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बॉलीवुड की एक 'सिमरन' है जो पिछले 40 साल से, जिंदगी जीने की आजादी मिलते ही वापस पति के पास लौट आती है

फिल्मों की प्रेम कहानियों से लोग रियल लाइफ में प्यार करना, प्यार को महसूस करना और जिंदगी जीना सीखते हैं. कई बार फिल्मी प्रेम कहानियों की नियति ऐसी होती है, जो रियल लाइफ में न ही तो अच्छी है. खासकर बॉलीवुड का एक लव स्टोरी एंगल तो ऐसा है जो 40 साल में नहीं बदल पाया!

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पद्मिनी कोल्हापुरे, ऐश्वर्या राय और तापसी पन्नू
पद्मिनी कोल्हापुरे, ऐश्वर्या राय और तापसी पन्नू

देव आनंद की फिल्म 'प्रेम पुजारी' के गाने आज भी यादगार हैं. गोपालदास नीरज ने फिल्म के लिए एक गाने में लिखा- 'शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब... होगा यूं नशा जो तैयार, वो प्यार है!' प्यार, प्रेम, इश्क, मुहब्बत पर हिंदी फिल्मों में थोक के भाव गाने लिखे गए हैं. मगर 'प्रेम पुजारी' के इस गाने जितना प्यार का सटीक केमिकल फॉर्मूला शायद ही कहीं और बताया गया हो. मगर फूलों के शबाब में घुली शराब अगर प्यार का सुरूर देने की बजाय, कोई हैंगओवर दे जाए तो? दिल की धड़कन बढ़ा देने वाली फिल्मी कहानियां कभी कभी ऐसा भी कर जाती हैं.

'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' को बॉलीवुड की सबसे आइकॉनिक रोमांटिक फिल्मों में हमेशा बहुत ऊपर गिना जाता है. फिल्म के क्लाइमेक्स में जब सिमरन (काजोल) के पिता ने, उसे राज (शाहरुख खान) के साथ 'जिंदगी जीने की' इजाजत दी, तो इंडियन सिनेमा का एक यादगार मोमेंट बन गया. 'जा सिमरन... जा, जी ले अपनी जिंदगी' डायलॉग बोलते हुए लेजेंड एक्टर अमरीश पुरी की आंखें और एक्सप्रेशन आज भी कितने दर्शकों के जहन में एकदम ताजा होंगे. इस सीन में ट्रेन के गेट पर शाहरुख और काजोल को साथ देखने के बाद से कितने ही 'राज' इस कल्पना में जीने लगे होंगे कि काश उनकी प्रेमिका का पिता, क्लाइमेक्स के बाद वाला अमरीश पुरी निकले. कितनी ही 'सिमरन' ये ख़्वाब देखती रही होंगी कि काश उनके 'बाऊ जी' उन्हें एक बार ने 'जी ले अपनी जिंदगी' की इजाजत दे दें. 

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दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

मगर बड़े पर्दे के बाहर, असल जिंदगी में कितनी ही बार ये हुआ होगा कि लड़कियों के पिता 'चौधरी बलदेव सिंह' ही बने रह गए. कितनी ही बार 'राज' को किनारे कर, सिमरन का ब्याह किसी 'कुलजीत' (न समझ आए तो फिर से DDLJ देख लें!) के साथ हो गया होगा. मगर फिल्मों के बाहर की इस क्रूर हकीकत ने फिल्में लिखने वालों को एक नया आईडिया दिया. क्या हो अगर अधूरी प्रेम कहानी की धार से घायल लड़की को, उसका पति वापस प्रेमी के पास जाने का मौका दे? सोचने में ये विचार कितना खूबसूरत लगता है न! शायद यही वजह है कि 40 सालों के अंदर इस आईडिया पर कम से कम 3 बहुत चर्चित फिल्में बनीं. लेकिन इन तीनों फिल्मों में एक बहुत तगड़ी विडंबना भी खुद को दोहराती चली गई. 

40 साल पहले 'वो 7 दिन' 
घरवालों के दबाव में शादी करने वाली लड़की, उसके पति और उसके पूर्व प्रेमी का लव ट्रायंगल जिन फिल्मों में यादगार बन गया, उनमें से एक है 'वो 7 दिन'. ऑलमोस्ट 40 साल पहले, जून 1983 में रिलीज हुई इस फिल्म में पद्मिनी कोल्हापुरे, अनिल कपूर और नसीरुद्दीन शाह मुख्य किरदार निभा रहे थे. अनिल कपूर का हिंदी में ये पहला लीड रोल भी था और 'वो 7 दिन' तमिल फिल्म 'Andha 7 Naatkal' का हिंदी रीमेक थी. शॉर्ट में कहानी यूं है कि माया (पद्मिनी) को अपने किराएदार, गायक प्रेम प्रताप सिंह 'पटियाला वाले' (अनिल) से प्यार हो जाता है. माया के घरवाले इस इश्क की बू पकड़ लेते हैं और प्रेम को घर से दफा कर के, उसकी शादी डॉक्टर आनंद (नसीरुद्दीन) से करवा देते हैं. 

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वो 7 दिन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

आनंद की पत्नी का देहांत हो चुका है और पहली शादी से उसकी छोटी सी बच्ची है. जबकि आनंद की मां बीमार है और उन्हीं की इच्छा पूरी करने के लिए ये शादी हुई है. जब आनंद को अपनी पत्नी की अधूरी लव स्टोरी पता लगती है तो वो इन बिछड़े प्रेमियों को मिलाने का पुण्य कार्य करने का फैसला करते हैं. लेकिन कहानी में ट्विस्ट ये है कि तबतक माया को 'शादी के बंधन का महत्त्व' अपील करने लगता है और उसे आनंद की बच्ची से भी मोह होने लगता है. वो अंत में डॉक्टर आनंद के साथ ही रहने का मूड बना लेती है और प्रेम भी इस बंधन को तोड़कर "पाप" का भागी बनने से इनकार कर देता है. 

जिस दौर में 'वो 7 दिन' बनी, उस समय शायद कहानी में शादी को चैलेंज करने का आईडिया डायरेक्टर को इतना न जमा हो. इसलिए अंत में माया और आनंद साथ रह जाते हैं, जबकि माया का पूर्व प्रेमी अपने रास्ते हो लेता है. इस थ्योरी को 10-15 साल बाद कहानी में किसी दूसरी फिल्म में चैलेंज किया जा सकता था. लेकिन क्या ऐसा हुआ?

पति को फिर से 'हम दिल दे चुके सनम' 
'वो 7 दिन' के ठीक 16 साल बाद, जून 1999 में संजय लीला भंसाली की 'हम दिल दे चुके सनम' रिलीज हुई. सलमान खान, ऐश्वर्या राय और अजय देवगन स्टारर फिल्म को बॉलीवुड की सबसे आइकॉनिक लव स्टोरीज में गिना जाता है. एक से बढ़कर एक बेहतरीन गानों और शानदार सेट्स पर फिल्माई गई इस फिल्म को एकदम बेसिक पैमाने पर देखें, तो यहां भी 'वो 7 दिन' जैसा ही लव ट्रायंगल था. 

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हम दिल दे चुके सनम

समीर (सलमान) नंदिनी (ऐश्वर्या) के पिता से भारतीय क्लासिकल संगीत सीखने उनके घर आता है. दोनों में रोमांस शुरू होता है और इनकी कहानी का स्पीड ब्रेकर बनती है परिवार की ट्रेडिशनल सोच. समीर घर से निकाला जाता है और नंदिनी की शादी वनराज (अजय) से हो जाती है. क्लाइमेक्स में फिर वही होता है. वनराज जब दोनों बिछड़े प्रेमियों को मिलवाने निकलता है, तो अंत में नंदिनी लौटकर उसी के पास आ जाती है. फाइनल मोमेंट में वनराज फिर से नंदिनी के गले में मंगलसूत्र पहनाता है. कहानी उसे सांचे में सिमटती है जो 'वो 7 दिन' में बना था. 

उसी बाउंड्री में बंधी 'मनमर्जियां' 
'हम दिल दे चुके सनम' और अनुराग कश्यप की 'मनमर्जियां' (सितंबर 2018) में ऑलमोस्ट दो दशक का फासला माना जा सकता है. तापसी पन्नू, विक्की कौशल और अभिषेक बच्चन स्टारर फिल्म को लव ट्रायंगल के उसी सेट फ्रेम की एक रीटेलिंग माना जा सकता है. यानी कहानी वैसी ही, कहने का तरीका नया. अनुराग ने प्यार की इमोशनल साइड में फिजिकल एंगल को भी खूब अच्छे से लिया. विक्की (विक्की कौशल) और रूमी (तापसी) की इंटिमेसी को 'मनमर्जियां' के प्लॉट ने अच्छे से यूज किया. मगर ये लव स्टोरी अधूरी रही और रूमी की शादी हुई रॉबी (अभिषेक) से. 

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मनमर्जियां

यहां कहानी में एक ट्विस्ट ये था कि रॉबी खुले तौर पर रूमी को विक्की से मिलवाने की कोशिश नहीं करता. पिछली दोनों फिल्मों से उलट, यहां लड़की का पति थोड़ा ज्यादा पजेसिव था. बात यहां तक आ जाती है कि जब रॉबी शादी के बाद रूमी को विक्की के साथ इंटिमेट होते देखता है तो गुस्से में आ जाता है और डिवोर्स दे देता है.

मगर कोर्ट में डिवोर्स पेपर पर फाइनल साइन करने के बाद रॉबी और रूमी साथ में वॉक करते हुए एक दूसरे से अपनी जिन्दगी की वो डिटेल्स शेयर करते दिखते हैं, जो उन्होंने पहले नहीं बताई. और अंत में रूमी के मन में रॉबी के लिए प्यार आपको नजर आने लगता है. फाइनल सीन में वो भागकर, टेक्निकली अपने पूर्व पति हो चुके रॉबी के गले लग जाती है और कहानी का एंड इशारा करता है कि दोनों एक दूसरे के साथ नई शुरुआत करने जा रहे हैं. 

प्रेमी के पास ही वापस क्यों लौटे ये 'सिमरन'?
'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में जब सिमरन को अपनी जिंदगी जीने निकली तो उसमें सबसे बड़ी खूबसूरती लड़की की आजादी थी. हमारे समाज में आज भी आसपास आपको देखने को मिल जाएगा कि लड़कियों को मन का करने की आजादी मिलना किसी अद्भुत सपने जैसी चीज है. ऊपर जिन 3 फिल्मों की हमने बात की उनमें भी माया, नंदिनी और रूमी ने चोरी छुपे अपने प्रेम का संसार तैयार किया था. 

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माया और नंदिनी के पास मन का करना तो दूर की बात, मन का सोचने की आजादी नहीं थी. रूमी के पास सबसे बड़ी आजादी उसकी इच्छाशक्ति थी और वो अपने मन का कर सकती थी. मगर कहानी में उसका मन भी उसी बने-बनाए खांचे में जा कर बैठ गया. ऐसा नहीं है कि पतियों से प्रेम हो जाना कोई दुराग्रह भरा विचार है. मगर 40 साल में तीन बेहद चर्चित फिल्मों में इस विचार का एक नियम बन जाना, एक दिक्कत है. देश की आजादी की उम्र इस साल 76 हो जाएगी. और इसके आधे से भी ज्यादा, 40 सालों में, पति-प्रेमी के बीच लव ट्रायंगल में फंसे फीमेल किरदार का कहानी में आजाद रहना बाकी रह गया लगता है. 

एक बार के लिए मान लेते हैं कि 80s में माया और 90s में नंदिनी के लिए अंत में अपने प्रेमी को चुनना, फिल्म के लिए बहुत क्रांतिकारी हो जाता इसलिए ऐसा नहीं हुआ. लेकिन 2018 में तो रूमी का विक्की के पास लौट जाना कोई चौंकाने वाला विचार नहीं लगता. बल्कि ऐसे प्रेम त्रिकोण में, लड़की अगर अंत में पति को न चुने तो कहानी में एक नए आईडिया का दरवाजा भी खुल सकता है- एक नई जिंदगी तैयार करने का. ये जरूरी क्यों है कि फिल्म में कोई रूमी अंत में प्रेमी या पति में से एक को जरूर चुने. यही एक सवाल महत्वपूर्ण क्यों रहे? 

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ऐश्वर्या राय बच्चन, तापसी पन्नू

अपने टूटे दिल का रोना लेकर बैठे प्रेमी और परिवार की कृपा से खूबसूरत लड़की पा जाने वाले पति से माया, नंदिनी किनारा क्यों नहीं कर लेतीं. फिल्म की कहानी ही तो है... रॉबी और विक्की के बीच पेंडुलम बनी रूमी, सारे ड्रामे से ऊबकर हॉकी स्टिक भी तो थाम सकती थी, जिससे उसे उसके पिता याद आते थे. नहीं तो, अपनी 'मनमर्जियां' इंस्टाग्राम रील्स में ही चलाने लगती. नंदिनी खुद म्यूजिक को दिल दे सकती थी. 

ऐसे ही एक विचार और आता है- बाऊ जी ने सिमरन को जब 'जी ले जिंदगी' कहा तो वो राज के साथ जाती दिखाई दी थी. शादी करते हुए नहीं. क्या पता दोनों वापस लंदन लौटकर में लिव-इन में रहने लगे हों और दोनों ने अपने-अपने लिए बेहतरीन इंडिविजुअल लाइफ तैयार की हो! ऐसा हो सकता है न? कहीं ये 'टू मच क्रान्ति' तो नहीं! 

 

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