बहुत साल पहले एक फिल्म आई थी… जिसमें श्रुति ने बिट्टू से कहा था- “बिजनेस दिमाग से किया था, दिल की कैलकुलेशन की नहीं… हो गया प्यार!” लेकिन Gen Z ने शायद बैंड बाजा बारात देखी ही नहीं, इसलिए उस लाइन को समझाने के लिए 2026 में एक पूरी सीरीज बना दी गई. और सीरीज भी ऐसी कि- मां ‘क’सम, एकदम घातक!
इस सीरीज को निकोलस खरकोंगोर ने डायरेक्ट किया है. इसमें मोना सिंह, मिहिर आहूजा, सेलेस्टी बैराही, अंगीरा धर और रणवीर ब्रार जैसे कलाकार नजर आते हैं.
अब बिना घुमाए-फिराए कहानी पर आते हैं.
कहानी है 42 साल की विनीता (मोना सिंह) और उसके 19 साल के बेटे अगस्त्य (मिहिर आहूजा) की. मां-बेटे की ये जोड़ी काफी कूल है- एक-दूसरे का सहारा, एक-दूसरे की ताकत… लेकिन साथ ही एक-दूसरे पर जरूरत से ज्यादा निर्भर भी. खासकर अगस्त्य. वो खुद को ‘मैथ पगलू’ मानता है- ऐसा लड़का जिसे लगता है कि दुनिया की हर चीज गणित से चलती है. कुछ गलत हो जाए, तो समझो कैलकुलेशन गड़बड़ है. यहां तक कि उसके पिता का उसे 12 साल की उम्र में छोड़ जाना भी वो अपनी मां की 'गलत कैलकुलेशन' मानता है. यहीं से शुरू होता है उसका डार्क फेज.
18 साल का होते ही अगस्त्य तय करता है कि वो अपनी मां के लिए 'परफेक्ट पार्टनर' ढूंढेगा- अपनी बनाई इक्वेशन और एल्गोरिदम के हिसाब से. ताकि मां कभी अकेली न रहे और आगे की लाइफ में रिग्रेट न करे. और बस, यहीं से कहानी में उथल-पुथल शुरू हो जाती है. क्योंकि दिल और दिमाग की साझेदारी कभी आसान नहीं रही… और अगस्त्य को तो अपनी गणित पर अटूट भरोसा है.
अब बात करते हैं अपने पॉइंट ऑफ व्यू की.
सीधी बात- मोना सिंह और मिहिर आहूजा की मां-बेटे वाली केमिस्ट्री काफी यूनिक और दमदार है. दोनों अपनी-अपनी जगह शानदार हैं. मिहिर का ‘मैड मैथेमेटिशियन’ अवतार इतना रियल लगता है कि कई बार वो आपको परेशान करने लगता है- आपको गुस्सा आता है कि कोई अपनी ही मां को इस हद तक कंट्रोल कैसे कर सकता है. वहीं रणवीर ब्रार अपने रील्स की तरह यहां भी बेहद नेचुरल लगते हैं- सादा, सहज और प्रभावी.
लेकिन दिक्कत कहानी पर आकर अटक जाती है.
कहानी अपने मूल में सीधी है, लेकिन उसे जिस तरह से भारी-भरकम इक्वेशन और एल्गोरिदम में लपेटा गया है, वो दिमाग का दही कर देता है. कई बार लगता है कि अब क्या नोटबुक लेकर बैठना पड़ेगा. एक सिंपल इमोशनल बात को समझाने के लिए इतनी कैलकुलेशन ठूंस दी गई है कि कनेक्ट बनने की जगह दूरी बढ़ने लगती है. ऊपर से हर किरदार के पास अपना-अपना ट्रॉमा- आप एक से उबरते नहीं, दूसरा सामने खड़ा मिल जाता है.
सीरीज का पेस भी परेशानी बढ़ाता है, जो बात पहले एपिसोड में समझ आ जाती है, उसे साबित करने के लिए 8 एपिसोड तक खींचा जाता है. बीच में ऐसे कोई दमदार ट्विस्ट नहीं हैं जो आपको बांधे रखें और धीरे-धीरे आप ऊबने लगते हैं.
असल में, जो चीज इस शो की सबसे बड़ी ताकत बन सकती थी- वही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है. गणित यहां एक टूल होना चाहिए था, लेकिन इसे पूरी कहानी का आधार बना दिया गया. नतीजा- एक इमोशनल ड्रामा 'इंफॉर्मेशन ओवरलोड' में बदल जाता है. बार-बार कठिन शब्द और समीकरण दर्शकों को कहानी से जोड़ने के बजाय उनसे दूर कर देते हैं.
सीरीज कुछ गंभीर मुद्दों को छूती जरूर है- जैसे कॉन्ट्रासेप्टिव पिल, मेंटल हेल्थ, और बिना प्रोटेक्शन इंटिमेसी, लेकिन उन्हें गहराई से एक्सप्लोर करने के बजाय सिर्फ टिक-मार्क की तरह इस्तेमाल किया गया है. सबसे ज्यादा खटकती है अगस्त्य की सोच. मां की जिंदगी को 'ऑप्टिमाइज' करने की उसकी कोशिश कहीं न कहीं प्यार से ज्यादा कंट्रोल और पैट्रियार्की की झलक देती है. देखते-देखते कोफ्त होने लगती है कि बस करो भाई- भारत में बच्चों को इतनी छूट कहां मिलती है.
तो कुल मिलाकर… अगर आप फिर भी ये सीरीज देखना चाहते हैं, तो मां ‘क’सम-अपनी जिम्मेदारी पर देखिएगा.