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Uttarakhand Election: पहला चुनाव, कांग्रेस की जीत का रावत को क्रेडिट, लेकिन CM बने नारायण दत्त तिवारी

उत्तराखंड का पहला चुनाव काफी खास रहा था. मेहनत किसी ने की थी, जीत का सेहरा भी उसी को दिया गया लेकिन जब सीएम बनाने की बारी आई तो एक अलग ही नाम आगे कर दिया गया. इस कहानी के किरदार हैं हरीश रावत, एन.डी तिवारी और सतपाल महाराज.

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हरीश रावत और एन.डी तिवारी ( पीटीआई) हरीश रावत और एन.डी तिवारी ( पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत की जगह तिवारी को बनाया था सीएम
  • सतपाल महाराज ने भरे कांग्रेस हाईकमान के कान, रावत के थे खिलाफ
  • हरीश रावत की बगावत का अनुभव से एन.डी तिवारी ने दिया था जवाब

उत्तराखंड कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा....हरीश रावत. मुख्यमंत्री सिर्फ एक बार बन सके...कार्यकाल भी 2 साल 55 दिन तक सीमित रहा. लेकिन फिर भी 2022 चुनाव में कांग्रेस लड़ाई में दिख रही है तो उसका बड़ा कारण हरीश रावत हैं. अपने दम पर प्रचार, अपने चेहरे पर वोट और अपनी रणनीति से देवभूमि का दिल जीतने का प्रयास है. हरीश रावत जमीन से जुड़े नेता रहे हैं.

कांग्रेस कार्यकर्ता से लेकर उत्तराखंड अध्यक्ष तक, केंद्र में मंत्री से लेकर सीएम तक का सफर तय करने वाले हरीश रावत ने काफी संघर्ष से अपनी सियासी पहचान बनाई है. इसके बावजूद उनके राजनीतिक जीवन में ऐसे कई सियासी मोड़ आए जब उनकी मेहनत का फल किसी दूसरे नेता को हिस्से में चला गया. इसकी टीस आज भी हरीश परेशान कर जाती है. ये कहानी है आज से 20 साल पुरानी जब उत्तराखंड का पहला विधानसभा चुनाव हुआ था और कांग्रेस में 'सीएम कुर्सी' के लिए छिड़ गई थी जंग.

उत्तराखंड का पहला चुनाव.....नतीजों से कार्यकर्ता हैरान

उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने उत्तराखंड या कह लीजिए उत्तरांचल के 2002 वाले चुनावी नतीजे कांग्रेस के लिए सियासी तौर पर संजीवनी से कम नहीं था, क्योंकि यूपी में रहते हुए उसके वापसी की संभावना नहीं दिख रही थी. ऐसे में उत्तराखंड का पहला चुनाव कांग्रेस ने जीता था. 70 विधानसभा सीटों में से 36 पर जीत हासिल कर ली थी. राज्य बनने के बाद दो साल तक सरकार संभालने वाली बीजेपी को मात्र 19 सीटों से संतुष्ट करना पड़ गया था. 

हालांकि, उत्तराखंड चुनाव में कांग्रेस ने जो जीत हासिल की थी, खुद पार्टी नेता और कार्यकर्ताओं को भी ऐसे बेहतर नतीजे की उम्मीद नहीं थी. कांग्रेस कार्यकर्ताओं को चुनाव में जीत की आस थी, लेकिन बहुमत के आंकड़ो के साथ सत्ता में वापसी की नहीं थी. ऐसे में 'सम्मानजनक टोटल' वाली विचारधारा के साथ उतरे कार्यकर्ताओं ने जब राज्य में बहुमत वाली कांग्रेस सरकार बना दी तो राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज थी कि आखिर कांग्रेस ने ऐसा कैसे कर दिखाया?

हरीश रावत का अटूट भरोसा जो जल्द 'टूटा'

इस सवाल और हर समीक्षा का जवाब तब के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत पर जाकर रुका. प्रदेश अध्यक्ष पद पर रहते हुए हरीश रावत ने पार्टी को जमीन पर सिर्फ मजबूत किया बल्कि संगठन को नई धार भी दी थी. उन्होंने एक ऐसी रणनीति बनाई जहां पर गुपचुप तरीके से उत्तराखंड क्रांति दल से बातचीत कर ली, कई सीटों पर बीजेपी बनाम कांग्रेस की सीधी लड़ाई करवा दी और नतीजा ये रहा कि उत्तराखंड का पहला चुनाव कांग्रेस पार्टी ने अपने नाम किया. 

कांग्रेस के जीत का पूरा श्रेय हरीश रावत को दिया गया. वे खुद इतने विश्वास से भरे हुए थे कि चुनाव जीतने के बाद बोल गए थे कि उत्तराखंड क्रांति दल को भी राज्य की कांग्रेस सरकार में शामिल किया जाएगा. वे इतना सबकुछ इसलिए कह पा रहे थे क्योंकि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री का ताज उनके सिर सजेगा. लेकिन इसी मोड़ पर हरीश रावत गच्चा खा गए. वे इस राह को जितना आसान समझ रहे थे वो उतनी थी नहीं. 

समर्थन-समीकरण अपने पक्ष में होने के बावजूद भी कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री की कुर्सी हरीश रावत को देने के बजाय नारायण दत्त तिवारी को सौंप दिया. वहीं, नारायण दत्त तिवारी जिन्होंने एक बार कहा था कि उत्तरांखड पृथक राज्य की अगर स्थापना करनी है तो उनके शरीर के ऊपर से गुजरकर होगी. उत्तराखंड के लोग और कांग्रेस के ही कई कार्यकर्ता उस बयान को भूले नहीं थे. लिहाजा जब कांग्रेस हाईकमान ने तिवारी के नाम मुहर लगाई तो हरीश रावत समर्थक नेता और कार्यकर्ता भड़क गए और सड़क पर उतर आए. कांग्रेस की सरकार बनने से पहले ही बवाल खड़ा हो गया. 

तिवारी को सीएम कुर्सी, रावत को संदेश

रावत समर्थकों ने देरहादून की सड़कें जाम कर दी गई हैं, कांग्रेस दफ्तर पर ही पत्थर फेंके गए और दिल्ली में भी 24 अकबर रोड पर कांग्रेस हाईकमान का घेराव किया गया. सोनिया गांधी तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश हुई. एक समय ऐसी खबरें भी चल पड़ीं कि हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस को तोड़ सकते हैं, क्योंकि उन्हें 18 विधायकों का समर्थन था. कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व डैमेज कन्ट्रोल करने में जुट गया. 
हाईकमान को इसकी भनक थी, ऐसे में सबसे पहले तब के उत्तराखंड राज्य में पार्टी मामलों के प्रभारी महासचिव गुलाम नबी आजाद ने प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं को शांत करने का प्रयास किया. उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि नारायण दत्त तिवारी को सीएम बनाने का फैसला कांग्रेस हाईकमान का है और इसे चुनौती नहीं दी जा सकती.

वहीं, कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत को बुलाया, घंटों की बातचीत हुई, जिसके बाद फिर इस विवाद को शांत कर दिया गयाय 2 मार्च को एन.डी तिवारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उनके साथ 14 कैबिनेट मंत्री, तीन राज्य मंत्री ने ONGC ऑडिटोरियम में शपथ ली थी. लेकिन सीएम कुर्सी पर एन.डी तिवारी पहुंचे कैसे? चार बार उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने वाले तिवारी को कांग्रेस हाईकमान ने उत्तराखंड का मुख्यमंत्री क्यों बनाया? इसकी वजह सियासी समीकरण रहे, पार्टी के अंदर अंदरूनी लड़ाई या फिर तिवारी के प्रति कांग्रेस हाईकमान की करीबियां? उस समय सवाल कई थे, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चित नाम थे सतपाल महाराज.

सीएम रेस में रावत आगे, सतपाल महाराज बने विलेन

उत्तराखंड की राजनीति में आज से 20 साल पहले भी सतपाल महाराज का जादू चलता था और आज भी वे अपने क्षेत्र में काफी लोकप्रिय माने जाते हैं. उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में उनके नाम पर वोट पड़ जाते हैं. लेकिन 2002 में अगर हरीश रावत ने सीएम कुर्सी गंवा दी थी, तो इसका एक बड़ा कारण सतपाल महाराज रहे थे. जैसा की शुरुआत में बताया कि कांग्रेस के अंदर सीएम कुर्सी को लेकर अंदरूनी लड़ाई चल रही थी.
 ऐसे में चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद की रेस में सतपाल महाराज का नाम भी था. चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने कई मौकों पर अपने तेवर दिखाए थे. वे किसी भी हालत में अपने समर्थकों को टिकट दिलवाना चाहते थे. पार्टी पर इस प्रकार से प्रेशर बनाया गया कि हाईकमान को उनके आगे झुकना पड़ा. 
बताया जाता है कि सतपाल महाराज ने जब बगावती तेवर दिखा दिए थे, तब चुनावी नफा-नुकसान देखते हुए पार्टी की तरफ से सतपाल महाराज के 11 पसंदीदा उम्मीदवारों को तुरंत टिकट दे दिया गया. इस लिस्ट में उनकी पत्नी अमृति रावत का नाम भी शामिल था. सतपाल महाराज की उम्मीदवारों की टिकट देने वाली बात तो मान ली गई लेकिन उन्हें सीएम कर्सी देना संभव नहीं था. 
इसकी एक वजह उनके बड़े भाई बालेश्वर योगी भी रहे जिनके कुछ ऐसे संदिग्ध सौदे सामने आ गए थे कि कांग्रेस पार्टी सतपाल महाराज को सीएम कुर्सी देने से बच गई. हाईकमान के मन में स्पष्ट था कि किसी भी विवादित बैकग्राउंड वाले शख्स को सीएम नहीं बनाया जा सकता. अब सतपाल का पत्ता तो सीएम कुर्सी से कट गया, लेकिन उन्होंने अपने साथ-साथ हरीश रावत की राह में भी रोड़ा बन गए. 

सोनिया गांधी के मन में क्या चल रहा था?

उस समय के राजनीतिक जानकार बताते हैं कि सतपाल महाराज ने ही कांग्रेस हाईकमान को ये संदेश दे दिया था कि अगर वे मुख्यमंत्री नहीं बन सकते हैं तो फिर हरीश रावत भी सीएम नहीं बनने चाहिए. ये एक चेतावनी भी थी और शर्त भी. इसी वजह से कांग्रेस को उत्तराखंड के लिए एक ऐसा मुख्यमंत्री चेहरा चाहिए था जो सभी को स्वीकार भी हो जाता और जिसके पास प्रशासनिक अनुभव भी होता. 2002 के चुनाव के बाद एन डी तिवारी इन सभी जरूरतों को पूरा कर रहे थे.
एनडी तिवारी कई बार यूपी के मुख्यमंत्री रह चुके थे लिहाजा अनुभव की कोई कमी नहीं थी. बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने तराई क्षेत्र ( जब उत्तराखंड यूपी का हिस्सा था) के विकास के लिए काफी काम किया था. औद्योगिक नगरी के तौर पर उन्होंने इस पूरे इलाके को बसाया था. ऐसे में पार्टी को हर पहलू पर तिवारी ही फिट दिखाई दे रहे थे.

ऐसे में उत्तराखंड के पहले चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनने का गौरव नारायण दत्त तिवारी को मिल गया और जीत का सेहरा बांधे हरीश रावत खाली हाथ रह गए. उन्हें उम्मीद तो पूरी थी कि तिवारी अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे, इतने मनमुटाव भी पैदा हो गए थे कि ऐसी स्थिति कई बार बनी भी. लेकिन एन डी तिवारी बड़े मंझे हुए खिलाड़ी थे. ज्यादा नहीं बोलते थे, लेकिन निशाना हमेशा जगह पर रहता. उस समय उन्होंने हरीश रावत के 'बगावत' का सामना अपने अनुभव से किया था, लिहाजा अब तक के उत्तराखंड इतिहास के वे एक लौते ऐसे मुख्यमंत्री रहे जिसने अपने पांच साल सत्ता में पूरे किए और 2007 में चुनाव लड़ने से मना कर दिया.

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