scorecardresearch
 

Laal Singh Chaddha Review: प्यार, इमोशंस, शीशे जैसा दिल... 'कम अक्ल नहीं' एक असाधारण जीनियस की दास्तां है लाल सिंह चड्ढा!

Laal Singh Chaddha Review: लाल सिंह चड्ढा एक ऐसा कैरेक्टर है जिस पर प्यार आता है. इस जमाने में ऐसा शख्स जिसमें कोई छल नहीं है. जैसा बाहर है वैसा ही अंदर, एकदम निर्मल, एकदम कोमल, सहजता इतनी कि लगता है गप हांक रहा है, इतने साधारण आदमी ने इतने असाधारण काम कैसे किए होंगे. लेकिन झूठ और फरेब उसकी फितरत में नहीं है जो भी है वो 100 आना सच्चा.

X
आमिर खान आमिर खान
फिल्म:लाल सिंह चड्ढा
/5
  • कलाकार : आमिर खान, करीना कपूर, मोना सिंह, नागा चैतन्य
  • निर्देशक :अद्वैत चंदन

'जिंदगी गोलगप्पे की तरह है, पेट भर जाता है लेकिन मन नहीं भरता' मां कहती थी 'देश में मलेरिया फैला है, एक हफ्ते बाहर मत निकलना लाल' और लाल के लिए यह बातें लकीर बन जाती हैं. 'रूपा बड़ी सोणी कुड़ी थी जी' 'रूपा तू मुझसे ब्याह करेगी' बचपन के प्यार के साथ जवां होने का अलग मजा है लेकिन दर्द भी अलग है. लाल रूपा को चाहता है, टूटकर चाहता है लेकिन उसकी राह का रोड़ा नहीं बनता. रूपा को ऊंची उड़ान चाहिए, पैसा चाहिए, नाम चाहिए, वह उसकी कीमत चुकाने को भी तैयार है लेकिन वह लाल को अपने प्यार के काबिल नहीं समझती. उसे भरोसे का दोस्त चाहिए लेकिन प्रेमी अपने से बराबर या ऊपर वाला, पैसे वाला. लाल तो स्पेशल है, कम अक्ल है, 'खोता' है. चीजों को देर से समझता है. भावनाएं हैं लेकिन व्यक्त नहीं कर पाता. उसकी जिंदगी एक लकीर पर चलती है. उसके जीवन में मां और रूपा बड़ी अहमियत रखते हैं. मां ने मरते दम तक संभाला और रूपा ने स्कूल के पहले दिन जो तवज्जो दी वह जिंदगी भर के लिए खास हो गई.  

लाल सिंह चड्ढा एक ऐसा कैरेक्टर है जिस पर प्यार आता है. इस जमाने में ऐसा शख्स जिसमें कोई छल छद्म नहीं है. जैसा बाहर है वैसा ही अंदर, एकदम निर्मल, एकदम कोमल, सहजता इतनी कि लगता है गप हांक रहा है, इतने साधारण आदमी ने इतने असाधारण काम कैसे किए होंगे. लेकिन झूठ और फरेब उसकी फितरत में नहीं है जो भी है वो 100 आना सच्चा.

चलती ट्रेन के साथ शुरू होता है लाल का सफर 

फिल्म की कहानी ट्रेन  एक बोगी से शुरू होती है. लाल सिंह चड्ढा पठानकोट से चढ़ता है और शुरू होता है कहानियों का दौर. पहले लोग समझते हैं कोई पगला है. फिर एक असामान्य, कम अक्ल इंसान और आखिर में वह असाधारण हो जाता है. चंडीगढ़ में उतरते-उतरते जैसे बोगी उसकी हो जाती है वैसे ही दर्शक. जिंदगी में वह ऐसे-ऐसे काम कर जाता है जो एक 'जीनियस' ही कर सकता है. ट्रेन के साथ ही कहानी आगे बढ़ती रहती है. देश पर गहरे असर डालने वाली घटनाओं का जिक्र होता रहता है. विजुअल दिखाए जाते हैं. लेकिन उस पर कोई टिप्पणी नहीं होती.

फिल्म की शुरुआत में परिंदे का पंख उड़ता हुआ जिंदगी के फलसफे दिखा जाता है. इंसान भी उसी तरह है परिस्थितियों पर उसका कोई खास बस नहीं. हवा के थपेड़ों से जैसे पंख अपना रास्ता बदलते-बदलते लाल सिंह चड्ढा के पास मुकाम पाता है वैसे ही लाल सिंह का जीवन है. उसका अपना जीवन तो रेल की पटरी की तरह है, एकदम सीधा, मोड़ वहीं आते हैं जहां बहुत जरुरी होता है. वह एकदम सीधा चलने वाला इंसान है. लेकिन मां का कहा ब्रह्मरेख बन जाता है.

लाल दूसरे बच्चों से अलग है लेकिन मां को लगता है कि उसका बच्चा वो सब कर सकता है. जो दूसरे कर सकते हैं, हां बस इसके लिए मेहनत थोड़ी ज्यादा करनी होगी. यह दिव्यांगों के लिए ही नहीं उनके पैरंट्स के लिए भी संदेश है. मां लाल का एडमिशन बड़ी मुश्किल से सामान्य बच्चों वाले स्कूल में कराने में सफल होती है. लाल को चलने में दिक्कत है, दूसरे बच्चों के लिए हंसी का पात्र बनता है लेकिन पहला सहारा मिलता है रूपा का. और वहीं से वह लाल को सोणी लगने लगती है. दोनों साथ घूमते, सहारे से चलने वाला लाल रूपा के कहने पर ऐसी दौड़ लगाता है कि फिर रुकता ही नहीं. मां के बाद रूपा ही सबकुछ है लेकिन रूपा के लिए वह केवल कुछ ही बना रहता है.

मां बच्चे के दिल को जानती है, वह दुनिया के झंझावातों से अलग रखना चाहती है. जब भी कुछ बड़ा, अप्रत्याशित घटित होता है वह लाल को समझा देती है. 'लाल एक हफ्ते बाहर मत निकलना, बाहर मलेरिया फैला हुआ है' और क्या मजाल कि लाल बाहर निकल जाए. मलेरिया का रूपक भी बेहतरीन है. मलेरिया में तेज बुखार होता है. फिर एकाएक गिर जाता है. फिर रुक-रुक कर बुखार आता है. मलेरिया एक शख्स से दूसरे में फैल नहीं सकता जब तक मच्छर न हों. मलेरिया ठीक भी हो जाए तो कमजोरी बनी रहती है. महीनों तक, वर्षों तक, अगर किसी को कई बार मलेरिया हो जाए तो जीवन मुश्किल हो जाता है.

ठीक ऐसा ही हाल दंगों का होता है. घटनाएं तेजी से घटती हैं लेकिन आगे तब तक नहीं बढ़तीं जबतक कोई माध्यम नहीं बनता. पहले इनकी तीव्रता ज्यादा होती है. चार-पांच दिनों तक हालात बेकाबू होते हैं. फिर रुक-रुककर बवाल होता है. और आखिर में जहां घटती हैं वहां के लोगों के जीवन को वर्षों के लिए पीछे कर देती हैं. दंगे तो शांत हो जाते हैं लेकिन असर बना रहता है. लाल का जीवन इसलिए चलता रहता है कि वह इन घटनाओं की तीव्रता से बेखबर है. मां का आंचल उसे मौत के मुंह से खींच लाया है.

फिल्म में दिखी है ऐतिहासिक घटनाएं

फिल्म में मलेरिया का जिक्र कई बार है. ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, दिल्ली में सिखों के खिलाफ फैले दंगे, आडवाणी की रथयात्रा, मुंबई बम विस्फोट, बाबरी विध्वंस... अन्ना आंदोलन से लेकर मोदी के पोस्टर तक. लेकिन इस पर कोई टिप्पणी नहीं है. यह फिल्म 'फॉरेस्ट गंप' की कॉपी है लेकिन प्यार का पुट इसे अलग कर देता है.

ट्रेन के पहिए की तरह समय का पहिया चलता रहता है, रूपा और लाल दिल्ली पहुंचते हैं. रूपा का लक्ष्य साफ है लेकिन लाल को पता नहीं कि उसे क्या करना है. बस वह दौड़ में शामिल हो जाता है, नेशनल लेवल का प्लेयर बन जाता है. फाइनल मुकाबले में इसलिए भाग नहीं लेता कि मां ने बताया है कि 'देश में मलेरिया फैला, एक हफ्ते बाहर मत निकलना लाल'.

मां के कहने पर लाल सेना में भर्ती हो जाता है, रूपा अपने सपने पूरे करने मुंबई निकल जाती है. स्कूल की पहली क्लास में रूपा सीट ऑफर कर लाल की खास हो गई थी. यहां बाला (नागा चैतन्य) ने साथ बैठाकर लाल को अपना बना लिया. बाला को चड्ढी बनियान का बिजनेस करना है. हुनरबाज लाल में उसे जोड़ी दिखाई देने लगती है.

लेकिन तभी करगिल का युद्ध छिड़ जाता है. बाला शहीद हो जाता है. लाल रूपा के कहने पर जिंदगी में दो बार भागा था. इस बार बाला के कहने पर चोटी से भागता है, बाद में उसे पता चलता है कि वह तो बहुत आगे निकल आता है. लाल को मारना अच्छा नहीं लगता, बाला की खोज में वह 5 साथियों को बचाता है. जिसमें एक घायल पाकिस्तानी मोहम्मद भी है. लाल को समझ भले ही न हो लेकिन संदेश साफ है कि लाल का राष्ट्रवाद इसमें यकीन नहीं रखता कि किसी को केवल इसलिए मार दिया जाए कि वह गलती से उस पार या इस पार पैदा हुआ.

लाल की जिंदगी में मां स्थायी तत्व है लेकिन रूपा मिलती बिछड़ती रहती है. उसे अपने तरीके से जिंदगी जीनी है. बड़ा बनना है नाम और पैसा कमाना है. लाल उसे कई बार कहता है कि 'रूपा मुझसे ब्याह करेगी' लेकिन रूपा को लगता है कि इसे तो ब्याह का मतलब भी पता नहीं होगा. दोनों एकदूसरे को याद रखते हैं, दोनों एकदूसरे को संबल देते हैं लेकिन मां के जाने के बाद जब रूपा भी लाल की जिंदगी से खो जाती है तो वह भागने लगता है, दौड़ने लगता है. अनायास, निरुद्देश्य, पहाड़ उसे रोक लेते हैं. समुद्र उसे रास्ता बदलने को मजबूर कर देते हैं. यह प्यार में पागल होने जैसा है लेकिन वह चुप है, वह भाग रहा है अपने आप से समाज से. कोई तड़प है जो उसे रुकने नहीं देती लेकिन आम फिल्मों की चित्कार इसमें नहीं है.

वैसे भी बचपन के प्यार के साथ जवां होने के बाद प्यार को मुकाम न मिल पाए तो उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. दिल जार-जार रोता है लेकिन आंसू नहीं गिरते. मर जाने का मन करता है लेकिन 'उसके' बदनाम होने के डर से कदम आगे नहीं बढ़ पाते. लाल भागते भागते थक जाता है. चार साल सात महीने की दौड़ के बाद वह वापस घर लौट आता है. उसकी तमन्ना पूरी होती है लेकिन बड़ी जिम्मेदारी देकर रूपा तारों में विलीन हो जाती है.

'मां कहती थी जिंदगी गोलगप्पे की तरह होती है. पेट भर जाता है लेकिन मन नहीं भरता'. लाल की तरह आम लोगों की जिंदगी भी कुछ ऐसी ही होती है. गोलगप्पे का पानी जीवन रस की तरह है, मिलाने पर स्वाद, न मिलाने पर बेकार और ज्यादा देर तक मिला रहे तो बेमतलब.

शानदार है आमिर की अदाकारी, मोना सिंह ने डाल दी जान  

आमिर खान ने शानदार काम किया है लेकिन किरदार में देखते ही पीके की याद आ जाती है. ऐसा कहा जाता था कि आमिर दोहराव नहीं करते लेकिन इस फिल्म को देखकर ऐसा लगता है कि अब अपना सर्वश्रेष्ठ दे चुके हैं. मोना सिंह ने लाल की मां के रोल में जान डाल दी है. उनके समझाने, बताने का तरीका अलग छाप छोड़ता है. करीना को जितना करने को मिला उसमें उन्होंने ठीक ठाक काम किया है लेकिन बचपन की रूपा यंग रूपा पर भारी पड़ी है. मोहम्मद पाजी (मानव विज) ने संवाद के साथ आंखों से भी काम लिया है. जितनी देर रहे छाए रहे हैं.

फिल्म की सबसे बड़ी खामी 

फिल्म की सबसे बड़ी कमी है इसकी रफ्तार, किस्सागो वाला दौर शायद अब नहीं रहा. थोड़ी देर तो यह ठीक लगता है लेकिन बाद में समझ में नहीं आता कि यह फिल्म है या डॉक्युमेंट्री. दूसरा कारण यह भी है कि ट्रेन से उतरने के बाद फिल्म और स्लो हो जाती है. मोनोलॉग में उतर जाती है. थियेटर में कई लोग इस दौरान निकलते दिख जाएंगे.

फिल्म की कुछ बातें हजम नहीं होतीं. जैसे क्या कम अक्ल इंसान की सेना में भर्ती हो सकती है? क्या कोई पाकिस्तानी सैनिक या आतंकी को घायल अवस्था में उठाकर ला सकता है और सेना को उसका पता भी न चल पाए? दोनों टांगे कटी होने के बावजूद वह भाग जाए और सेना को खबर न हो. बाद में वह लाल का पार्टनर हो जाए फिर पाकिस्तान चला जाए? रूपा अंडरबियर-बनियान का एंपायर खड़ा हो जाए, बाद में उसका जिक्र ही न हो? ऐसा लगता है कि बहुत कुछ दिखाने के चक्कर में फिल्मकार समेटना भूल गए.

कई जगह फिट नहीं होते घटनाक्रम 

कपड़े तो काट दिए लेकिन न ठीक से सिलाई हो पाई न तुड़पाई. विस्तार तो दिया लेकिन गहराई नहीं दे पाए, पाकिस्तान के खिलाफ नफरत नहीं फैलाई लेकिन जो घटनाक्रम चुने उसके साथ न्याय नहीं हो पाया. अबू सलेम और मोनिका बेदी तक को फिट कर दिया लेकिन उसका कोई असर नहीं छोड़ पाए. फिर भी परिवार के साथ एक बार देखने लायक फिल्म आमिर खान ने बना दी है. हां बच्चों को साथ ले जाना थोड़ा मुश्किल कर देगा, नई पीढ़ी के बच्चे शायद ही लाल से कनेक्ट कर पाएं. 

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें