भारत में मैरिटल रेप जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई कानूनू नहीं है. इस मामले में अक्सर कोर्ट की तरफ से बंटा हुआ फैसला ही आया है. भारतीय कानून (IPC की धारा 375) में एक एक्सेप्शन है, जिसके तहत अगर पत्नी की उम्र 18 साल से ज्यादा है, तो पति का जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाना 'रेप' की कैटेगरी में नहीं आता. हाल ही में जियो हॉटस्टार पर आई 'चिरैया' सीरीज भी इसी मुद्दे पर बात करती है. ये कोई हल्की-फुल्की एंटरटेनमेंट वाली सीरीज नहीं है. ये वो कहानी है जो आपको सोचने पर मजबूर करती है, थोड़ा असहज भी करती है, लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.
चिरैया की कहानी:
कहानी लखनऊ के एक पारंपरिक परिवार से शुरू होती है, जहां कमलेश (दिव्या दत्ता) एक आदर्श बहू की तरह अपनी जिंदगी जी रही होती है. उसकी सोच किचन से लेकर अखबार के आखिरी पन्ने तक सीमित है- जहां रसोई से जुड़ी जानकारी ही दी जाती है. पति थोड़ा दब्बू है लेकिन सपोर्टिव है. कमलेश को एक बेटी है लेकिन बेटा न पैदा कर पाने का अफसोस है, जिसे वो लाडले देवर अरुण (सिद्धार्थ शॉ) को पाल-पोसकर पूरा करती है. सास सामान्य है लेकिन ससुर (संजय मिश्रा) शेर की खाल में छुपा भेड़िया है- जो ज्ञान तो महिला सर्वोपरि का देता है, लेकिन जब बात खुद के बेटे और सम्मान पर आती है तो सारी बातें किताबी हो जाती हैं.
परिवार में ऊपर से तो सब कुछ ठीक-ठाक लगता है, लेकिन जैसे ही कमलेश को अपनी देवरानी पूजा (प्रसन्ना बिष्ट) के साथ हो रही जबरदस्ती के रिश्ते का सच पता चलता है, कहानी एकदम से गंभीर मोड़ ले लेती है.
सीरीज बहुत सीधे तरीके से उस मुद्दे को उठाती है, जिसके बारे में हमारे समाज में आज भी खुलकर बात नहीं होती. शादी के अंदर सहमति की अहमियत. चिरैया- ये सवाल पूछती है कि क्या शादी का मतलब हर बार ‘हां’ होता है? और यही सवाल आपको अंदर तक झकझोर देता है. लाडला देवर जिसके लिए कमलेश दुनिया से लड़ जाती है अब उसके खिलाफ खड़ी है. लेकिन हृदय परिवर्तन अचानक नहीं हुआ है, उसे वक्त लगा है ये समझने में कि पत्नी पति की प्रॉपर्टी नहीं है. मांग में सिंदूर भरके पति ने उसे खरीदा नहीं है. वो अंदर तक हिल जाती है जब उसे पता चलता है कि देवरानी ने उसके बेटे जैसे अरुण से खुद को बचाने के लिए खौफनाक कदम उठाया है. और हां, ये कदम सुसाइड नहीं है, जानने के लिए सीरीज देखनी जरूरी है.
यकीन मानिए ये सीन आपको भी अंदर तक झकझोर देगा. मैं मानती हूं कि, ये सीन हमारी कानून व्यवस्था से जुड़े प्रतिष्ठित लोगों को भी देखना चाहिए, ताकि शायद एहसास हो सके कि मैरिटल रेप महज पति-पत्नी के बीच की बात नहीं बल्कि कितना संगीन जुर्म है.
बिना शोर के गूंजती आवाज
अब बात करते हैं अदाकारी की, दिव्या दत्ता ने कमलेश के रोल में कमाल का काम किया है. उनकी परफॉर्मेंस बहुत सधी हुई है- ना ज्यादा ड्रामा, ना ओवरएक्टिंग, बस सच्चाई. जिसकी उनसे उम्मीद भी की जाती है. वहीं संजय मिश्रा हमेशा की तरह अपने किरदार में गहराई लेकर आते हैं. इनके अलावा जो अहम किरदार हैं- जैसे प्रसन्ना बिष्ट, सिद्धार्थ शॉ, फैसल राशिद, टीनू आनंद, सरीता जोशी, अंजुम सक्सेना- सभी ने सीरीज को बांधे रखने में पूरी सहयोग दिया है. डायरेक्टर शशांत शाह ने कहानी को बहुत रियल तरीके से पेश किया है. कहीं भी ये सीरीज उपदेश देने वाली नहीं लगती, बल्कि धीरे-धीरे आपको अपनी दुनिया में खींच लेती है. बेहतरीन बात ये है कि सीरीज में खामखा का कोर्टरूम ड्रामा भी नहीं डाला गया है. ना ही पास-पड़ोस में होने वाली जलालत में फंसाया गया है.
सीरीज दमदार है और जरूरी मुद्दे को उठाती है, एक बार भी अपने सब्जेक्ट से भटकती नहीं दिखती है. बीच-बीच में ये छोटे-छोटे मुद्दे भी उठाती है- जैसे क्यों इंसाफ पाने के लिए लोग गलत रास्ते का चुनाव कर बैठते हैं. शानदार एक्टिंग, रियलिस्टिक ट्रीटमेंट है, बस इसका अंत थोड़ा और जोरदार हो सकता था. जो थोड़ा कमजोर लगता है वो- कुछ जगहों पर कहानी का धीमा लगना. ये साफ समझ आता है कि सीरीज हर किसी के लिए ‘एंटरटेनिंग’ नहीं है. और ना ही इस उद्देश्य से बनाई गई है. ये तो बस मैरिटल रेप पर ना बने हुए कानून को चैलेंज करना चाहती है.
चिरैया सिर्फ एक सीरीज नहीं, बल्कि एक जरूरी सवाल है- जो सिस्टम से भी है और समाज से भी. अगर आप ऐसी कहानियां देखना चाहते हैं जो दिल-दिमाग दोनों पर असर छोड़ें, तो ये सीरीज आपको मिस नहीं करनी चाहिए.