लोक सभा चुनाव के टिकटों का वितरण शुरू ही हुआ कि सभी पार्टियों से मनमुटाव, मतभेद और यहां तक कि विद्रोह की भी खबरें आने लगीं हैं. हर पार्टी इससे ग्रस्त है और हर बड़े नेता को इन्हें सुलझाने-समझाने में माथापच्ची करनी पड़ रही है.
कांग्रेस, बीजेपी, आरजेडी, द्रमुक और यहां तक कि अभी हाल ही में पैदा हुई आम आदमी पार्टी भी इससे आहत है. महीनों या वर्षों से इस "शुभ अवसर" की आस लगाए बैठे उम्मीदवारों के लिए यह बड़ा ही कठिन समय होता है और ऐसे में जब टिकट की लॉटरी नहीं खुलती तो विद्रोह का बिगुल बज ही उठता है. पहले तो मुरनी मनोहर जोशी अपनी सीट बदले जाने से परेशान थे तो अब लालजी टंडन को अपनी सीट को बचाए रखने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है.
उधर कांग्रेस में तो कई मंजे हुए नेताओं के नाम ही पहली सूची से गायब है. इतना ही नहीं एक सज्जन तो टिकट के साथ ही पार्टी से पलायन कर गए! उधर तमिलनाडु में टिकट के मुद्दे पर बाप-बेटे की जंग क्या रंग लाएगी, लोग जल्द ही देखेंगे. आरजेडी के सुप्रीमो अपनी बेटी के लिए अपने विश्वस्त राम कृपाल यादव का टिकट काटने में जरा भी नहीं झिझके. वर्षों तक निष्काम भाव से वफादारी करने वाले काम कृपाल अब पार्टी में अछूत हो गए हैं.
कभी सपा सुप्रीमो के सबसे बड़े सलाहकार रहे अमर सिंह अब अजित सिंह के लोक दल से टिकट पाने में कामयाब हो गए हैं. शिवसेना ने मनोहर जोशी को टिकट देने की बजाय उनका टिकट ही काट दिया है. यह लोकतंत्र की दौड़ है या बदलते हुए वक्त की निशानी है, कहना मुश्किल है. अपनी-अपनी पार्टियों से नेता टिकटों की अपेक्षा करते हैं और न मिलने पर विद्रोह की रणभेरी बजा देते हैं. यह कोई नई बात नहीं है.
सच तो यह है कि भारत में आज जितने राजनीतिक दल हैं, उसका सबसे बड़ा कारण यह टिकट तो ही है. दरअसल राजनीति कोई देशभक्ति नहीं है यह तो विशुद्ध मुनाफे और घाटे का खेल है. यह कोई देशभक्ति का काम तो है नहीं और न ही जनता की भलाई का मामला है. यह तो अपने अपने को स्थापित करने और सत्ता पाने का एक वैध रास्ता ही तो है. आखिर कोई नेता राजनीति में आता ही क्यों है? पार्टियां इतनी भागदौड़ क्यों करती हैं ? इतना धन क्यों बहाया जाता है ? सब का एक ही जवाब है, सत्ता में आने के लिए. तो फिर पार्टी के अनुशासन की बात कहां से उठती है?
आखिर जब पार्टियां सत्ता हथियाने के लिए बेताब रहती हैं तो उनके सदस्य और नेता इस लोभ से कैसे दूर रहेंगे. पार्टियां और उम्मीदवार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. आज देश का राजनीतिक माहौल इतना विषाक्त हो चुका है कि नैतिकता की बातें करना बेमानी है. तो तमाशा देखिए, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी उत्सव का और उम्मीद कीजिए कि शायद इन सबसे उबर कर एक दिन हमारे नेता और दल किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचेंगे जो देश के लिए हितकारी होगा.