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Akhilesh Yadav rath yatra: कानपुर-बुंदेलखंड की बंजर जमीन पर 'साइकिल' दौड़ाने निकले अखिलेश यादव

Akhilesh Yadav yatra: अखिलेश यादव के चुनावी अभियान का आगाज कानपुर से हो रहा है. अखिलेश दो दिन में 190 किलोमीटर की यात्रा में चार जिलों का भ्रमण करेंगे. इस यात्रा के जरिए अखिलेश यादव कानपुर-बुंदेलखंड का दौरा करेंगे, जो एक दौर में बसपा का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब यहां बीजेपी का दबदबा है.

सपा प्रमुख अखिलेश यादव रथ पर सवार सपा प्रमुख अखिलेश यादव रथ पर सवार
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अखिलेश यादव की आज से रथ यात्रा
  • कानपुर-बुंदेलखंड में अखिलेश की यात्रा
  • बुंदेलखंड विपक्ष के लिए बंजर सियासी जमीन

उत्तर प्रदेश में अपने खोए हुए सियासी जनाधार को वापस लाने के मकसद से सपा प्रमुख अखिलेश यादव मंगलवार को एक बार फिर से रथ यात्र पर निकल रहे हैं. अखिलेश यादव इस यात्रा का आगाज कानपुर से कर रहे हैं और दो दिन में 190 किलोमीटर की यात्रा में चार जिलों का भ्रमण करेंगे. इस यात्रा के जरिए अखिलेश यादव कानपुर-बुंदेलखंड का दौरा करेंगे, जो एक दौर में बसपा का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब बीजेपी का दबदबा पूरी तरह से कायम है. ऐसे में कानपुर-बुंदेलखंड इलाके में सपा के लिए बंजर पड़ी राजनीतिक जमीन को अखिलेश क्या सियासी उपजाऊ बना पाएंगे?  

मिशन-2022 में जुटे अखिलेश यादव कानपुर के जाजमऊ से रथ यात्रा शुरू करेंगे. इसके बाद रथ पर सवार होकर कानपुर नगर, कानपुर देहात, जालौन और हमीरपुर जिले के विधानसभा क्षेत्रों में जाकर सपा के बिगड़े सियासी समीकरण को दुरुस्त करेंगे. साथ ही अखिलेश रथ यात्रा के जरिए योगी सरकार की खामियों को उजागर करेंगे और बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाने का काम करेंगे. दूसरी तरफ, उनकी अपने परंपरागत वोट मस्लिम और पिछड़ों के साथ दलितों को भी साधने रणनीति है. 

बीजेपी के मजबूत गढ़ से अखिलेश के अभियान का आगाज

अखिलेश यादव 'समाजवादी विजय रथ यात्रा' के पहले चरण में कानपुर-बुंदेलखंड के इलाके में रहेंगे, जो सियासी तौर पर सपा के लिए काफी अहम है. 2017 के विधानसभा चुनाव में मोदी के विजय रथ पर सवार बीजेपी ने सपा, बसपा और कांग्रेस का इस इलाके में पूरी तरह से सफाया कर दिया था और 2022 में भी क्लीन स्वीप कर इतिहास रचने की तैयारी में है. यही वजह है कि अखिलेश ने 2022 के चुनाव अभियान की यात्रा बीजेपी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले कानपुर-बुंदलेखंड इलाके से कर रहे हैं. 

इलाके के चुनावी समीकरण

कानपुर-बुंदेलखंड इलाके में कुल 52 विधानसभा सीटें आती है, जिनमें से बीजेपी के पास मौजूदा समय में 47 सीटें है. इसके अलावा बाकी चार सीटें सपा के पास है और एक सीट कांग्रेस के पास है. वहीं, बसपा 2017 के चुनाव में कानपुर-बुदंलेखंड में अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा मिलकर भी कानपुर-बुंदेलखंड में बीजेपी के विजय रथ को नहीं रोक सकी थी, जिसका नतीजा था इस इलाके की सभी 10 लोकसभा सीटों पर बीजेपी कमल खिलाने में कामयाब रहीं. यही वजह है कि इस बार बीजेपी क्लीन स्वीप करने की कवायद में है. 

कानपुर-बुंदलेखंड इलाके में बीजेपी 2017 के चुनाव में जिन पांच सीटों को नहीं जीत पाई थी, उनके तीन सीटें कानपुर नगर की है, एक सीट कन्नौज सदर और एक इटावा की जसवंतनगर विधानसभा सीट है. जसवंतनगर सपा की परंपरागत सीट है, जहां से शिवपाल यादव जीते थे. कानपुर की सीसामऊ विधानसभा सीट पर सपा के इरफान सोलंकी और आर्यनगर से सपा के अमिताभ वाजपेई ने जीत दर्ज की थी. कानपुर-बुंदेलखंड से कांग्रेस के एकलौते विधायक सुहैल अंसारी हैं, जो कानपुर के कैंट विधानसभा सीट से जीते हैं. 

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर और बांदा जिले आते हैं जबकि कानपुर के रीजन में कानपुर नगर, कानपुर देहात, इटावा और कन्नौज आते हैं. बुंदेलखंड का इलाका भले ही सूखे की किल्लत से जूझता रहा हो, पर राजनीति की फसल के लिए यहां की जमीन हमेशा से बहुत उर्वर रही है. वहीं, कानपुर की बेल्ट सपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, क्योंकि यह पूरा इलाका यादव बेल्ट कह लाता है. 

बुंदेलखंड में कभी सूखा राजनीति का मुद्दा बन जाता है तो कभी पीने का पानी, वाटर ट्रेन और घास की रोटियां. यहां चुनाव जीतने के लिए भले ही जातीय समीकरण फिट किए जा रहे हों, लेकिन जनसभाओं में सभी नेता इन मुद्दों को हवा देते रहते हैं. हालांकि, यूपी में योगी सरकार के आने के बाद बुदंलेखंड में विकास को रफ्तार मिली है. बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे बनकर तैयार हो रहा है. इसके अलावा बुंदेलखंड के विकास के लिए एक बोर्ड भी बनाया गया है. ऐसे में अखिलेश यादव के लिए कानपुर बेल्ट में भले ही जगह बनाना आसान हो, लेकिन बुंदेलखंड की जमीन पर साईकिल को रफ्तार पकड़ना बीजेपी के सामने आसान नहीं होगा. 
 

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