महिलाओं को राजनीति में लाने की वकालत करने वाली बीजेपी और कांग्रेस दोनों बड़ी पार्टियों की असलियत सामने आ रही है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही अभी तक बहुत कम महिलाओं को टिकट दिया है.
महिलाओं को लेकर आम आदमी पार्टी का हाल भी कुछ ठीक नहीं है. टिकट बांटने के समय ही पार्टियों का सही चरित्र सामने आता है. दोनों ही पार्टियों में चाहे जितना भी मतभेद हो लेकिन महिलाओं के मुद्दों पर दोनों के सुर एक ही हैं, दोनों ही बढ़-चढ़कर ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को राजनीति में मौका देने की वकालत करते हैं, लेकिन हकीकत को आंकड़ों के जरिए समझा जा सकता है.
कांग्रेस ने 390 सीटों में से मात्र 55 महिलाओं को ही टिकट दिया है. पिछली बार कांग्रेस ने 43 महिलाओं को टिकट दिया था, इस बार 12 सीटों की बढ़ोतरी हुई है. बीजेपी की हालत और भी खराब है. पार्टी की ओर से बांटे गए 402 टिकटों में महिलाओं की संख्या केवल 37 है. पिछली बार पार्टी ने 44 सीटें महिलाओं की दी थीं. आम आदमी पार्टी ने भी अब तक 339 टिकट दिए हैं और महिलाओं की संख्या सिर्फ 34 है.
महिलाओं के प्रति बड़ी पार्टियों के इस रवैये पर सीपीएम लीडर वृंदा करात का कहना है कि सामने ये कांग्रेस और बीजेपी में लड़ाई है लेकिन अंदर से दोनों ही मिली हैं, हमने हमेशा ही महिला आरक्षण बिल का समर्थन किया है लेकिन लोकसभा में इसे पास ही नहीं किया जा रहा है.
चुनाव से पहले पार्टियों के इस बदलते रूप से महिला संगठनों में भी काफी रोष है. उनका कहना है कि कोई भी पार्टी महिलाओं को ज्यादा मौका नहीं देना चाहती. सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक डॉ. रंजना कुमारी के अनुसार सबसे पहली लोकसभा में महिलाओं का प्रतिशत 3 प्रतिशत था जो आज बढ़कर 11 प्रतिशत तक पहुंचा है. देश में 49 प्रतिशत आबादी महिलाओं की है. राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और खराब होती जा रही है.