3 मई को दुनियाभर में वर्ल्ड लाफ्टर डे मनाया जाएगा. ऐसे में हिंदी सिनेमा के उस कलाकार को याद करना तो बनता है, जिसने अपनी कॉमेडी से करोड़ों चेहरों पर मुस्कान बिखेरी. हम बात कर रहे हैं जॉनी वॉकर की, जिनका नाम सुनते ही लोगों के चेहरे पर आज भी हंसी आ जाती है.
बहुत कम लोग जानते हैं कि जॉनी वॉकर का असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था. उनका स्क्रीन नेम मशहूर व्हिस्की ब्रांड ‘जॉनी वॉकर’ से इंस्पायर्ड था. ये नाम उन्हें गुरु दत्त ने दिया था. दरअसल, जॉनी शराबी आदमी की इतनी शानदार एक्टिंग करते थे कि गुरु दत्त उनसे काफी प्रभावित हो गए थे.
इसके बाद गुरु दत्त ने उन्हें अपनी फिल्म ‘बाजी’ में मौका दिया. फिल्म में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने लोगों का दिल जीत लिया और फिर बदरुद्दीन काजी हमेशा के लिए जॉनी वॉकर बन गए.
फिल्मों में आने से पहले जॉनी वॉकर मुंबई में BEST बस कंडक्टर की नौकरी किया करते थे. वो बस में सफर करने वाले लोगों को जोक्स सुनाकर और मिमिक्री करके हंसाया करते थे. उनकी इसी आदत ने एक दिन उनकी किस्मत बदल दी.
जॉनी वॉकर की कॉमेडी उस दौर के बाकी कलाकारों से काफी अलग थी. वो बिना डबल मीनिंग और बिना भद्दे मजाक के लोगों को हंसाते थे. उनकी कॉमेडी में मासूमियत और अपनापन होता था, जिसे परिवार के लोग भी साथ बैठकर एंजॉय करते थे.
धीरे-धीरे वो गुरु दत्त की फिल्मों का अहम हिस्सा बन गए. ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चांद’ और ‘साहिब बीबी और गुलाम’ जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी ने अलग ही रंग जमा दिया था.
जॉनी वॉकर सिर्फ कॉमेडियन नहीं थे, बल्कि वो अपने किरदारों में एक इंसानी एहसास भी छोड़ जाते थे. उनकी एक्टिंग देखकर लगता था कि कॉमेडी सिर्फ हंसाने के लिए नहीं, बल्कि दिल छूने के लिए भी होती है.
1980 के दौर में फिल्मों की कॉमेडी का अंदाज बदलने लगा. जॉनी वॉकर को लगने लगा कि फिल्मों में साफ-सुथरी कॉमेडी कम होती जा रही है. यही वजह थी कि उन्होंने धीरे-धीरे फिल्मों से दूरी बना ली.
हालांकि जॉनी वॉकर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कॉमेडी और उनके किरदार हमेशा जिंदा रहेंगे. वर्ल्ड लाफ्टर डे के मौके पर उन्हें याद करना इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने लोगों को बिना किसी भद्देपन के खुलकर हंसना सिखाया.
जॉनी वॉकर ने 29 जुलाई 2003 का लंबी बीमारी से निधन हो गया. उन्होंने 79 की उम्र में यूके में आखिरी सांस ली.