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यूपी के मुसलमान, किसपर होंगे मेहरबान? 20 फीसदी वोटों के लिए पार्टियों में घमासान

यूपी में करीब 20 फीसदी मुस्लिम हैं. सपा से लेकर बसपा और कांग्रेस की मुस्लिम समाज पर नजर है. जबकि ओवैसी भी आस लगाए बैठे हैं. किसान आंदोलन के बहाने पनपी मुस्लिम-जाट एकता को देखते हुए आरएलडी को भी बड़ी उम्मीद है. वहीं, कुछ छोटे प्लेयर भी मुस्लिम वोटरों के दम पर अपना सियासी वजूद कायम करना चाहते हैं.

अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी, मायावती, प्रियंका गांधी, डॉ अय्यूब अंसारी अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी, मायावती, प्रियंका गांधी, डॉ अय्यूब अंसारी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यूपी में 20 फीसदी मुस्लिम का 143 सीटों पर असर
  • मुस्लिमों की यूपी में पहली पसंद कौन सी पार्टी बनेगी?
  • सपा-बसपा को जाता रहा है मुस्लिमों का वोट

उत्तर प्रदेश में चार महीने के बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियां सियासी बिसात बिछाने में जुटी हैं. सूबे के 20 फीसदी के करीब मुस्लिम वोटर को साधने के लिए सपा से लेकर बसपा और कांग्रेस जुटी हैं तो असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुसलमीन से लेकर डॉ. अय्यूब अंसारी की पीस पार्टी जैसी मुस्लिम पार्टियों की नजर भी इसी वोटबैंक पर है. वहीं, इस बार बीजेपी भी मुस्लिमों को गले लगाने की कवायद में है. ऐसे में सवाल उठता है कि यूपी के मुस्लिम मतदाताओं का 2022 के चुनाव में क्या रुख होगा? 

बता दें कि उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं. सूबे की कुल 143 सीटों पर मुस्लिम अपना असर रखते हैं. इनमें से 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी बीस से तीस फीसद के बीच है. 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान तीस फीसद से ज्यादा है. सूबे की करीब तीन दर्जन ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत दर्ज कर सकते हैं जबकि करीब 107 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मतदाता चुनावी नतीजों को खासा प्रभावित करते हैं. इनमें ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई वाले इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश की हैं. 

मुस्लिम

आजादी के बाद से नब्बे के दशक तक उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता कांग्रेस का परंपरागत वोटर माना जाता था. लेकिन, राममंदिर आंदोलन के चलते मुस्लिम समुदाय कांग्रेस से दूर हुआ तो सबसे पहली पंसद मुलायम सिंह यादव के चलते सपा बनी और उसके बाद समाज ने बसपा को अहमियत दी. इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच मुस्लिम वोट बंटता रहा.

2022 के चुनाव को लेकर मुस्लिमों को लेकर सियासी दलों के बीच शह-मात का खेल शुरू है. ऐसे में अखिलेश यादव की सपा क्या मुस्लिम मतदाता की पहली पसंद होगी या फिर बीजेपी को हराने के लिए सपा के बाद बसपा और कांग्रेस को मुस्लिम वोटर तवज्जो देगा? असदुद्दीन ओवैसी बिहार के सीमांचल जैसी कामयाबी यूपी में भी हासिल कर पाएंगे? डॉक्टर अयूब की पीस पार्टी दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर के बाद बनी उलेमा काउंसिल से हाथ मिलाने के बाद मुस्लिमों में कितनी पैठ बना पाएगी? 

सपा मुस्लिमों के पहली पसंद बनेगी? 

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के बीच सपा की अच्छी पैठ मानी जाती है. सूबे में 20 फीसदी मुस्लिम और 10 फीसदी यादव वोटरों के साथ सपा के एम-वाई समीकरण के दम पर मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव यूपी की सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हो चुके हैं. 1990 का अयोध्या गोलीकांड और उसके बाद बाबरी विध्वंस के चलते सूबे में जो माहौल बदला उसमें मुस्लिम वोटों का सबसे ज्यादा फायदा मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा को मिला. इसी के चलते बीजेपी नेता मुलायम सिंह यादव को 'मुल्ला मुलायम' कहकर घेरते रहे हैं और अब सीएम योगी आदित्यनाथ इन दिनों अखिलेश यादव को 'अब्बाजान' के जरिए घेर रहे हैं.  

अखिलेश यादव और जफरयाब जिलानी

यूपी के सियासी माहौल में अखिलेश यादव मुस्लिम और यादव वोटों को अपना कोर वोटबैंक मानकर चल रहे हैं. 2022 में सत्ता में वापसी के लिए मुस्लिम-यादव वोटबैंक में अन्य ओबीसी के वोटों के कुछ हिस्से को जोड़ने की कोशिश में अखिलेश यादव जुटे हैं. बीजेपी के सूबे में सत्ता में होने के चलते, जिस तरह का माहौल बना हुआ है. उसमें अभी तक मुस्लिम के बीच सपा सबसे पहली पंसद मानी जा रही है, लेकिन कांग्रेस से लेकर बसपा और मुस्लिम पार्टियां यादव-मुस्लिम समीकरण को तोड़ने की कवायद में जुटी हैं. 

कांग्रेस क्या मुस्लिमों का विश्वास जीत पाएगी

कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने तीन दशक से चले आ रहे सत्ता के वनवास को खत्म करने के लिए मुस्लिम वोटों पर नजर गढ़ाए हुए है. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी मुस्लिम वोटों को साधने के लिए तमाम जतन कर रही हैं. सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन के दौरान प्रियंका गांधी के अल्पसंख्यकों के साथ खुल कर खड़े होने को कांग्रेस मुसलमानों के बीच भुनाने की कोशिश कर रही है. 

मुस्लिम महिलाओं के साथ प्रियंका गांधी

यूपी में पिछले तीन दशकों में सपा और बसपा ने मुस्लिमों का किस तरह से सियासी इस्तेमाल किया है, कांग्रेस इसे लेकर माहौल बनाने में जुटी है. इतना ही नहीं, सपा राज में हुए दंगों की याद भी दिला रही है. कांग्रेस मुस्लिम को वापस अपने पाले में लाने के लिए अल्पसंख्यक सम्मलेन से लेकर उलेमाओं और मस्जिद के इमामों तक का सहारा ले रही है. इतना ही नहीं, 2022 के चुनाव में बड़ी संख्या में मुस्लिम कैंडिडेट उतारने की तैयारी भी कांग्रेस ने कर रखी है. ऐसे में 90 के दशक में मुस्लिम का टूटा विश्वास क्या कांग्रेस जीत पाएगी. 

मायावती क्या मुस्लिमों को जोड़ पाएंगी?

बसपा प्रमुख मायावती पश्चिम यूपी में दलित-मुस्लिम समीकरण के जरिए कई बार सियासी करिश्मा दिखा चुकी हैं. 2022 के चुनाव में एक बार फिर मायावती की कोशिश मुस्लिम वोटों को जोड़ने की है. यही वजह है कि पश्चिम यूपी की कमान उन्होंने मुस्लिम चेहरे शमसुद्दीन राईन को दे रखी है. इतना ही ही नहीं मायावती मुस्लिमों को सपा और कांग्रेस से दूर रखने के लिए मलियाना और मुजफ्फरनगर दंगे की याद दिला रही हैं. 

यूपी के चुनाव रण में त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले की सूरत में बीजेपी को मात देने के लिए कई बार मुस्लिम वोटर हाथी पर सवारी कर चुके हैं. 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा की जीत की एक बड़ी वजह ब्राह्मण-दलित केमिस्ट्री के साथ-साथ मुस्लिम वोटबैंक भी था. ऐसे ही 2019 के लोकसभा चुनाव में तीन मुस्लिम बसपा से सांसद बने थे, जिनमें दो पश्चिम यूपी और एक पूर्वांचल से हैं. ऐसे में बसपा को हल्के में नहीं लिया जा सकता है. पश्चिम यूपी की कई मुस्लिम बहुल सीटों पर मायावती दलित-मुस्लिम समीकरण को अमलीजामा पहनाने में जुटी हैं. 

मुस्लिम वोटर खामोश हैं

मुस्लिमों के दिल में जयंत के लिए बनेगी जगह?

मुजफ्फरनगर दंगे के चलते पश्चिम यूपी में जाट और मुस्लिम एक दूसरे से दूर हो गए थे, जिसका खामियाजा राष्ट्रीय लोक दल को तीन चुनाव से उठाना पड़ रहा है. आरएलडी की कमान अब चौधरी अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी के हाथों में है और किसान आंदोलन के चलते जाट-मुस्लिम नजदीक आ रहे हैं. ऐसे में जयंत चौधरी की सियासी उम्मीदें बढ़ गई हैं, जिसके चलते जाट-मुस्लिम एकता के लिए पश्चिम यूपी में आरएलडी 'भाईचारा जिंदाबाद' के तहत तकरीबन 300 छोटे-बड़े सम्मेलन करा चुकी है. सपा के साथ आरएलडी का गठबंधन भी है. ऐसे में आरएलडी जाट के साथ-साथ मुस्लिमों के विश्वास को फिर से जीतने की उम्मीद लगाए हुए है. 

मुस्लिम क्या ओवैसी को मानेंगे अपना नेता

बिहार की तर्ज पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों के सहारे सियासी जमीन तलाश रहे हैं. ओवैसी यूपी में छोटे-छोटे दलों के साथ मिलकर ओम प्रकाश राजभर की अगुवाई में बने भागीदार संकल्प मोर्चा का हिस्सा हैं और उन्होंने सूबे की 100 मुस्लिम बहुल सीटों पर कैंडिडेट उतारने का ऐलान किया है. पिछले आठ महीने से ओवैसी यूपी का लगातार दौरा कर रहे हैं और मुस्लिम बहुल इलाके की सीटों को टारगेट किया है. इतना ही नहीं ओवैसी मुस्लिम लीडरशिप को स्थापित करने और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को सबसे बड़ा सियासी हथियार बना रहे हैं. इसीलिए उनके निशाने पर बीजेपी के साथ समाजवादी पार्टी है. मुस्लिम युवाओं के बीच ओवैसी का सियासी ग्राफ तेजी से बढ़ा है, लेकिन वोटों में ये कितना तब्दील होगा यह तो 2022 के चुनाव में ही पता चल सकेगा. 

पीस पार्टी-उलेमा काउंसिल का गठबंधन

उत्तर प्रदेश में असदुद्दीन ओवैसी ही नहीं बल्कि डॉ. अय्यूब अंसारी की पीस पार्टी और बटला हाउस एनकाउंटर के बाद बनी उलेमा काउंसिल का जोर भी मुस्लिम वोटबैंक पर टिका है और दोनों ही पार्टी का सियासी आधार पूर्वांचल है. इसीलिए पीस पार्टी और उलेमा काउंसिल ने आपस में हाथ मिला लिया है. पीस पार्टी की मुस्लिम समुदाय के अंसारी समाज के बीच अच्छी पैठ मानी जाती है, जिसका असर एक समय गोरखपुर, खलीलाबाद (संत कबीरनगर) से लेकर वाराणसी-आजमगढ़ और पूर्वांचल के कई जिलों में था. इसी के चलते 2012 के चुनाव में तीन सीट भी जीत चुकी है, लेकिन 2017 में पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका था. इसी इलाके में खासकर आजमगढ़ और जौनपुर में उलेमा काउंसिल का भी थोड़ा बहुत असर है. ऐसे में अब दोनों ही पार्टियां मिलकर 2022 के चुनाव में किस्मत आजमाने जा रही है, लेकिन मुस्लिम समाज का विश्वास क्या जीत पाएंगी, ये सवाल बड़ा है. 

 

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