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उत्तराखंड में क्षेत्रीय दलों की सियासत क्यों नहीं चढ़ सकी परवान?

उत्तराखंड में क्षेत्रीय सरोकारों की राजनीति करने वाली क्षेत्रीय पार्टियां सियासी परवान नहीं चढ़ सकी. उत्तराखंड के लिए आंदोलन की अगुवाई करने वाली उत्तराखंड क्रांति दल से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन वो सत्ता की दहलीज तक भी नहीं पहुंच सकी हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय दलों का जादू बेसर है. 

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उत्तराखंड की क्षेत्रीय पार्टी यूकेडी
उत्तराखंड की क्षेत्रीय पार्टी यूकेडी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • उत्तराखंड की सत्ता कांग्रेस-बीजेपी के नाम रही
  • क्षेत्रीय दल उत्तराखंड में नहीं दिखा सके असर
  • उत्तराखंड क्रांति दल और बसपा शून्य पर सिमटी

उत्तराखंड की सियासत कांग्रेस और बीजेपी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. उत्तराखंड को बने पिछले दो दशक से ज्यादा का समय हो चुके हैं, लेकिन सत्ता पर इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियां बारी-बारी से काबिज होती रही हैं. ऐसे में प्रदेश के क्षेत्रीय सरोकारों की राजनीति करने वाली क्षेत्रीय पार्टियां सियासी परवान नहीं चढ़ सकीं. उत्तराखंड के लिए आंदोलन की अगुवाई करने वाली उत्तराखंड क्रांति दल से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन वो सत्ता की दहलीज तक भी नहीं पहुंच सकी हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय दलों का जादू बेसर है. 

बता दें कि साल 2000 में तीन नए राज्य गठित किए गए थे, जिनमें उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड शामिल थे. झारखंड की सियासत में क्षेत्रीय दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) एक मजबूत राजनीतिक ताकत के तौर पर स्थापित है. वो मौजूदा समय में सत्ता पर काबिज हैं और जेएमएम के प्रमुख हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं. लेकिन, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में सक्रिय क्षेत्रीय दल अपना कोई सियासी असर नहीं दिखा सके हैं. 

हालांकि, देश के दूसरे अन्य राज्य में जिन क्षेत्रीय दलों और संगठनों ने अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन किए हैं. वो सियासी तौर पर सफल रहे हैं. तेलंगाना के लिए टीआरएस ने आंदोलन किया और सूबे की सत्ता पर काबिज है. झारखंड की लड़ाई जेएमएम ने लड़ी और राज्य के गठन के बाद से सियासी तौर पर अहम भूमिका में है. इसके अलावा यूपी और बिहार में क्षेत्रीय पार्टियां महत्वपूर्ण रोल प्ले कर रही है, लेकिन उत्तराखंड में क्षेत्रीय दल लोगों का विश्वास जीतने में नाकाम रहे हैं. 

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उत्तराखंड क्रांति दल का गठन

उत्तराखंड में कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. डीडी पंत ने 26 जुलाई 1979 को जब उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की स्थापना की थी. इसकी के बाद से वो उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के जनसरोकारों के लिए अलग राज्य की लड़ाई के लिए आंदोलन किया. उत्तराखंड बनने के लिए लंबा संघर्ष रहा है, जिसका नतीजा साल 2000 में अटल सरकार में पूरा हुआ. यूपी से 13 पहाड़ी जिलों को काटकर उत्तराखंड बना. 

उत्तराखंड क्रांति दल के अध्यक्ष डॉ. डीडी पंत ने डीडीहाट विधानसभा सीट से 1985 से 1996 तक तीन बार विधायक चुने गए. इसके बाद उत्तराखंड राज्य गठन के बाद 2002 में फिर विधानसभा पहुंचे और उनकी पार्टी के कुल चार विधायक जीतकर आए थे. इसके बाद से उत्तराखंड क्रांति दल का सियासी ग्राफ गिरना शुरू हुआ तो फिर दोबारा से नहीं ऊपर आ सका. 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका. 

क्षेत्रीय दल भी नहीं बन पाया विकल्प

भाजपा और कांग्रेस के दबदबे और उत्तराखंड क्रांति दल की आपसी लड़ाई के चलते राज्य में उत्तराखंड रक्षा मोर्चा का उदय हुआ. इसके अलावा उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, उत्तराखंड जनवादी पार्टी ने चुनाव में भाग्य अजमाया. उत्तराखंड क्रांति दल  के विकल्प के रूप में अपने आपको स्थापित करने के लिए उत्तराखंड रक्षा मोर्चा ने भी चुनाव में ताल भी ठोकी. इसके बाद भी दोनों ही पार्टियों को जनता ने दरकिनार कर दिया. उत्तराखंड क्रांति के शीर्ष नेता पूर्व सांसद टीपीएस ने  पार्टी को आम आदमी पार्टी में विलय कर दिया को पार्टी दो हिस्सा में  बंट गई. 

उत्तराखंड बनने के हुए विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल के तौर पर बसपा और सपा ने किस्मत आजमाई. सपा तो कई असर तो नहीं दिखा सकी, लेकिन बसपा हर चुनाव में सीट जीतती रही है. 2002 चुनाव में बसपा सात सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन चुनाव दर दर चुनाव पार्टी का सियासी गिरता गया. बीजेपी और कांग्रेस की सियासी चालों के आगे बसपा का हाथी हांफने लगा. 

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हालांकि बसपा का प्रदर्शन हरिद्वार जिले तक सीमित रहा. 2017 विधानसभा चुनाव में बसपा खाता तक नहीं खोल पाई. इस बार बसपा फिर से सक्रिय है तो आम आदमी पार्टी भी किस्मत आजमा रही है. ऐसे में देखना है कि 2022 के चुनाव में क्या सियासी गुल क्षेत्रीय पार्टियां खिला पाती है? 

 

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