़ा ट्विस्ट है.'

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