पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद फिल्म 'द बंगाल फाइल्स' बंगाल में रिलीज होने वाली है. इस फिल्म में एक स्टारकिड भी है, जिसने अपने रोल से सभी को प्रभावित किया है. हालांकि बॉलीवुड सुपरस्टार का ये बेटा अभी तक शोहरत नहीं बटोर पाया है. ये स्टारकिड कोई और नहीं बल्कि मिथुन के छोटे बेटे निमांशी चक्रवर्ती हैं.
मिथुन के बेटे निमांशी ने हाल ही में Galatta के साथ बातचीत में अपने फिल्म करियर और स्टारकिड होने के बाद में बात की. जब एक्टर से पूछा गया कि 'बॉलीवुड में गोविंदा और मिथुन के बच्चों को स्टार किड्स की तरह ट्रीट क्यों नहीं किया गया?' तो उन्होंने इसका जवाब बड़ा समझदारी भरा दिया.
निमांशी ने क्या कहा?
एक्टर निमांशी ने कहा, 'देखिए, मैं चीची भैया (गोविंदा) के बच्चों के बारे में तो नहीं बोल सकता, लेकिन हमारे लिए एक चीज जो लोग भूल जाते हैं वह यह है कि हम बहुत लंबे समय तक मुंबई में नहीं रह रहे थे. हम 1994 में ऊटी (Ooty) चले गए थे, जब मैं सिर्फ दो साल का था.'
'तो डैड (मिथुन) ने वहां अपनी होटल इंडस्ट्री बनाई. उनकी फिल्म इंडस्ट्री भी एक तरह से वहां बस गई थी, जिसे 'मिथुन की ऊटी फैक्ट्री' कहा जाता था. अगर आप गूगल करेंगे तो पाएंगे कि 1994 से लेकर 2000 तक उन्होंने अपनी सारी फिल्में वहीं शूट कीं. उन्होंने अपना बेस शिफ्ट कर लिया था. फिर 2000 से लेकर 2006 के अंत तक हम कोयंबटूर (Coimbatore) में रहते थे. हम जनवरी 2007 में वापस मुंबई आए.'
एक्टर ने आगे कहा, 'तो मैं (इंडस्ट्री से) पूरी तरह डिस्कनेक्टेड था. प्रैक्टिकली बॉलीवुड का होकर भी मैं बॉलीवुड का नहीं था. जब मैं वापस आया, तो कोई नहीं जानता था कि मैं कौन हूं. मीडिया को भी पता नहीं था. और हम लोग काफी 'मीडिया शाय' (मीडिया से शर्माने वाले) हैं. मेरे पिता ने भी अपने 50 साल के करियर में शायद मुश्किल से 25 पार्टियां अटेंड की होंगी. वह बहुत लो-प्रोफाइल स्टार हैं और आज भी वैसे ही हैं.'
निमांशी ने कहा, 'हमारी परवरिश कभी इस तरह से नहीं हुई कि हमें इवेंट्स अटेंड करने हैं या हमेशा कैमरे के सामने रहना है. हम लो-प्रोफाइल रहने में बहुत खुश थे. इसलिए जब अचानक 'बैड बॉय' आई, तो अब जब लोग मुझे पहचानते हैं, तो मुझे सच में लगता है कि यह मेरी काबिलियत (merit) पर है. क्योंकि सालों साल मैंने लोकल कम्यूट, जेटी और फेरी में सफर किया है और किसी को भनक तक नहीं थी कि मैं कौन हूं. मैं इस शहर के किसी भी दूसरे बच्चे की तरह था.'
एक्टर ने कहा, 'मुझे अच्छा लगता है कि मेरी परवरिश कभी लाइमलाइट वाली नहीं रही. क्योंकि लाइमलाइट वाली जिंदगी आपको हर वक्त 'इंपॉर्टेंट' महसूस कराती है. महत्व (importance) सिर्फ फिल्म और परफॉरमेंस को मिलना चाहिए. मुझे ऐसा ही लगता है.'
'इसीलिए मुझे लगता है कि सब लोग महसूस करते हैं कि हम इतने 'अंडर द रैप्स' (छिपे हुए) क्यों हैं, या हमें वो प्रोजेक्ट्स क्यों नहीं मिलते जो लोगों को लगता है कि मिलने चाहिए. लेकिन इसका कारण यह है कि हम यहां थे ही नहीं. और जब हम वापस आए तब तक हम टीनेजर हो चुके थे और हमने तय किया कि हमें जो भी करना है खुद से करना है.
पिता ने फोन नहीं किया-निमांशी
अंत में एक्टर ने कहा, 'जैसे अभी जो मेरी फिल्म आ रही है, उसमें मेरे पिता ने किसी को एक फोन कॉल तक नहीं किया. मेरी मां ने किसी को फोन नहीं किया. उन्होंने मेरी फिल्म 'बंगाली फाल्कन्स' देखी और मुझे इतने पावरफुल रोल के लिए चुना कि मुझे यकीन नहीं हुआ. तो 'स्लो एंड स्टेडी विन्स द रेस' (धीरे मगर लगातार चलने वाला ही रेस जीतता है). हमें रातों-रात सोशल मीडिया फिनोमिना या बड़ा स्टार बनने की कोई जल्दी नहीं है. यह सब ऑर्गेनिक तरीके से होना चाहिए, क्योंकि वही टिकता है. हमारी परवरिश ऐसी ही हुई है.'