'दिल ना दिया', 'भीगे होंट तेरे', 'तौबा-तौबा', 'दुपट्टा तेरा नौ रंग दा'. ये वो गाने हैं जो एक जमाने में डिस्को और रेडियो में खूब बजते थे और ऑडियंस उनपर नाचती थीं. इन गानों को सिंगर कुणाल गांजावाला ने अपनी आवाज में गाया था. लेकिन आज वही सिंगर कहीं गुम से हो गए हैं. उनकी आवाज में गाया कोई गाना आए हुए काफी समय बीच चुका है.
क्या है कुणाल गांजावाला के सरनेम की असली कहानी?
लेकिन कुणाल सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं. फैंस उनके गानों की क्लिप्स ढूंढ-ढूंढकर निकालते और उसे शेयर करते हैं. सिंगर एक और कारण से चर्चा में रहते हैं. लोग उनके अनोखे सरनेम 'गांजावाला' के बारे में काफी सोच-विचार करते हैं. कई बार वो सिंगर को इसी सरनेम की वजह से ट्रोल भी करते हैं. अब कुणाल ने अपने 'गांजावाला' सरनेम की स्टोरी साझा की है. हिंदी रश संग बातचीत में कुणाल ने बताया कि ब्रिटिश राज के दौरान उनका परिवार मेडिकल कारणों की वजह से मारिजुआना जैसा नशीला पदार्थ उगाता था.
सिंगर ने कहा, 'साल 1942 भारत छोड़ो आंदोलन से पहले ये एक पेशा था. हम गांजे की खेती करते थे और फिर उसे ब्रिटिश सरकार को बेच देते थे. मेरे पिता ने मुझे बताया कि हमें लगान माफ था, हमारे पूर्वजों को लगान नहीं देना पड़ता था. क्योंकि हमसे ब्रिटिश ये चीज लेते थे और हमें राव साहब की तख्ती देख रखी थी. हम मेडिकल कारणों के लिए इसकी खेती करते थे और उसमें से वो अफीम के इंजेक्शन बनाकर कैंसर के मरीजों को दिया करते थे, जहां-जहां ब्रिटिश साम्राज्य था. तभी से हमें ये सरनेम मिला.'
सरनेम की वजह से उड़ता है सिंगर का मजाक?
कुणाल ने आगे बताया कि उन्होंने गांजे की खेती तबतक की, जबतक महात्मा गांधी ने सभी भारतवासियों से आत्मनिर्भर बनने के लिए कहा. सिंगर ने बताया कि उसके बाद उनके पूर्वज कंस्ट्रक्शन और स्टील फर्नीचर बनाने के काम में लग गए. कुणाल ने आगे माना कि लोग आज भी उनके सरनेम को पढ़कर अजीब तरीके से रिएक्ट करते हैं.
सिंगर ने कहा, 'कभी-कभी सोशल मीडिया पर लोग मेरे सरनेम को लेकर एक्साइटेड हो जाते हैं, तो कभी इसका मजाक उड़ाते हैं. लेकिन यही असली इतिहास है. और इस सरनेम ने जिंगल इंडस्ट्री में मेरी बहुत मदद की. लोग मजाक करते हैं कि अरे गांजेवाले, माल है क्या? और मैं उन्हें बताता कि मैं ना तो स्मोक करता हूं और ना ही ऐसी चीजें खाता हूं.'