फिल्म का नाम: मैं और चार्ल्स
डायरेक्टर: प्रवाल रमन
स्टार कास्ट: रणदीप हुड्डा, ऋचा चड्ढा, आदिल हुसैन
अवधि: 123 मिनट
सर्टिफिकेट:A
रेटिंग: 2.5 स्टार
डायरेक्टर प्रवाल रमन और अभिनेता रणदीप हुड्डा के बीच एक कॉमन फैक्टर 'रामगोपाल वर्मा' हैं. प्रवाल और रणदीप एक साथ रामगोपाल वर्मा के अंतर्गत काम किया करते थे. फिर बाद में प्रवाल ने 'डरना मना है' 'डरना जरूरी है' और '404' जैसी फिल्में बनाईं. अब कुख्यात अपराधी 'चार्ल्स शोभराज' के जीवन के हिस्सों पर आधारित फिल्म 'मैं और चार्ल्स' बनाई है. यह फिल्म 80 के दशक में पुलिस कमिश्नर रहे अमोद कांत के द्वारा सुनाई गई जिसे पर्दे पर प्रवाल ने उतारा है. प्रवाल ने अमोद कांत की समाजसेवी संस्था 'प्रयास' के लिए कई प्रोमोशनल वीडियो भी बनाए हैं. अब क्या यह फिल्म दर्शकों का मनोरंजन कर पाने में सफल रहेगी? आइये फिल्म की समीक्षा करते हैं.
कहानी
यह कहानी है 80 के दशक के 'बिकिनी किलर' कहे जाने वाले 'चार्ल्स (रणदीप हुड्डा) की, जो लोगों को ठगता है और लड़कियों का कत्ल भी करता है. भारत की मशहूर जेलों में से एक 'तिहाड़ जेल' से भी वो पुलिसवालों को धोखा देकर भाग जाने में सफल हुआ और आखिर में पकड़ा जाता है. पुलिस कमिश्नर अमोद कांत (आदिल हुसैन) और चार्ल्स के बीच चोर पुलिस वाला माजरा चलता रहता है. साथ ही कभी मीरा (ऋचा चड्ढा) तो कभी अन्य कलाकार भी चार्ल्स की यात्रा के चश्मदीद बनते हैं.
स्क्रिप्ट
फिल्म की कहानी असल जिंदगी के आधार पर होने के साथ-साथ थोड़ी काल्पनिक बनाने की कोशिश भी की गई है. जिससे दर्शकों तक फ्लेवर सही जाए. प्रवाल ने अमोद कांत से सुनी कहानी को स्क्रिप्ट का रूप देकर ठीक ठाक फिल्म बनाई है. फिल्म का स्क्रीनप्ले काफी ढीला है जिसे और भी क्रिस्प किया जा सकता था. ट्रेलर को देखकर लगता था कि फिल्म के संवाद और उम्दा होंगे लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और डायलॉग फीके से रह गए. कॉन्सेप्ट के लिहाज से फिल्म और भी बेहतर बनाई जा सकती थी. काफी धीमी फिल्म है लेकिन शूटिंग लोकेशंस जैसे थाईलैंड, गोवा और दिल्ली को अच्छे अंदाज में प्रवाल ने दिखाया है.
अभिनय
अभिनेता रणदीप हुड्डा की एक्टिंग के साथ-साथ बोलने के तरीके की दाद देनी होगी. जिस तरह से उन्होंने चार्ल्स की सबसे बड़ी आदत लोगों से घुल मिलकर उनके जैसा हो जाने को पर्दे पर निभाया है. साथ ही आदिल हुसैन का किरदार भी काफी सहज है. जिसे देखकर लगता है कि चार्ल्स के साथ मुकाबला बराबर का है. ऋचा चड्ढा, टिस्का चोपड़ा और बाकी कलाकारों ने सराहनीय काम किया है.
संगीत
फिल्म का संगीत 60 -70 के दशक के हिसाब से रखा गया है लेकिन 'जब छाए मेरा जादू' गीत सबसे बेहतर है.
कमजोर कड़ी
फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी गति और स्क्रिप्ट है, जो कि और भी ज्यादा क्रिस्प हो सकती थी. इसकी वजह से अच्छे कलाकार होने के बावजूद फिल्म उम्दा नहीं हो सकी है.
क्यों देखें
रणदीप हुड्डा के दीवाने हैं तो यह फिल्म जरूर देखें.