फिल्म रिव्यूः क्रेजी कुक्कड़ फैमिली
एक्टरः स्वानंद किरकिरे, शिल्पा शुक्ला, नोरा फातेही, किरण कर्माकर, कुशल पंजाबी, जुगनू इशिकी
डायरेक्टरः रितेश मेनन
ड्यूरेशनः 1 घंटा 45 मिनट
रेटिंगः 1.5 स्टार
बेरी साहब का एक बड़ा सा फॉर्म हाउस है और एक बड़ी सी फैमिली भी. फैमिली में आदर्श बीवी है और नालायक बच्चे. बड़ा बेटा पवन फर्जी स्कीम चलाकर झमेले में फंसा है. एक गुंडा-कम-नेता उसके पीछे पड़ा है. बेटी अर्चना मिस इंडिया नहीं बन पाई तो मिसेज इंडिया बनने की फेर में है. मगर उसका मिडल क्लास दब्बू और क्रॉस ड्रेस्ड हस्बैंड किसी काम का नहीं इस मिशन के लिए. तीसरे नंबर का बेटा फोटोग्राफर बनने अमेरिका गया है. मगर असिस्टेंट पर अटका हुआ है. चौथा न्यूजीलैंड में है. एक नौकर भी है और एक वकील साहब भी.
बेरी साहब एक बार फिर से कोमा में चले गए हैं. उनकी मौत की खुशखबरी को करीब आता देख सब बच्चे घर पर जुटते हैं. दिखाते हैं कि उन्हें बाप की चिंता है. मगर असल चिंता वसीयत की है. बाप के मरने के इंतजार के दौरान सब अपनी अपनी चालें चलते हैं. मगर आखिर में सबकी पोल खुल जाती है. और उसके भी आखिर में हैप्पी एंडिंग हो जाती है.
क्रेजी कुक्कड़ फैमिली की कहानी थकी हुई है और स्क्रीनप्ले में भी कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा वाला फॉर्मूला नजर आता है. स्मॉल बजट फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी कहानी और परफॉर्मेंस होती है. मगर यहां पहले खांचे में जीरो अंडा आता है. परफॉर्मेंस की बात करें तो बेटी अर्चना के रोल में शिल्पा शुक्ला ने कमाल का काम किया है. मुझे ताज्जुब होता है कि चक दे इंडिया, बीए पास जैसी कई फिल्मों में अपने को साबित कर चुकी इस एक्ट्रेस को चुनौती भरे रोल्स क्यों नहीं ऑफर हो रहे. बेटे पवन के रोल में स्वानंद किरकिरे के हिस्से सबसे ज्यादा फुटेज आया है. अब तक हम उन्हें गीतकार, संगीतकार और गायक के तौर पर जानते थे. फिल्म 'सोनाली केबल' में शराबी पिता के रोल में उन्होंने प्रभावित किया था. यहां भी वह ठीक लगे हैं. हालांकि शुरुआत में वह जमते दिख रहे थे. मगर आखिरी तक आते आते दोहराव सा आ गया. इसके अलावा अर्चना के पति दिग्विजय के रोल में निनाद कामत ने अच्छा काम किया. खास तौर पर पत्नी के परिधानों में शीशे के सामने किया गया अभिनय मजेदार और संवेदनशील, दोनों रहा. फिल्म में कई एक्टर हैं मगर इन तीनों के अलावा बाकी सब का अभिनय औसत से कम ही रहा.
डायरेक्टर रितेश मेनन ने फिल्म में कई टोटकों का सहारा लिया. 'ऊम्फ फैक्टर' के लिए एक पकोड़ा आइटम सॉन्ग डाल दिया. उसके बहाने चेरी नाम की देसी कन्या डाल दी. कहानी में ग्रीन कार्ड के लिए किराये की दुलहन से लेकर गे बेटे के पार्टनर तक तमाम चौंकाऊ एक्ट करने की कोशिश की. मगर सब बेकार रहा. फिल्म के प्रोमो देखकर काफी उम्मीद जगी थी. लगा था कि प्रकाश झा के बैनर तले एक अच्छी स्मॉल बजट कॉमेडी फिल्म देखने को मिलेगी. मगर ज्यादातर निराशा ही हाथ लगी. फिल्म के गाने भी औसत ही हैं. एक तसल्ली की बात बस यह है कि फिल्म की लेंथ बहुत ज्यादा नहीं है.
अगर आप ऐसी वैसी कैसी भी कॉमेडी फिल्म देखकर हंस सकते हैं. या फिर अपने परिवार को एकता का पाठ पढ़ाना चाहते हैं, तभी यह फिल्म देखने जाएं.