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UP Election: ब्राह्मण वोटरों पर सभी दल मेहरबान, यूपी में कितना ताकतवर है ये समाज?

उत्तर प्रदेश की सियासी बाजी जीतने और सत्ता पर काबिज होने के लिए सभी राजनीतिक दल ब्राह्मण समुदाय को रिझाने पर लगे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ब्राह्मण वोटों की सियासी ताकत कितनी है, जिसके लिए बीजेपी से लेकर सपा और बसपा सभी दल अपने-अपने पाले में लाने के लिए परेशान हैं

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अखिलेश यादव, योगी आदित्यनाथ, मायावती, प्रियंका गांधी अखिलेश यादव, योगी आदित्यनाथ, मायावती, प्रियंका गांधी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यूपी में 10 फीसदी ब्राह्मण वोटर निर्णायक हैं
  • बीजेपी से लेकर सपा, बसपा, कांग्रेस की नजर
  • योगी पर ठाकुरवाद का आरोप लगा रहा विपक्ष

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का एजेंडा जाति के इर्द-गिर्द बुना जा रहा है. जातीय समीकरण साधे बिना सत्ता की वैतरणी पार लगाना सियासी दलों को मुश्किल नजर आ रहा है. सूबे की सियासी बाजी जीतने और सत्ता पर काबिज होने के लिए सभी राजनीतिक दल ब्राह्मण समुदाय को रिझाने पर लगे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ब्राह्मण वोटों की राजनीतिक ताकत कितनी है, जिसके लिए बीजेपी से लेकर सपा और बसपा सभी दल व्याकुल नजर आ रहे हैं? 

यूपी को कांग्रेस राज में मिले ब्राह्मण सीएम

आजादी के बाद से 1989 तक यूपी की सियासत में ब्राह्मण समाज का वर्चस्व कायम रहा. गोविंद बल्लभ पंत से नारायण दत्त तिवारी तक कुल आठ बार ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने. लेकिन, मंडल के बाद सूबे बदले सियासी समीकरण में ब्राह्मणों के हाथ से सत्ता खिसकी तो फिर आजतक नहीं मिली. ऐसे में यूपी का ब्राह्मण समाज पिछले तीन दशक से महज एक वोटबैंक की तरह बनकर रह गया है, जिन्हें अपने पाले में लाने के लिए सभी दल मशक्कत कर रहे हैं. 

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटर कितने अहम?

उत्तर प्रदेश की सियासत में भले ही ब्राह्मणों की ताकत सिर्फ 8 से 10 फीसदी वोट तक सिमटी हुई है, लेकिन ब्राह्मण समाज का प्रभाव इससे कहीं अधिक है. ब्राह्मण समाज सूबे में प्रभुत्वशाली होने के साथ-साथ राजनीतिक हवा बनाने में भी काफी सक्षम माना जाता है. सूबे की करीब पांच दर्जन से ज्यादा सीटों पर ब्राह्मण वोटर निर्णायक भूमिका अदा करते हैं. एक दर्जन जिलों में इनकी आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है. वाराणसी, चंदौली, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, भदोही, जौनपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, अमेठी, बलरामपुर, कानपुर, प्रयागराज में ब्राह्मण मतदाता 15 फीसदी से ज्यादा है. यहां पर ब्राह्मण वोटर्स किसी भी उम्मीदवार की हार या जीत में अहम रोल अदा करते हैं. 
 
बता दें कि कांग्रेस के राज में ज्यादातर मुख्यमंत्री ब्राह्मण समुदाय के बने, लेकिन बीजेपी के उदय के साथ ही ब्राह्मण समुदाय का कांग्रेस से मोहभंग हुआ. 1989 के बाद से यूपी में जिस भी पार्टी ने ब्राह्मण कार्ड खेला, उसे सियासी तौर पर बड़ा फायदा हुआ है. ऐसे में कुल मिलाकर ब्राह्मण वोटर उत्तर प्रदेश में वोट के हिसाब से एक खास हैसियत रखते हैं और ये जिस तरफ भी मुड़ जाते हैं उस पार्टी की सियासी नैया पार लग जाती है. यही वजह है कि 2022 के सियासी रण में कोई भी दल इनकी नाराजगी का जोखिम नहीं उठाना चाहता, जिसके लिए बीजेपी से लेकर सपा, बसपा और कांग्रेस ब्राह्मणों को रिझाने में जुटी हैं. 

बीजेपी ब्राह्मण वोटों को सहेजने में जुटी

यूपी चुनाव से पहले ब्राह्मण वोटों की नाराजगी दूर करने के लिए बीजेपी शीर्ष नेतृत्व एक्टिव हो गया है. केंद्रीय मंत्री और यूपी चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान के बाद यूपी ब्राह्मण नेताओं की बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ बैठक हुई है. बीजेपी ने बैठक में सूबे के ब्राह्मण नेताओं से फीडबैक लिया और ब्राह्मण वोटों को साधने के लिए एक कमेटी बनाई है.बीजेपी सरकार में ब्राह्मण वर्ग के लिए किए गए कामों को लोगों को तक पहुंचाने का प्लान बनाया गया है. 

ब्राह्मणों की नाराजगी को दूर करने के लिए सूबे की सभी विधानसभाओं के प्रतिष्ठित ब्राह्मण समाज के यहां जाकर बीजेपी के नेता उनका सम्मान करेंगे. इस दौरान उन्हें बताया जाएगा कि केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार की बीजेपी सरकार ने सामान्य वर्ग के लिए खासकर ब्राह्मण समाज के लिए क्या क्या कदम उठाए हैं. सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण, मंदिरों के भव्य निर्माण, ब्राह्मण वर्ग से बड़ी संख्या में मंत्री विधायक और सांसद भाजपा द्वारा बनाए गए हैं. ब्राह्मणों को साधने के लिए बीजेपी ने पांच ब्राह्मण नेताओं की एक कमेटी बनाई है, जो सूबे में जगह-जगह घूमकर ब्राह्मण समाज को बीजेपी के साथ मजबूती से जोड़े रखने के मिशन पर काम करेंगे.

यूपी में कितने ब्राह्मण विधायक और मंत्री ?

2017 में बीजेपी के 312 विधायकों में 58 ब्राह्मण चुनकर आए थे. 56 मंत्रियों में योगी सरकार में डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा, जितिन प्रसाद, श्रीकांत शर्मा और ब्रजेश पाठक सहित 9 ब्राह्मण मंत्री हैं. इसके बाद भी योगी आदित्यनाथ पर ठाकुरवाद की राजनीति के आरोप के बीच बीजेपी को लगने लगा है कि यूपी में ब्राह्मण वर्ग की नाराजगी सूबे में सत्ता की वापसी में सबसे बड़ी बाधा न बन जाए. इसीलिए माधव प्रसाद त्रिपाठी से लेकर श्रीपति मिश्र तक के नाम ले ले कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्राह्मणों को साधते नजर आए हैं. वहीं, बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व भी यूपी के ब्राह्मण नेताओं को साथ लेकर दिल्ली में रणनीति बनाने लगा है.

बसपा फिर से ब्राह्मणों के सहारे उतरी

'ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा', 15 साल पुराना ये नारा तो सभी को याद होगा. 2007 में मायावती को बंपर सीट के साथ इसी फॉर्मूले ने फिर से सत्ता के शिखर तक पहुंचाया था और ब्राह्मण के जरिए सत्ता में वापसी का सपना मायावती ने संजोए रखा है. 2022 चुनाव में बसपा ने अपना पूरा फोकस ब्राह्मण वोटों पर केंद्रित कर रखा है और इस मिशन पर सतीश चंद्र मिश्रा को लगाया है. सतीष मिश्रा सूबे में ब्राह्मण सम्मेलन कर बसपा के साथ उन्हें दोबारा से जोड़ने के लिए लगे हुए हैं. 

2007 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों को लाने के लिए मायावती ने उस वक्त 'हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश है' और 'ब्राह्मण शंख बजाएगा हाथी बढ़ता जाएगा'. जैसे नारे गढ़े थे. बसपा का नारा और फॉर्मूला कामयाब भी रहा. ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी और दलित का गठजोड़ बनाकर मायावती ने 206 सीटों के साथ 2007 में सरकार बनाई थी. 

मायावती ने एक बार फिर से ब्राह्मण को लुभाने के लिए तमाम जतन कर रही है और टिकट बंटवारे में ब्राह्मणों को अच्छे खासा तवज्जो देनी की रणनीति बनाई है. 2007 के चुनाव में 55 से ज्यादा ब्राह्मणों को टिकट दिया गया था, जिसमें से 41 ब्राह्मण विधायक बनने में कामयाब रहे. इस बार भी बीएसपी की रणनीति में 100 से अधिक ब्राह्मण चेहरे को टिकट देने की है.

अखिलेश के एजेंडे में भी ब्राह्मण शामिल

ब्राह्मणों को रिझाने के लिए यूपी की सियासत में समाजवादी पार्टी भी पीछे नहीं है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पार्टी के सियासी समीकरण को दुरुस्त करने के लिए ठाकुर वोटों के बजाय ब्राह्मण वोटों को खास फोकस किया है. सपा ने पिछले साल लखनऊ में 108 फीट की परशुराम की प्रतिमा लगाने का वादा करके ब्राह्मण कार्ड खेला था. इतना ही नहीं हाल ही में सपा ने जिस तरह से ब्राह्मण समाज के कद्दावर नेताओं की पार्टी में एंट्री कराई है. खासकर पूर्वांचल के इलाके के ब्राह्मण चेहरों की जिन्हें सीएम योगी का विरोधी माना जाता है, उससे साफ है कि इस के चुनाव में सपा का फोकस ब्राह्मण वोटों को लेकर है. 

कांग्रेस की नजर ब्राह्मण वोटों पर

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटर कांग्रेस का परंपरागत वोटर माना जाता है, लेकिन सत्ता से बेदखल होने के बाद वो छिटककर दूसरे दलों के साथ चला गया है. यूपी में ब्राह्मण सीएम कांग्रेस के राज में ही मिला है. ऐसे में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी अपने पुराने और परंपरागत ब्राह्मण वोटों को वापस लाने के लिए तमाम जतन कर रही हैं, लेकिन उससे पहले सूबे में मजबूती के साथ अपने सियासी पैरों को जमा लेना चाहती हैं. ऐसे में ब्राह्मण वोटों से पहले उन्होंने मुस्लिम और दलित वोटों को खास फोकस किया है. 

कांग्रेस ने प्रमोद तिवारी को सूबे में आगे कर रखा है और उनकी बेटी आराधना मिश्रा को प्रियंका गांधी अपने साथ लेकर यूपी में घूम रही हैं. उत्तर प्रदेश में अब तक 6 मुख्यमंत्री ब्राह्मण समाज से बने हैं और कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी यही मिसाल देते हुए सपा-बसपा और बीजेपी को चैलेंज करते हैं कि कोई एक भी तो ब्राह्मण समाज से बना कर दिखा दे. इस तरह दबे पांव कांग्रेस ब्राह्मणों को रिझाने में जुटी है. 

 

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