सतपुड़ा की पहाड़ियों से सटे महाराष्ट्र के धुले जिले को पहले पश्चिम खानदेश जिला के नाम से जाना जाता था. इस शहर का प्राचीन नाम रासिका था. शहयाद्री की पर्वत श्रृंखला जिले के पश्चिम क्षेत्र से होकर गुजरती है. यह पूर्व में बीरर (प्राचीन विदर्भ), उत्तर में नीमड, दक्षिण में औरंगाबाद और भीड़ से घिरा है. 1960 में बॉम्बे स्टेट से यह महाराष्ट्र राज्य का हिस्सा बना.
1 जुलाई 1988 को धुले जिले का विभाजन धुले और नंदुरबार के रूप में कर दिया गया. नंदुरबार नए जिले के रूप में अवतरित हुआ. जबकि धुले पहले से ही जिला था और इसके तहत 4 तालुका (धुले, सकरी, शीरपुर और शिनखेडा) आते हैं.
2011 की जनगणना के आधार पर देखें तो धुले जिले की आबादी 2,050,862 है जिसमें 1,054,031 पुरुष और 996,831 महिलाएं शामिल हैं. 2001 में धुले जिले की आबादी 1,707,947 थी. महाराष्ट्र की कुल आबादी का 1.83 फीसदी आबादी धुले जिले में रहती है. इनमें से 89.01 फीसदी आबादी हिंदू है जबकि 9.16 फीसदी आबादी मुसलमानों की है.
धुले की साक्षरता 73 फीसदी
साक्षरता दर के मामले में नजर डालें तो धुले में 72.80 फीसदी साक्षरता है जिसमें 79.50 फीसदी पुरुष तो 65.77 फीसदी महिला शिक्षित हैं.
धुले लोकसभा सीट के तहत 6 विधानसभा सीटें आती हैं जिसमें धुले ग्रामीण, धुले सिटी, सिंदखेड़ा, मालेगांव सेंट्रल, मालेगांव आउटर और बगलान शामिल है.
बीजेपी का कब्जा
धुले लोकसभा सीट पर फिलहाल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सुभाष रामराव भामरे सांसद हैं. अप्रैल-मई में हुए चुनाव में सुभाष ने कांग्रेस के कुणालबाबा रोहिदास पाटिल को 2,29,243 मतों के बड़े अंतर से हराया था. बीजेपी के सुभाष रामराव भामरे को 6,13,533 वोट जबकि कुणालबाबा को 3,84,290 वोट मिले थे. 7,195 स्क्वायर किलोमीटर दायरे में फैले धुल जिले का लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से बेहतर है. जिले में प्रति हजार पुरुषों की तुलना में 946 महिलाएं हैं.
धुले लोकसभा सीट पर 1957 में पहली बार चुनाव हुआ था. यहां भारतीय जनसंघ के उत्तमराव लक्षण पाटिल जीतकर आए थे. लेकिन 1962 के चुनाव में यहां कांग्रेस ने ऐसी बाजी पलटी कि कोई दूसरा दल 35 साल तक जीत हासिल नहीं कर सका. कांग्रेस के चुडामन आनंदा पाटिल 1962 से 1971 तक लगातार तीन बार चुनाव जीते.
दोनों ही राज्यों में 21 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे जबकि 24 अक्टूबर को चुनाव के नतीजे आएंगे.