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UP चुनाव: 'अपनों' की केमिस्ट्री से बिगड़ा बीजेपी का गणित, कैसे होगी सोशल इंजीनियरिंग?

यूपी में बीजेपी के ओबीसी वर्ग के इन नेताओं ने भले ही बीते दो दिनों में पार्टी को अलविदा कहा हो, लेकिन इसकी पठकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी. सत्ता में रहते हुए योगी आदित्यनाथ की अपनों के साथ बिगड़ी केमिस्ट्री ने चुनाव ऐलान के साथ ही बीजेपी के सियासी गणित को बिगाड़ दिया है. ऐसे में बीजेपी के लिए 2017 में सत्ता की चाबी साबित हुए गैर-यादव ओबीसी वोटबैंक को कैसे बीजेपी दुरुस्त करेगी. 

सीएम योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य सीएम योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 2017 में बीजेपी के जीत में ओबीसी अहम रहे
  • बीजेपी छोड़ने वाले नेताओं के निशाने पर योगी
  • बीजेपी के डेढ़ सौ विधायक धरने पर बैठ गए थे

उत्तर प्रदेश में ओबीसी वर्ग के बीच गहरी पैठ रखने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, धर्म सिंह सैनी सहित करीब 10 विधायक ने बीजेपी छोड़ दिया है और अब शुक्रवार को सपा का दामन थामेंगे. ओबीसी वर्ग के इन नेताओं ने भले ही बीते दो दिनों में पार्टी को अलविदा कहा हो, लेकिन इसकी पठकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी.

सत्ता में रहते हुए योगी आदित्यनाथ की अपनों के साथ बिगड़ी केमिस्ट्री ने चुनाव ऐलान के साथ ही बीजेपी के सियासी गणित को बिगाड़ दिया है. ऐसे में बीजेपी के लिए 2017 में सत्ता की चाबी साबित हुए गैर-यादव ओबीसी वोटबैंक को कैसे बीजेपी दुरुस्त करेगी. 

स्वामी प्रसाद मौर्य काफी लंबे समय से नाराज चल रहे थे. उन्होंने कई स्तरों पर पार्टी मंच पर अपनी नाराजगी का इजहार भी किया था. इतना ही नहीं योगी आदित्यनाथ के चेहरे को आगे किए जाने का भी विरोध करते हुए कहा था बीजेपी पीएम मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी और नतीजे के बाद कोई भी सीएम बन सकता है. धर्म सिंह सैनी और दारा सिंह चौहान भी कई मौके पर अपनी नारजगी जाहिर कर चुके थे. 

बीजेपी छोड़ने के बाद धर्म सिंह सैनी ने कहा, 'बीजेपी में यह नाराजगी आज की नहीं बल्कि काफी पहले से थी. मैंने इसलिए बीजेपी छोड़ी, क्योंकि मेरी किसी भी बात को नहीं सुनी गया. संगठन के पदाधिकारियों की भी नहीं सुनी गई. 140 विधायकों  ने जब धरना दिया था तब सब धमकाकर चुप करा दिया गया था, लेकिन तभी सबने तय किया था कि इसका मुंहतोड़ जवाब देंगे. आचार संहिता लगते मंत्री से लेकर विधायक तक पार्टी छोड़ रहे हैं और यह बीजेपी छोड़ने का सिलसिला 20 जनवरी तक ऐसे ही चलता रहेगा.

स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी सहित जिन बीजेपी विधायकों ने पार्टी छोड़ा है, उन सभी ने एक सुर में योगी आदित्यनाथ को ठिकरा फोड़ा है. मौर्य से ले कर शाक्य तक ने योगी सरकार में दलित, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, वंचित का सम्मान न होने, इनकी उपेक्षा किए जाने, सामाजिक न्याय को कुचलने का आरोप लगाया है. इससे साफ जाहिर होता है कि सभी नेताओं की नाराजगी के पीछे कहीं न कहीं आपस में केमिस्ट्री न बनने के चलते हुए हैं. 

बता दें कि साल 2019 में बीजेपी के करीब डेढ़ सौ विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ विधानसभा के अंदर धरने पर बैठ गए थे. इन सभी नेताओं ने दर्द था कि उनकी न तो अधिकारी सुनते हैं और न ही सरकार में कोई सुनता है. हालांकि, सरकार और विधानसभा अध्यक्ष के आश्वासन के बाद विधायकों ने धरना खत्म कर दिया था. इसके बाद कोरोना की दूसरी लहर में बृजेश पाठक सहित कई मंत्रियों, बीजेपी के तमाम सांसद और विधायकों ने पत्र लिखकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए सवाल खड़े किए थे. 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बीच भी लगातार मनमुटाव की खबरें आती रही. योगी के नेतृत्व वाले सवाल पर केशव मौर्य कहते रहे हैं कि पार्टी बीजेपी कमल के निशान और मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी. ऐसे में संघ और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को भी दखल देना पड़ा था, जिसके बाद जाकर इस पर पूर्णविराम लगा था. इसके बाद एके शर्मा को यूपी कैबिनेट में शामिल न किए जाने पर भी कई तरह के सवाल खड़े हुए थे. ब्राह्मण बनाम ठाकुर नेरेटिव भी गढ़ा गया. इन घटनाओं के साफ जाहिर होता है कि बीजेपी में आपस की राजनीतिक केमिस्ट्री ने पार्टी के सारे सियासी समीकरण बिगाड़ दिए हैं. 

2022 के चुनाव आचार संहिंता लगते ही मंत्री से लेकर विधायक तक ने ताबड़तोड़ इस्तीफा देना शुरू कर दिया है. बीजेपी की यह भगदड़ का सर्वाधिक नुकसान सीएम योगी आदित्यनाथ की छवि को हो रहा है, क्योंकि पार्टी छोड़ने वाले मंत्री और सभी नेताओं ने एक ही भाषा में योगी सरकार और बीजेपी पर दलित, पिछड़ों, वंचितों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाए गए है.  

बीजेपी के सामने अपने उस सोशल इंजीनियरिंग को बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है, जिसके बूते उसे बीते विधानसभा चुनाव में तीन-चौथाई का बड़ा और ऐतिहासिक बहुमत हासिल हुआ था. क्योंकि भाजपा के जिन मौजूदा विधायकों ने पार्टी छोड़कर सपा गए हैं उसका असर प्रदेश के उन विधानसभा क्षेत्रों में भी पड़ेगा जहां उनकी जाति-समाज के लोग निर्णायक भूमिका में हैं. 

दरअसल इस बार का विधानसभा चुनाव में सपा का पूरा फोकस भाजपा का गैर-यादव पिछड़ा वोटबैंक है. सपा नेताओं को पता है कि इस वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाए बिना सत्ता की चाबी हासिल नहीं होगी. यही कारण है कि पार्टी छोड़ने वाले करीब-करीब सभी मंत्री एवं विधायक न सिर्फ गैरयादव ओबीसी वर्ग के हैं. यह तय रणनीति के तहत चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद गैरयादव ओबीसी नेताओं के बारी-बारी से इस्तीफा देने की योजना बनाई गई.

बीजेपी छोड़ रहे ओबीसी नेताओं का ठिकाना सपा बनने जा रही हैं और उन सभी नेताओं की एंट्री से पहले अखिलेश यादव के साथ उनकी तस्वीर को सोशल मीडिया में शेयर किया गया. इसके जरिए भाजपा के लिए सत्ता की चाबी साबित हुए इस वर्ग को सियासी संदेश दिया जा सके और संदेश यह जाए कि इस वर्ग का भाजपा से मोहभंग हो गया है. ऐसे में देखना है कि बीजेपी अपने इस सोशल इंजीनियरिंग को कैसे दोबारा से मजबूत करती है, क्योंकि सत्ता का फैसला यूपी में ओबीसी समाज के हाथ में है. 


 

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